कामिनी की कामुक गाथा (भाग 79) | Erotic Stories
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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 79)

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प्रिय पाठकों, आप सभी को मेरा वासनामय अभिवादन। पिछली कड़ी में आपनें पढ़ा कि अपनी कामुकता के वशीभूत, किस तरह अपनी सहेली रेखा के पुत्र पंकज की अंकशायिनी बनी। कहां पंकज एक अठारह वर्षीय उभरता नवयुवक, जो अभी लड़कपन की दहलीज से पूरी तरह बाहर भी नहीं निकला था और कहां मैं 41 वर्षीय, पकी पकायी, खेली खायी, उसकी मां के उम्र की अधेड़ कामांध महिला, जो वासना के गर्त में गिर कर न जाने अबतक कितने मर्दों की बांहों में समा चुकी थी। प्रथमद्रष्टया यह बलात्कार लग रहा था, किंतु यह भी सत्य है कि बिना मेरी सहमति के मेरा बलात्कार कत्तई मुमकिन नहीं था। अन्य अवसरों की भांति आज भी जहां पंकज समझ रहा था कि वह जबर्दस्ती मुझसे शारीरिक संबंध बनाने में सफल रहा, वहीं मैं जानती थी मैंने खुद पंकज को मुझ पर हावी होने देकर उसके युवा जिस्म का आनंद लिया।

एक सामान्य गृहिणी रेखा, पति की बेरुखी सहती रेखा, अपने जिस्म की दमित भूख से तप्त रेखा को परपुरूषों से अनैतिक विवाहेतर संबंध बना कर अपने तन की कामेक्षा शांत करने को प्रेरित करके वासना के दलदल में तो पहले ही घसीट चुकी थी, अपने तन की अदम्य भूख से त्रस्त, अब मैं उसके नादान पुत्र (हालांकि नादान कहना शायद गलत होगा, क्योंकि कामक्रीड़ा में जिस तरह की सिद्धहस्तता का परिचय मुझे दिया, वह बड़े बड़े औरतबाज मर्दों की तुलना में कहीं बेहतर था) को भी, उसकी औरतखोरी के नशे को हवा दे कर वासना के गर्त में घसीट लाने का सफल कुत्सित प्रयास कर चुकी थी और मुझ कामांध औरत द्वारा यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा यह निश्चित था।

पंकज को तो यह अहसास तक नहीं था कि उसे ऊपरवाले नें कितने कीमती उपहार से नवाजा था और वह अद्वितीय उपहार था उसका अविश्वसनीय रूप से दीर्घ और मोटा लिंग। उसका लिंग न केवल विशाल था, बल्कि उसका सौंदर्य भी चित्ताकर्षक था। भयभीत कर देने वाले उस लिंग के आकार के बावजूद उसकी सुंदरता मनमोहक थी। एक तो उसकी कद काठी, उसपर उसका मनमोहक व्यक्तित्व और तिस पर स्त्रियों का दिल धड़का देने वाला अकल्पनीय रूप से आकर्षक लिंग से लैस, उभरता हुआ नवयुवक था पंकज। तभी मैं सोचूं कि उसनें इतनी सी उम्र में आठ लड़कियों और दो औरतों को फंसाया कैसे। कितना आसान होता होगा लड़कियों को अपनी जाल में फंसा कर हवस का शिकार बनाना, जैसे मैं बनी। खैर मैं तो वैसे भी वासना की भूखी गुड़िया ठहरी।

मुझे कभी कभी खुद पर और खुद की किस्मत पर आश्चर्य होता है। मेरे जीवन में वासना के इस खेल का आरंभ जब से हुआ, तब से लेकर अब तक प्रायः सब कुछ खुद ब खुद होता गया और कुछ अवसरों पर मेरे थोड़े से प्रयास की आवश्यकता पड़ी, जिसपर ऊपरवाले की कृपादृष्टि सदैव बनी रही। उसने मेरी राह को सुगम बनाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा और मैंने मान लिया कि आनंदमय जीवन का उत्तम मार्ग, धारा के विरुद्ध न जा कर धारा की दिशा में बहते जाने में ही है। इसी को मैंने अपने जीवन का दर्शन बना लिया। जरूर इसमें मेरी खूबसूरती और कमनीय देह के आकर्षण का भी योगदान रहा है, लेकिन यह भी तो ऊपरवाले की कृपा ही थी मुझ पर। अब आज ही की बात को ले लीजिए, मेरे रूप लावण्य के कारण पंकज की कामलोलुप दृष्टि मुझ पर पड़ी, मेरी अधेड़ावस्था से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा, सहज सुलभ एकांत भी प्राप्त हो गया और तुर्रा यह कि उस लगभग पूर्ण, निर्माणाधीन एकांत कमरे में ऊपरवाले नें एक लकड़ी के तख्तपोश की व्यवस्था भी कर रखी थी। कामगरों के उपयोग में आने वाला वह नंगा तख्तपोश भी उस वक्त शाही बिस्तर से कम आनंददायक नहीं लगा।

पंकज के साथ उस बीस पच्चीस मिनट के प्रथम संसर्ग वाले स्वर्गीय आनंदमय लम्हों को मन में संजोए उस कमरे से पंकज संग निकली तो प्रफुल्लित थी। पंकज प्रफुल्लित था। वह तो पूरा मुझ पर आसक्त हो गया, पागल कहीं का। वहां से जब हम निकले तो अधिक समय नहीं हुआ था और मैं जानती थी कि रेखा उन तीन खड़ूस लोगों से किस तरह की गप्पें मार रही होगी। तीनों तो थे औरतों के रसिया और रेखा जैसी रसीली औरत उनके हाथ लगी थी, ऐसे छोड़ कैसे देते? रेखा, जो खुद भी परपुरूषों से मजे लेने की अभ्यस्त हो चुकी थी, भला ऐसे अवसर का लाभ लेने में कहां पीछे रहती? यही सब सोच कर मैं पंकज के साथ इधर उधर बेमतलब घूमती समय व्यतीत कर रही थी, रेखा और उन ठरकियों को समय देना चाह रही थी। पंकज पर फिर मस्ती चढ़ रही थी। हम घूमते हुए घर के पिछवाड़े बगीचे की ओर बढ़े तो पंकज नें फिर से मेरी कमर पकड़ कर अपनी ओर खींचा,

“हाय आंटी, आप इतनी मस्त हो कि फिर मन हो रहा है।”

“हट शैतान, अभी ही तो लूटी मेरी….” छिटक कर अलग होने की कोशिश करने लगी।

“क्या लूटा मैं?” वह मुझे दबोच कर चूमने लगा।

“हट बेशरम।” मैं कसमसाते हुए बोली। उसके लिंग में तनाव मैं महसूस कर रही थी। मैं फिर अवश होने लगी।

“अच्छा, अब बेशरम हूं? चुदवाने के बाद तो बड़ी खुश थीं आप?” वह फिर से जोर जबर्दस्ती पर उतर आया था। चूमते हुए मेरे स्तनों को दबाने लगा।

“उफ्फ, मानोगे नहीं?”

“नहीं, आप जैसी औरत तो बड़ी किस्मत से मिली है। जो एक बार चोद ले, बार चोदना चाहेगा।” अब वह मुझे दबोचे वहीं चबूतरे पर बैठ गया। मैं विरोध करती रही किंतु मुझे भी खींच कर बैठा लिया अपनी बगल में। मुझे चूम रहा था, मेरे स्तनों को दबा दबा रहा था और मेरी योनि को सहला रहा था। उफ्फ उस पागल नें तो मुझे करीब करीब दुबारा गरम ही कर दिया था।

“अच्छा बाबा अच्छा, फिर कर लेना, लेकिन अभी नहीं।” मैं बोली।

“अभी क्यों नहीं?”

“तू पहले बता कि इतनी कम उम्र में यह सब कहाँ से सीखा?” मैं उसका ध्यान भटकाने की कोशिश करने लगी।

“बताऊंगा, मगर अभी नहीं, अभी तो चोदने दीजिए।”

“अरे पागल, अंदर तेरी मां बैठी इंतजार कर रही होगी।”

“करने दीजिए।”

“सोचेगी नहीं कि इतनी देर क्यों कर रहे हैं हम?”

“अच्छा अच्छा, अभी नहीं तो कोई बात नहीं, लेकिन सोच लीजिए, तीन दिन छुट्टी है मेरी, तीनों दिन चोदने दीजिएगा ना?”

“हां रे पागल हां। तू एक बार जिसे भोग ले, फिर वह मना कर पाएगी क्या? अभी तो तू ये बता कि यह सब तूने शुरू कब और कैसे किया?”

“ठीक है बताता हूं, लेकिन एक शर्त पर।”

“कैसी शर्त?” मैं शशंकित हो उठी।

“आप मेरा लंड पकड़ कर खेलती रहिए।”

“छि:”

“जाईए तब नहीं बताता।”

“अच्छा बाबा अच्छा, निकाल बाहर बदमाश।”

“क्या निकालूं?” शरारत से बोला।

“लंड हरामी, और क्या?” झुंझलाहट से बोली।

“ये हुई न बात।” कहते हुए उसनें पैंट की जिप नीचे कर अपना भीमकाय लिंग बाहर निकालने की नाकाम कोशिश की। फलतः उसे पैंट ढीली कर नीचे खिसकाने पर मजबूर होना पड़ा। पैंट नीचे खिसकते ही उसका विकराल लिंग फुंफकार मारता हुआ उछल पड़ा।

“बा्आ्आ्आ्आप रे बा्आ्आ्आ्आप, इत्तन्ना्आ्आ्आ बड़ा्आ्आ्आ्आ!” मैं सचमुच चौंक उठी। जब पंकज मेरे साथ जबर्दस्ती कर रहा था तो मुझे पता तो चला कि इसका लिंग सामान्य से काफी बड़ा है लेकिन अभी इस तरह फुर्सत में देखने का मौका मिला तो मेरा चौंक उठना स्वभाविक था। ग्यारह इंच से भी लंबा और मेरी एक मुट्ठी में भी समा न सकने जैसा कम से कम साढ़े तीन इंच मोटा लिंग अपने पूरे जलाल के साथ जुंबिश ले रहा था। तभी तो पहले पहल मैं तकलीफ का अनुभव कर रही थी।

“क्या इत्तन्ना्आ्आ्आ बड़ा? मजे में तो चुद रही थीं आप, बात करती हैं।” पंकज मेरे हाथ को अपने दर्शनीय लिंग पर रख दिया। पत्थर की तरह सख्त और गरम था वह, मगर था बड़ा प्यारा। चुदी थी ना इसी लिंग से। मैं उसके लिंग पर हाथ फेरने लगी। अंदर ही अंदर तो सुलग रही थी, किंतु खुद को काबू में रखना बखूबी आता था मुझे।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, हां्आं्आं्आं्आं, ऐसे ही सहलाती रहिए।” वह मस्ती में भर कर बोल उठा।

“अब बता।” मैं बोली।

“बताता हूं, बताता हूं। यह छ: महीने पहले की बात है।” अब उसनें अपनी हरकतें बंद कर दी थीं। मुझे तनिक राहत मिली, लेकिन वह अपनी बांयी हाथ से मेरी कमर पकड़ कर अब भी मुझे अपने से चिपकाए हुए था। इसपर मुझे कोई ऐतराज भी नहीं था। सांझ का झुटपुटा तनिक गहरा रहा था। एकांत भी था। इधर कोई आता जाता भी नहीं था। घर के अंदर तो सभी निश्चय ही व्यस्त होंगे, अतः मैं निश्चिंत उसकी बांह में सिमटी अपना सर उसके कंधे पर रख कर बैठी उसके विकराल लिंग को सहलाती जा रही थी। पंकज नें अपनी बात जारी रखी।

“””मैं प्लस टू के दूसरे साल में था। मेरे क्लास की लड़कियां मुझ पर आकर्षित थीं, लेकिन मैं सीधा सादा, पढ़ाकू किस्म का लड़का था, अतः उनपर ज्यादा ध्यान नहीं देता था। लड़कियों में एक, नैना नाम की लड़की तो मेरे पीछे ही पड़ गयी थी। वह सभी लड़कियों में ज्यादा स्मार्ट थी, बदमाश थी एक नंबर की। उमर भी हम लोगों से अधिक ही थी। पढ़ाई लिखाई में बाबाजी। दो बार एक ही क्लास में फेल हो चुकी थी। एकदम पकी पकाई जवान हो चुकी थी। खूबसूरत थी, भरा भरा गदराया बदन था उसका। एक दिन क्लास के बाद वह मेरे पीछे क्लास से निकली और मेरे पीछे पीछे चल पड़ी।

“पंकज, जरा रुक ना।” मैं रुका नहीं, और तेज चलने लगा। मैं लड़कियों के हॉस्टल को पार कर चुका था लेकिन वह अपने हॉस्टल में जाने की बजाए मेरे पीछे पीछे ही आ रही थी।

“अरे रुक ना।” मैं फिर भी रुका नहीं। उसने आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लिया। करीब सौ मीटर आगे लड़कों का हॉस्टल है। जहां उसनें मेरा हाथ पकड़ा, वहां सड़क के बगल में ऊंची ऊंची घनी झाड़ियां थीं।

“सुना नहीं? मैं तुम्हीं से कह रही हूं।”

“छोड़ो मुझे।” मैंने उसका हाथ झटकने की कोशिश की, लेकिन उसकी पकड़ मजबूत थी। मैं जोर जबर्दस्ती नहीं करना चाहता था।

“नहीं छोड़ूंगी।” जिद पर आ गयी।

“छोड़ो नहीं तो ठीक नहीं होगा।” मैं गुस्से से बोला।

“तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो ठीक नहीं होगा।”

“क्या करोगी तुम?”

“चिल्लाऊंगी।”

“क्या बोलोगी लोगों को?”

“यही कि पंकज मुझे छेड़ रहा है।” उसकी बात सुनकर मैं डर गया।

“बोलो, क्या बोलना है?”

“यहां नहीं, उधर चलो।” झाड़ियों की ओर इशारा कर रही थी। शाम का समय था। ठंढ के मौसम में पांच बजते बजते ही अंधेरा होने लगा था। मैं खिंचता चला गया। मुझे खींचते हुए झाड़ियों की बीच घुस गयी। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, मैं झाड़ियों के उस पार था, नैना के साथ। नीचे हरी भरी घास थी। ऐसा लग रहा था मानो नैना वहां पहले भी कई बार आ चुकी है।

“यह कहाँ ले आई?”

“अरे आओ तो। आओ, बैठो यहां।”

“नहीं, जो बोलना है जल्दी बोलो। मुझे जाना है।”

“तू बैठ तो।” जबर्दस्ती खींच कर बैठने को मजबूर कर दी। मैं बेबसी में बैठने को मजबूर हो गया।

“बोलो, क्या बोलना है?”

“आई लव यू।” मुझ से लिपट कर बोली।

“हट, परे हट। यह क्या है?” मैं झल्ला कर बोला।

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“यह प्यार है।” वह मुझे चूमने लगी।

“हट।” मैंने उसे झटक कर अलग कर दिया।

“चुपचाप पड़े रह, वरना मैं चिल्लाऊंगी।” वह धमकी देने लगी। मैं डर गया और चुपचाप बैठ गया। अब उसनें मेरा हाथ अपनी छाती पर रख दिया।

“देख क्या रहा है, दबा इसे।” उसनें हुक्म दिया। मैं डरते डरते उसकी कमीज के ऊपर से ही उसके बड़े बड़े सख्त चूचियों को धीरे धीरे दबाने लगा।

“आह, आह, अच्छा लग रहा है। ओह ओह।” कहते हुए उसनें मेरी जांघ सहलानी शुरू की। मेरे शरीर में सुरसुरी होने लगी। उसनें मेरा हाथ अपनी जांघ पर रख दिया और कहा, “सहलाओ मेरी जांघ को।” और मैं उसके सलवार के ऊपर से ही उसकी जांघ सहलाने लगा।

“और ऊपर।” उसनें कहा और मैं उसकी जांघों के और ऊपर सहलाने लगा।

“और ऊपर।” उसनें कहा और मैं और ऊपर सहलाने लगा। इस तरह धीरे धीरे मेरा हाथ उसकी जांघों के जोड़ तक पहुंच गया। जैसे ही मेरा हाथ वहां पहुंचा, वह मुझसे चिपक गयी। “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह पंकज, ओह्ह्ह्ह्ह्ह रज्जा। हां हां ओह्ह्ह्ह्ह्ह, वहीं, वहीं, सहलाओ रज्जा।” मैंने अपनी उंगलियों पर गीलेपन का अहसास किया। उस वक्त मुझे पता नहीं था कि यह उसकी चूत से निकलता हुआ संभोगपूर्व लसीला पानी है। मुझे लगा था उसका पेशाब निकल रहा है। मुझे थोड़ी घिन हो रही थी, फिर भी सहलाता जा रहा था। मुझे अब उसकी चूचियां दबाना और चूत सहलाना अच्छा लग रहा था। इस दौरान उसका हाथ मेरे पैंट के ऊपर से ही मेरे लंड के ऊपर नाच रहा था। मेरे शरीर में खून की रफ्तार तेज हो गयी थी। मेरा लंड सख्त हो रहा था ओर मेरे जंघिया के अंदर मानो मेरे लंड का दम घुटने लगा। मैं बेचैन हो उठा। मन हो रहा था पैंट और जंघिया उतार फेंकूं, लेकिन शर्म के मारे ऐसा करने में झिझक रहा था।

“आह आह, अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा है, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, रज्जा, अब चोद डाल मुझे।” वह अपने कपड़े उतारने लगी। मैं हतप्रभ देखता रह गया। देखते ही देखते वह नंगी हो गयी। मेरी आंखें फटी की फटी रह गयीं। बड़ी खूबसूरत लग रही थी। पहली बार किसी लड़की का नंगा बदन इस तरह मेरे सामने था। मेरे तन बदन में मानो आग लग गयी थी। मैं बेध्यानी में, अनजाने में ही, खुद को रोक पाने में असमर्थ, उत्तेजना के आवेश में उसे दबोच लिया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं करूं तो क्या करूं। मैं उसके नंगे जिस्म को अपनी बांहों में दबोच कर चूमने लगा। यहां तक तो अपने आप हुआ, लेकिन इसके आगे क्या? मैं उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को सहला रहा था, दबा रहा था। उसकी चूत के ऊपर हल्के रोयें उगे हुए थे। मेरा हाथ खुद ब खुद उसकी चूत पर पहुंच गया। मैं उसकी चूत पर हाथ फिराने लगा था। उसकी चूत से लसलसा द्रव्य निकल रहा था।

“आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह इस्स आह, चोद, आह अब चोद डाल मुझे आह।” वह तड़प उठी।

“कैसे? कैसे चोदूं?” मैं अनजान खिलाड़ी था। मुझे भी अपने शरीर के तनाव से मुक्त होना था लेकिन कैसे? यह मुझे पता नहीं था।

“अरे मूर्ख, उतार अपने कपड़े और अपना लंड मेरी चूत में डाल कर चोद गधे।” वह जल बिन मछली की तरह तड़पती हुई मेरे कपड़ों को उतारने में मदद करने लगी। मैं भी अपने कपड़ों से जल्द से जल्द मुक्त होना चाह रहा था। मेरे दिमाग में यह समझ नहीं आ रहा था कि उसकी चूत में अपना लंड कैसे डाल पाऊंगा। मुझे पता था कि मेरा लंड कितना बड़ा है लेकिन नैना को पता नहीं था। इतना तो निश्चित था कि नैना इस खेल की अभ्यस्त थी। मुझे लगता था कि मेरे लंड का आकार सामान्य लड़कों की भांति है और जब नैना खुद आमंत्रण दे रही थी तो मुझे लगा कि उसके लिए यह सामान्य बात है। उस वक्त माहौल बेहद गरम हो चुका था। मैं अब अपने नियंत्रण में नहीं रह गया था। आननफानन मैं भी अपने कपड़ों से मुक्त हो गया। एक पल तो वह मेरे गठे हुए शरीर की छटा देख कर नि:शब्द रह गयी। जैसे ही उसकी नजर मेरे फनफनाते लंड पर पड़ी तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गयीं।

“बा्आ्आ्आ्आप रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आप, इत्तन्ना्आ्आ्आ बड़ा्आ्आ्आ्आ लंड! न न न न नहींईंईंईंईंईंईंईंई।” बह घबरा गयी थी।

“क्या नहीं?”

“न न न न, तुम छोड़ो मुझे। छोड़ दो। रहने दो। मत चोदो।” वह डर गयी थी मेरा लंड देख कर।

“इतनी दूर तक आ कर अब कैसे छोड़ दूं।” अब मैं उसे छोड़ने के मूड में नहीं था। मुझे गरम उसी ने किया था और अब जब मेरा शरीर उस गरमी में झुलस रहा था तो उसका मना करना बहुत बुरा लगा मुझे। मैं अपने आपे में नहीं था। मैंने झपट्टा मारकर उसे दबोच लिया।

“छोड़ो मुझे।”

“अब नहीं छोड़ूंगा।”

“छोड़ो नहीं तो चिल्लाऊंगी।”

“चिल्लाओगी हरामजादी, अभी तक कह रही थी चोदो चोदो, अब क्या हुआ?” मैंने गुस्से मैं एक झापड़ लगा दिया। अब मेरा रौद्र रूप देख कर वह सहम गयी। मैं अपना नियंत्रण खो चुका था। मुझे पता नहीं कि यह चोदना क्या होता है। जैसा उसने बताया उसके अनुसार लंड को चूत में डालने का मतलब चोदना होता है। मेरे अंदर तनाव का आलम यह था कि उस तनाव से मुक्ति के लिए तड़प रहा था। नासमझी में ही सही, इतना तो पता चल ही गया था कि चोदने की इस क्रिया में अवश्य आनंद प्राप्त होता है, तभी तो नैना तब से चोदो चोदो की रट लगाए हुए थी। यह अलग बात है कि मेरे लंड के आकार से वह भयभीत हो उठी थी। मुझे तनाव से मुक्त होना था और मुझे महसूस हो रहा था कि अपने लंड के माध्यम से ही मुझे इस तनाव से मुक्ति मिलेगी। नैना के द्वारा चोदने के लिए उकसाये जाने के पीछे भी अवश्य यही कारण था। मैं अब और इंतजार नहीं कर सकता था।

“चुपचाप चोदने दे।” मैं गुर्राते हुए बोला।

“नहीं।” वह अब भी मेरी पकड़ में छटपटा रही थी।

“मानोगी नहीं?”

“नहीं।”

“तो जबर्दस्ती चोदूंगा।”

“नहीं, तेरा लौड़ा बहुत बड़ा है। फट जाएगी मेरी चूत।”

“फटने दे।” चोदने के इतने करीब पहुंच कर अब मैं पीछे हटने वाला नहीं था। निर्दयता पूर्वक उसे नीचे पटक दिया। मैं जोश में अंधा हो चुका था, जानवर बन चुका था।

“नहीं, बहुत दर्द होगा।”

“तो मैं क्या करूं? तुम्हीं बोल रही थी चोदो चोदो। अब मेरा लंड इतना बड़ा है तो मैं क्या करूं।”

“डर लग रहा है।”

“तेरे डर की ऐसी की तैसी।” मैं उस पर चढ़ बैठा और वह छटपटाने से भी लाचार हो गयी थी। मैं जोश में आकर उसकी चूचियों को बेदरदी से मसलने लगा। मुझे बड़ा मजा आ रहा था। उसे चूमने लगा। उसकी चूत सहलाने लगा। इन सबका नतीजा यह हुआ कि धीरे धीरे उसका छटपटाना बंद हो गया। अब मैं और उत्साहित हो उठा। उसके पैरों को फैला कर उसकी लसलसी चूत पर अपना लंड रख दिया। उसे आभास हो गया कि अब हमला होने वाला है।

अंतिम बार मरी मरी सी आवाज में रोने गिड़गिड़ाने लगी, “मत करो ना, इतने जालिम न बनो प्लीज।”

“अरे रो काहे रही है? डर मत, कुछ नहीं होगा।” मुझे क्या पता था कि लंड जब घुसेगा तो उसका क्या होगा क्या नहीं होगा, मुझे तो बस चोदना था। मंजिल इतना करीब था, उत्सुकता और उत्तेजना के मारे मैं पागल हुआ जा रहा था। अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मैं अपने लंड पर दबाव देने लगा।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह नहीं।” वह रोते रोते बोली।

“रोना गाना बंद कर हरामजादी, चुपचाप पड़ी रह। घुसा रहा हूं लंड।” मैं उसके रोने से खीझ उठा था। बहुत टाईट थी उसकी चूत। चूत से निकले लसलसे रस और मेरे लंड से निकलते हुए रस के कारण फिसलते हुए मेरा लंड उसकी चूत को फैलाता हुआ घुसता चला जा रहा था। बहुत गरमी थी उसके चूत के अंदर।

“ओह्ह्ह्ह्ह्ह मांआंआंई्ई्ई्ई्ई गे्ए्ए्ए्ए, मरी मैं मरी आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” वह दर्द से बेहाल हो रही थी लेकिन मुझे तो बस चोदने की पड़ी थी। उसकी चूत को फाड़ता हुआ घुसाता चला गया, घुसाता चला गया, पूरा जड़ तक घुसा बैठा।

“देख, हो गया न, पूरा घुस गया।” मैं बोला।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह नहीं ््ईंंईंईंईंईंईंईंईंई, ओह्ह्ह्ह्ह्ह फट गयी मेरी चूत ओह मांआंआंई्ई्ई्ई्ई।” वह चीख पड़ी।

“चुप साली, एकदम चुप।” मैं गुस्से से बोला। मैं कुछ देर वैसा ही पड़ा रहा। मुझे लगा मेरा लंड भट्ठी में घुसा हुआ है। मैं एक झटके में लंड बाहर खींच लिया। अंदर घुसा कर बाहर निकालने की इस क्रिया में मुझे बड़ा अच्छा लगा। जैसे ही मैं लंड बाहर निकाला, नैना नें राहत की लंबी सांस खींची, लेकिन मैं लंड बाहर निकाल कर बेचैन हो उठा, अतः दुबारा घुसाने को तत्पर हो गया। अब मैं और रहम दिखाने के मूड में नहीं था। मुझे मजा मिल चुका था। लंड घुसाने और निकालने में मेरे लंड पर चूत का जो घर्षण हुआ, उससे मुझे बड़ा मजा आया। मैं दुबारा लंड घुसा दिया।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” नैना फिर चीखी, मगर इस बार थोड़ी धीमे से। शायद मेरे डर से या फिर उसे तकलीफ कम हुई। फिर तो अब मैं शुरू हो गया। उसकी गांड़ के नीचे हाथ रख कर शुरू में थीरे धीरे अंदर बाहर करता रहा, फिर दनादन दनादन ठोकने लगा। अब नैना चीख चिल्ला नहीं रही थी। उसकी चूत भी थोड़ी ढीली हो गयी थी। मुझे तो मानों स्वर्ग मिल गया था। खूब जम के चोदने लगा। मुझे आश्चर्य और खुशी हो रही थी कि अब नैना भी मेरी कमर पकड़ कर अपनी कमर उछाल उछाल कर मेरे धक्के का जवाब देने लगी थी।

“आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह आह।” उसके मुंह से आनंद की आहें निकल रही थीं। उसकी आंखें बंद थीं। मैं और उत्साहित हो कर धमाधम चोदने लगा, तभी, “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह््ह््ह््हह्हह्ह्ह्ह म्म्म्म्म्आं्आं्आं्आं,” कहते हुए मुझसे जोर से चिपक गयी। उसका बदन थरथराने लगा। मुझे ऐसा लगा मानों उसकी चूत मेरे लंड को चूसने लगी हो। फिर उसका शरीर शिथिल हो गया। कुछ पलों के लिए मुझे समझ नहीं आ रहा था। लेकिन उन कुछ पलोंं की दुविधा भरे ठहराव से मेरे अंदर की आग और भड़क उठी। मैं फिर चालू हो गया, उसके शिथिल पड़ते शरीर का भुर्ता बनाने। फच फच चट चट की आवाज बढ़ गयी। मेरे दनादन ठुकाई से हलकान होने की बजाय पांच मिनट बाद ही वह फिर अपने रंग में आ गयी। “आह ओह पंक पंक पंकज्ज्ज्ज ओह राम ओह मांआंआंई्ई्ई्ई्ई ओह्ह्ह्ह्ह्ह, चोद चोद आह साले कुत्ते मादरचोद मां के लौड़े, चोद चोद आह।” ऐसे ही बड़ बड़ करती कमर उछाल उछाल कर मुझसे चिपकी जा रही थी। तभी, और तभी मेरे अंदर का ज्वालामुखी मानो फटने लगा। मेरा शरीर तनने लगा और मैं पूरी शक्ति से नैना को जकड़ कर चिपक गया। उफ वे पल। मैं कभी नहीं भूल सकता। मेरे लंड से फच्च फच्च लंड का रस निकलने लगा, “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह ई्ई्ई्ई्ई्ई ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ स्स्स्स्स्स्आ्आ्आ्आली्ई्ई्ई्ई्ई नै्ऐ्ऐ्ऐ्ऐ्ऐन्न्न्ना्आ्आ्आ्ह्ह्ह।” उफ, ये थे मेरे मुंह से निकलने वाले उद्गार। तभी दुबारा नैना भी थरथरा उठी और छिपकली की तरह चिपक गयी मुझ से। करीब तीन चार मिनट तक हम यूं ही एक दूसरे से चिपके रहे फिर हमारा शरीर ढीला पड़ गया। मेरे शरीर का सारा तनाव लंड के रास्ते बाहर आ गया। मेला लंड भी ढीला हो गया और फच्चाक की आवाज के साथ चूत से बाहर निकल आया। सफेदी और खून से लिथड़ा हुआ। मगर अब नैना को अपने चूत के फटने या खून निकलने की कोई परवाह थी। वह तो थकी मांदी, शिथिल पड़ी लंबी लंबी सांसें ले रही थी। उसके होंठों पर मुस्कान थी, संतुष्टि की, खुशी की। मैं बड़ा खुश था। उस दिन से पहले कभी पता ही नहीं था कि लड़की चोदने में इतना आनंद है।

“अब?” मैं बोला।

“अब क्या?” वह अलसाई सी बोली।

“चलना नहीं है क्या?”

“हां, चलना तो है।” बड़ी बेमन से बोली।

“तो कपड़े पहन मां की चूत।” मैं झल्ला उठा। मेरी शराफत का बेड़ा गर्क हो गया था उसी दिन।

“मन नहीं हो रहा जाने को।”

“तो पड़ी रह कुतिया।”

“ऐसे न बोल रज्जा।”

“तो कैसे बोलूं।”

“प्यार से बोल।”

“अच्छा मेरी लंडरानी अब उठ।”

“वाह यह अच्छा है, लंडरानी। वाह मेरे चूत के राजा। देखो तो, मेरी चूत का क्या हाल कर दिया तूने?” सच में उसकी चूत की हालत ऐसी हो गयी थी कि किसी गधे से चुदी हो। फूल कर कुप्पा हो गयी थी। खून और वीर्य से लिथड़ा।

“अरी छोड़ यह सब, कैसा लगा, ये बता।”

“आह राजा, यह भी पूछने की बात है? आज से पहले ऐसा मजा किसी से नहीं मिला।”

“ओह, मतलब तू पहले ही और लोगों से चुद चुकी है?”

“हां मगर तू पहला मस्त मर्द मिला।”

“अच्छा, कितने लोगों से चुदी है आज तक?”

“सात”

“कौन कौन हैं?”

“हमारे कॉलेज का साईंस फैकल्टी, सिंह बाबू, क्लास के चार लड़के, हमारे कैंटीन का कैटरर और एक ऑटोवाला।”

“बाप रे, मतलब तू एक नंबर की लंडखोर हो, फिर भी मेरे सामने रोना गाना कर रही थी साली रंडी।” मैं चकित था।

“तेरा लंड है ही इतना्आ्आ्आ्आ भयानक।”

“तो अब ठीक है न मेरा लंड?”

“हां बाबा हां, मस्त है।”

“तो अब चोदने दोगी रोज?”

“रोज? हां, मगर दो दिन तक तो नहीं। देख नहीं रहे, फाड़ के रख दिया मां के लौड़े। दो दिन तो आराम करने दे। सिकाई करनी होगी, मलहम लगाना होगा।”

“ठीक है ठीक है, मगर मेरे लंड का क्या होगा? चूत का मजा मिल गया है ना। अब बिना चोदे रहा नहीं जाएगा।”

“चूत क्या, पूरी लड़की, औरत मिलेगी। आखिर इतना मस्त लौंडा और इतना मस्त लंड कहाँ मिलेगा। जिसे मिलेगा उसकी तो किस्मत खुल जाएगी।”  कहकर वह उठी और कपड़े पहनने लगी। मैं आश्वस्त हो गया। हम दोनों वहां से करीब सात बजे निकले।

” बस उस दिन से शुरू हो गयी मेरी चुदाई यात्रा।””””

कहकर वह चुप हुआ लेकिन इतनी देर में मैं उसके लिंग को सहलाते सहलाते स्खलन के कागार पर ले आई थी। उसके लिंग का आकार भी अविश्वसनीय रूप से बढ़ कर विकराल रूप धर चुका था।

“आह आह मेरा लंड पानी छोड़ने वाला है आह। पी जाईए ओह मुंह में ले लीजिए आंटी आह।” वह उत्तेजना के मारे बोला।

“आंटी नहीं मां बोल, तब।” मैं बोली। हालांकि उतने बड़े लिंग को मुंह में लेना संभव नहीं था तथापि बोली।

“अरे हां मेरी मां, हां मम्मी चूस साली रंडी मम्मी।” वह मेरा सर पकड़ कर अपने लिंग के पास लाया। मैंने दोनों हाथों से उसका लिंग थामा और मुंह में लेने का उपक्रम करने लगी। तभी उसने एक जोर का झटका मारा और अपना लिंग मेरी हलक तक उतार दिया और छर्र छर्र अपना वीर्य छोड़ने लगा। मेरा तो दम घुटने घुटने को हो आया था। मैं गटागट उसका नमकीन वीर्य हलक से उतारती चली गयी। जैसे ही उसका स्खलन पूर्ण हुआ उसने मुझे मुक्त कर दिया। मेरी जान में जान आई। उसके लिंग से वीर्य अब भी टपक रहा था जिसकी कुछ बूंदें मेरी कुर्ती पर गिरीं मगर मुझ कोई गिला नहीं था।

“वाह आंटी। मजा आ गया।”

“आंटी नहीं मम्मी।”

“ओके मम्मी।”

“हां, यह ठीक है। तू भी कम नहीं है। एक नंबर का हरामी चुदक्कड़ बेटा। बड़ा सुख दिया रे।” मैं खड़ी होते हुए बोली।

“तो अब मम्मी को चोदने उसका बेटा आएगा।” वह खुश हो कर बोला।

“हां, मेरा मादरचोद बेटा।”

अब तक रात हो चुकी थी। हमारा बाहर निकले हुए करीब डेढ़ घंटे बीत चुके थे। पता नहीं क्या सोच रहे होंगे रेखा और तीनों चुदक्कड़ बूढ़े। यही सोचते हुए हम घर में दाखिल हुए।

आगे की कहानी अगली कड़ी में। तबतक के लिए अपनी कामुक लेखिका को आज्ञा दीजिए।

रजनी

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