मेरी मालकीण और मेरा नसीब – 2 | Erotic Stories
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मेरी मालकीण और मेरा नसीब – 2

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और मै फिर से उनकी झांघे दबाने लगा. मालकीण पेट के बल लेटी होने से उनकी मोटी गांड साडी के उपर से मुझे महसुस हो रही थी. साडी पुरी उपर करके मालकीण की गांड देखू ऐसा मुझे लगने लगा और फिर मै मालकीण की साडी पुरी उपर तक ले जा रहा था. उस नरम नरम मुलायम स्पर्श से मेरा शरीर भट्टी के जैसे गरम हो चुका था और पॅंट के अंदर लंड जोरजोरसे मचलने लगा था.

मालकीण : सुरेश… सच मे कितना अच्छा दबा रहा है तू…..

मै : तेल लगाके दबाऊ? एकदम मालीश जैसे…

मैने जरा मूड मे आके पुछा. मालकीण फिर से सीधी होके लेट गई और साडी को नीचे लाते हुये झट से उठ के बैठ गई. यह देखकर मै डर गया पर मालकीण मुझसे धिरे आवाज मे बोली.

मालकीण : तेल लगाके दबा पर अभी नही.

मै : फिर कब?

मैने और भी बेकरार होके पुछा.

मालकीण : रात को……..

मै : ठीक है.

मालकीण : रात को तू इधर आ.. मै भी यही मिलुंगी. भुलना मत.

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मै : और शेटजी?

मालकीण : वह आज नही है, कही बाहर जानेवाले है. मै अकेली ही रहुंगी. जा अब.

मै बाहर आ गया. पर मेरा ध्यान अब किसी मे भी नही लग रहाता.

मालकीण की भारी भरकम भरी हुई गदराई झांघे मेरे नजर के सामने से हट नही रही थी और अब आज रात को मालकीण की तेल से मालीश करनी थी. इस खयाल से ही मेरा पुरा शरीर और भी गरम हो चुका था. उस दिन शाम तक मैने मेरे सारे काम जल्दी से जल्दी निपटा लिये और रात को उस अंदर के कमरे मे जाके बैठ गया. मालकीण कब आयेगी? ऐसा मुझे लग रहा था. थोडी देर बाद मालकीण आ गई. आते समय उनके हाथ मे तेल की बडी कटोरी मुझे दिखाई दी. फिर उन्होने पलंग के पास कटोरी रखी और सारे दरवाजे अंदर से बंद कर किये. फिर मुझे देखते हुये बोली.

मालकीण : सुरेश, तेरी पॅंट और शर्ट निकाल. वैसे भी तेल के दाग तेरे कपडो पर गिरने मत दे.

इतना कहकर मालकीण ने उसके शरीर से साडी अलग कर दी और बगल मे रख दी. पेटीकोट पर मालकीण किसी अप्सरा के जैसी दिख रही थी. गोरा गोरा सफेद पेट बहुत ही सुंदर दिख रहा था. फिर मैने मालकीण के कहे अनुसार शर्ट और पॅंट निकाल के मालकीण के कपडो पर रख दिये. अब मेरे शरीर पर सिर्फ अंडरविअर ही थी. मालकीण मुझे उपर से नीचे तक देखने लगी तो मै थोडासा शरमा गया. पर मालकीण नेही मुझे कपडे निकालने को कहे थे और मै भी यही चाहता था.

मालकीण पलंग पर आराम से पेट के बल होके लेट गई और हाथो से अपना पेटीकोट उपर करके खिच लिया. तभी उनकी आधी झांघे नंगी दिखाई दे रही थी. लाइट के उजाले मे मालकीण की झांघे चमक रही थी. उन झांघो को देखकर मै झट से आगे बढकर उनके पास गया.

मै : तेल लगाके मालीश करू ना?

मुझे पता था फिर भी पुछा लिया.

मालकीण : हंम्म्म्मम..

ओ बस इतना ही बोली और मैने जल्दी से तेल मे मेरी उंगलिया डुबोके उनके गोरी गोरी झांघो पे हाथ रखा और मै धिरे धिरे उनके भारी भरकम भरी हुई झांघो पे तेल की मालीश करके दबाने लगा. मेरे दोनो हाथ को उनकी झांघो के उपर से नीचे तक दबा रहा था. मै फिर जान बुजकर पेटीकोट तक हाथ ले जाना शुरू किया ताकी मालकीण की बडी गांड दिखाई दे यह मेरा विचार था. पर मेरा लंड मालकीण के मुलायम शरीर के स्पर्श से एकदम खडा हो चुका था और मेरी अंडरविअर आगे की तरफ बहुत ही फुली हुई थी.

मालकीण की नरम नरम झांघे दबाते समय जो कुछ मुझे आकर्षण लग रहा था, वह कहने के लिये मेरे पास शब्द ही नही है. मालकीण ने अपनी झांघे बहुत ही जादा फैला दी. मै फिर मालकीण के दोंनो झांघो के बीच मे जाकर बैठ गया और उनकी झांघे दबाने लगा. उन्होने अपना पेटीकोट और उपर खिच लिया और बोली.

मालकीण : आह्ह्ह… शस्सस्स्स .. मस्त लग रहा है रे सुरेश……. और तेल लगा…….

मालकीण की आधी गांड नंगी हो चुकी थी. गांड की दरार मुझे साफ दिख रही थी. और मेरा लंड डटकर खडा होके मुझे पागल बना रहा था. मेरा ध्यान उनकी गांड पर पुरी तरह से गड चुका था. उनके गांड के दरार मे मैने तेल छोडा और उनकि गांड देखते हुये उंगलिया मै उपर नीचे करने लगा. मेरे मन मे अब कोई भी डर नही था. मेरा सारा शरीर इतना गरम हो चुका था की मेरी सासे मुझे गरम महसुस हो रही थी और मैने देखा मालकीण की चुत थोडीसी मुझे दिखने लगी थी. उस गुलाबी चुत के आसपास छोटे बाल फैले हुये थे. मेरा हाथ अब उसपार उनके गांड की दरार मे उपर नीचे हो रहा था.

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