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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 6)

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मेरे दरवाजे पर दस्तक के साथ मम्मी की आवाज़ “अरे तुझे जाना है कि नहीं, घड़ी देखो 7 बज रहे हैं।” सुन कर मैं बदनतोड़ चुदाई से थकी, अथमुंदी आंखों से अलसाई सी उठती हुई बोली, “हां बाबा हां पता है जाना है, तैयार होती हूं,” मन में तो कुछ और ही बोल रही थी, “तुम लोगों के नाक के नीचे जब तीन तीन हवस के पुजारी बूढ़ों से रात को नुच चुद कर छिनाल बन रही थी तो घोड़े बेच कर सो रही थी और अब बड़ी आई है मुझे उठाने।”

खैर उठी और तैयार हो कर नाश्ते के टेबल पर आई तो देखा तीनों बूढ़े मुस्कुराते हुए मुझे ही देख रहे थे। मेरी बदली हुई चाल पर सिर्फ उन्हीं ने ध्यान दिया था क्योंकि ये उन्हीं के कमीनी करतूतों का नतीजा था। मैं उनपर खीझ भी रही थी और प्यार भी आ रहा था। ” साले हरामी बूढ़े, चोद चोद कर मेरे तन का कचूमर निकाल दिया और अब खींसे निपोरे हंस रहे हैं।” मैं खिसियानी सी मुस्कान के साथ उनसे बोली, “आपलोग तैयार हो गये क्या?”
“ये तो कब से तैयार बैठे तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे हैं।” पापा बोले, “जल्दी नाश्ता करो और निकलने की तैयारी करो, मैं तुमलोगों को बस स्टैंड तक छोड़ दूंगा।” मैं नाश्ता कर के उन लोगों के साथ बस स्टैंड पहुंची। पापा ने हमलोगों का टिकट कटा कर बस में बैठाया और जब हमारी बस छूटने को थी, वे वापस लौट गए।

जब बस छूटी उस समय 9 बज रहा था। मौसम काफी खराब हो रहा था, घने बादल के साथ जोरों की बारिश शुरू हो चुकी थी। दिन में ही रात की तरह अंधकार छाया हुआ था। बस की सीट 3/2 थी। 3 सीटर सीट में मुझे बीच में बैठाकर दाहिनी ओर नानाजी और बाईं ओर बड़े दादाजी बैठ गये। दूसरी ओर 2 सीटर पर दादाजी बैठे कुढ़ रहे थे और बार बार हमारी ओर देख रहे थे। ये लोग धोती कुर्ते में थे और मैं स्कर्ट ब्लाउज में। तीन दिनों के ही नोच खसोट में मेरा ब्लाउज टाईट हो गया था और मैं काफी निखर गई थी। सीट का बैक रेस्ट इतना ऊंचा था कि हम पीछे वालों की नज़रों से छिप गए थे।

बगल वाले 2 सीटर पर दादाजी के साथ एक और करीब 60 – 62 साल का मोटा ताजा पंजाबी बूढ़ा बैठा हुआ था। बस जैसे ही चलने लगी, मैं ने अपनी दाई जांघ पर नानाजी के हाथ का रेंगना महसूस किया और बाईं जांघ पर बड़े दादाजी का हाथ रेंगने लगा।

तभी “टिकट?” कंडक्टर की आवाज आई, मैं ने देखा दुबला पतला काला कलूटा टकला, ठिगना, करीब 4 फुट 10 इंच का, 50-55 साल का, अपने सूअर जैसे चेहरे पर पान खा खा कर लाल मुंह में बाहर की तरफ भद्दे ढंग से निकले काले काले दांत निपोरे बड़ी अश्लीलता से मुझे देखता हुआ मुस्कुरा रहा था। हमारे चेहरों का रंग उड़ गया था। झट से बूढों ने अपने हाथ हटा लिए। मगर शायद उस कंंडक्टर की नज़रों ने इनकी कमीनी करतूतों को ताड़ लिया था। फिर वह मुस्कराते हुए अन्य यात्रियों के टिकट देखने आगे बढ़ा।

मेरा दिल धाड़ धाड़ धड़क उठा।। फिर भी ये खड़ूस बूढ़े अपनी गंदी हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे। मैं ने हल्का सा प्रतिरोध किया, “ये क्या, यहां भी शुरू हो गये हरामियों।” मैं फुसफुसाई। मगर इन कमीनो पर कोई असर नहीं हुआ।

“अरे कोई नहीं देख रहा है बिटिया, तू बस चुपचाप मज़ा ले”, नानाजी फुसफुसाए। धीरे धीरे मै उत्तेजित होने लगी और मैं ने भी अर्धचेतन अवस्था में उनकी जांघों पर हाथ रख दिया। दादाजी कनखियों से हमारी हरकतों को देख देख कुढ़ते रहे।

दादाजी के बगल वाले सरदारजी का ध्यान भी हमारी हरकतों पर गया था जिसका अहसास हमें नहीं था। वे भी खामोशी से कनखियों से हमारी इन कमीनी हरकतों को देख रहे थे। धीरे धीरे नानाजी और बड़े दादाजी का हाथ मेरी जांघों में ऊपर सरकने लगा और स्कर्ट के अंदर प्रवेश कर मेरी फूली हुई चूत को पैन्टी के ऊपर से ही सहलाने लगे। “आ्आ्आह” मेरी सिसकारी निकल पड़ी। मेरी आंखें अधमुंदी हो गई। बेध्मानी में मेरे हाथ उनकी धोती सरकाकर कब उनके टनटनाए खंभों तक पहुंचे मुझे पता ही न चला। इधर उनके हाथ मेरी पैंटी के अंदर प्रवेश कर मेरी चूत सहलाने लगे और उधर उनके अंडरवियर के अंदर मेरे हाथों की गिरफ्त में थे उनके गरमागरम टनटनाए गधे सरीखे विशाल लंड। उत्तेजना के आलम में मेरी लंबी लंबी सांसें चल रही थीं जिस कारण मेरा सीना धौंकनी की तरह फूल पिचक यह था। वे भी लंबी लंबी सांसें ले रहे थे। अब और रहा नहीं जा रहा था, वासना की ज्वाला में हम जल रहे थे।

बड़े दादाजी ने मेरे कान में फुसफुसाया, “हमार गोदी में आ जा बिटिया,” मैं किसी कठपुतली की तरह कामोत्तेजना के वशीभूत सम्मोहन की अवस्था में उनकी गोद में बैठ गई। बड़े दादाजी ने धीरे से धोती हल्का सा सरकाया, अपना मूसलाकार लंड अंडरवियर से बाहर निकाला, मेरे स्कर्ट को पीछे से थोड़ा उठाया, पैंटी को चूत के छेद के एक तरफ किया और फुसफुसाया, “थोड़ा उठ,” मैं हल्की सी उठी, उसी पल उन्होंने लंड के सुपाड़े को बुर के मुंह पर टिकाया और फुसफुसाया, “अब बैठ”। मैं यंत्रचालित बैठती चली गई और उनका फनफनाता गधा सरीखा लौड़ा मेरी चूत रस से सराबोर फूली फकफकाती बुर को चीरता हुआ मेरे बुर के अंदर पैबस्त हो गया। “आआआआआआआआआआह” मेरी सिसकारी निकल पड़ी। “आह रानी, बड़ा मज़ा आ्आ्आ् रहा है,” बड़े दादाजी फुसफुसाए। ऊपर से देखने पर किसी को भनक तक नहीं लग सकता था कि हमारे बीच क्या चल रहा है। सब कुछ मेरी स्कर्ट से ढंका हुआ था।

टूटी-फूटी सड़क पर हिचकोले खाती बस में अपनी चूत में बड़े दादाजी का लौड़ा लिए बिना किसी प्रयास के चुदी जा रही थी। बीच-बीच में बड़े दादाजी नीचे से हल्का हल्का धक्का मारे जा रहे थे। ” आह मैं गई” फुसफुसा उठी और मेरा स्खलन होने लगा। अखंड आनंद में डूबती चली गई। “आ्आ्आह”। मगर यह बड़े दादाजी भरे बस में इतने यात्रियों के बीच बड़े आराम से मुझे चोदे जा रहे थे और मैं भी फिर एक बार जागृत कामोत्तेजना में मदहोश चुदती हुई एक अलग ही आनंद के सागर में गोते लगा रही थी, इस तरह दिन दहाड़े यात्रियों के बीच चुदने के अनोखे रोमांचक खेल में डूबी चुदती चुदती निहाल हुई जा रही थी।
अचानक बड़े दादाजी ने मुझे कस कर जकड़ लिया और उनका लंड अपना मदन रस मेरी चूत में उगलने लगा और एक मिनट में खल्लास हो कर ढीले पड़ गए। इस बार मैं अतृप्त थी, मैं खीझ उठी मगर नानाजी ने स्थिति की नजाकत को भांपते हुए कहा, “अब तू मेरी गोद में आ जा। तेरे बड़े दादाजी थक गये होंगे।”

मैं बदहवास तुरंत नानाजी की गोद में ठीक उसी तरह बैठी जैसे बड़े दादाजी की गोद में बैठी थी।
उनका कुत्ता लंड जैसे ही मेरी चूत में घुसा,”आह्ह्ह्” मेरी जान में जान आई। फिर वही चुदाई का गरमागरम खेल चालू हुआ। इस बार 5 मिनट में ही मैं झड़ गई। नानाजी तो इतनी देर से अपने को बमुश्किल संभाले हुए थे, इतनी आसानी से कहां छोड़ने वाले थे भला। करीब 20 मिनट की अद्भुत चुदाई के बाद फचफचा कर झड़ना लगे, और इसी पल मैं भी झरने लगी। ” हाय मैं गई” यह मेरा दूसरा स्खलन था। अचानक मेरा दिल धड़क उठा, हाय, नानाजी का लौड़ा तो मेरी चूत में फंस चुका था। अब क्या होगा? मैं परेशान हो गई।

इसी समय बस भी रुकी और कंडक्टर की आवाज आई, “जिसको जिसको चाय पीना है पी लीजिए। 10 मिनट बाद हम चलेंगे।” मैं बड़ी बुरी फंसी। “अब क्या होगा?” मैं फुसफुसाई। “अरे कुछ नहीं होगा तू चुपचाप बैठी रह” नानाजी फुसफुसाए। “अरे भाई इतनी बारिश में कौन बस से उतरेगा, दिमाग खराब है क्या? चलो चलो।” सभी यात्री एक स्वर में बोले। मेरी जान में जान आई और मैं ने चैन की लम्बी सांस ली। बस आगे चल पड़ी। करीब 25 मिनट तक उनका लंड मेरी चूत में अटका पड़ा था। 25 मिनट तक लंड फंसे रहने के कारण मैं फिर से उत्तेजित हो चुकी थी। जैसे ही उनके लंड से मुक्ति मिली मैं ने चैन की सांस ली।

“अब मेरा नंबर है” मेरे कानों में दादाजी की फुसफुसाहट सुनाई पड़ी। नानाजी ने बिना किसी हीले हवाले के दादाजी के साथ सीट की अदला बदली कर ली। “हाय, अब दादाजी भी चोदेंगे” वैसे भी अबतक मैं फिर से उत्तेजित हो कर चुदने को तैयार हो चुकी थी। आनन फानन में फिर उसी तरह चुदने का क्रम चालू हो गया। दादाजी के साथ आधे घंटे तक चुदाई चलती रही। अभी दादाजी नें अपना वीर्य मेरी चूत में झाड़ना चालू किया कि मैं भी थरथरा उठी और तीसरी बार छरछरा कर झ़ड़ने लगी। यह स्खलन थोड़ा लंबा चला और जैसे ही हम निवृत हुए, एक और फुसफुसाहट मेरे कानों में आई, ,” कुड़िए अब मेरा नंबर है,” मैं झुंझलाहट से मुड़ कर देखी तो मेरा गुस्से का पारावार न रहा, दादाजी के सीट की बगल वाला लंबा-चौड़ा सरदार खड़ा था। इससे पहले कि मैं कुछ बोलूं, उसने चुप रहने का इशारा किया और अपना मोबाइल निकाल कर मुझे दिखाते हुए धीरे से कहा, “जरा इसको देखो” कहते हुए दादाजी को उठा कर उनकी सीट पर बैठ गया और जो कुछ दिखाया उसे देख कर मेरे छक्के छूट गये। हमारी सारी कामुक हरकतों की वीडियो थी।

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मेरी तो बोलती बंद हो गई। “चुपचाप अब तक जो हो रहा था, मुझे भी करने दे वरना…….” मैं समझ गई। अब यह सरदार मुझे चोदे बिना नहीं छोड़ेगा। मैं ने चुपचाप उनका कहा मानने में ही अपनी भलाई देखी। मैं ने अपने आप को परिस्थिति के हवाले छोड़ दिया। उधर दादाजी और नानाजी ने भी समझ लिया कि इस मुसीबत से बाहर निकलने का और कोई रास्ता नहीं है।

फिर सरदारजी ने मुझे उठ कर साथ चलने का इशारा किया और मैं उनके साथ यंत्रवत सबसे पीछे वाली सीट पर गयी जो पूरी तरह खाली थी। सबसे पीछे वाली सीट के आगे के सीट पर भी कोई नहीं था, मतलब यह कि सरदारजी को मेरे साथ मनमानी करने की पूरी आजादी थी। दादाजी, नानाजी और बड़े दादाजी चुप रहने को मजबूर थे और मैं उनकी मजबूरी समझ सकती थी। जैसे ही हम सीट पर बैठे, सरदारजी ने बड़ी बेसब्री से अपने पैजामे का नाड़ा ढीला कर आहिस्ते से नीचे खिसकाया और “हे भगवान” करीब साढ़े नौ इंच का 4″ मोटा फनफनाता लौड़ा फुंफकार उठा।

“नहीं मैं मर जाऊंगी सरदारजी” मैं फुसफुसाई।

“चुप रंडी, तीन तीन लौड़ा खा के मरने की बात करतीं है, चुपचाप मेरे लंड का मज़ा ले।” सरदार फुंफकार उठा। मैं क्या करती, बुरी तरह फंस चुकी थी। फिर उसने मेरी चड्डी पूरी तरह उतार दी और जैसे ही मेरी चुद चुद कर फूली चूत का दर्शन किया वह कामुकतापूर्ण मुस्कान से फुसफुसाया, “कुड़िए तू तो पूरी की पूरी तैयार मस्त माल है। तुझे चोदने में बड़ा मज़ा आएगा रानी। चल झुक कर पहले मेरा लौड़ा चूस।” और मेरा सिर पकड़ कर अपने लंड के पास ले आया। उस राक्षस जैसे सरदार का राक्षसी लंड देख कर मेरी तो घिग्घी बंध गयी। मैं थोड़ी हिचकिचाई तो सरदार ने जबर्दस्ती मेरा सिर पकड़ कर अपना दानवी लन्ड का मोटा सुपाड़ा मेरे मुंह में सटा दिया और मैं अपना मुंह खोल कर उस बदबूदार लंड को मुंह में लेने को मजबूर हो गई, नहीं तो पता नहीं वह और क्या रुख अख्तियार करता। मैं बड़ी मुश्किल से आधा लंड ही मुंह में ले सकी और चूसना शुरू कर दिया।

“आह मेरी रानी, ओह साली रंडी, चूस, और चूस कुतिया,” वह फुसफुसाये जा रहा था और मेरी चूत में अपनी मोटी उंगली पेल कर अंदर-बाहर करने लगा। अपनी उंगली से चोद रहा था और मैं पागलों की तरह उत्तेजित हो कर चपाचप लंड चूसे जा रही थी। करीब 5 मिनट बाद मैं फिर से झड़ने लगी, “आह ोोह हाय मैं गयी सरदारजी,” मेरे मुंह से फुसफुसाहट निकलने लगी थी। यह मेरा चौथा स्खलन था। मगर असली खेल तो अभी बाकी था।

मुझे सीधे सीट पर लिटा कर मेरे पैरों को फैला दिया और अपना दानवी लंड जो मेरी थूक से लिथड़ा हुआ था, मेरी चूत के मुहाने पर रखा और घप्प से एक ही करारे धक्के से मेरी चूत को चीरता हुआ जड़ तक ठोक दिया।

“हाय मैं मर जाऊंगी सरदारजी, आआआआआ” मैं फुसफुसाई। मेरी चूत फटने फटने को हो गई। “चुप साली रंडी, चुपचाप मेरे लन्ड का मज़ा ले और मुझे चोदने दे।” बड़ी वहशियाना अंदाज में फुसफुसाया कमीना। मेरी क़मर पकड़ कर एक झटके में पूरा लंड पेल दिया। “ओह मां मेरी तो सांस ही अटक गई थी।” फिर धीरे धीरे थोड़ा आराम और फिर सब कुछ आसान होने लगा। अब मैं भी आनंद के सागर में गोते खाने लगी, “अह ओह सरदारजी, चोद, चोदिए सरदारजी ओह राज्ज्ज्आ,” मैं पगली की तरह फुसफुसाए जा रही थी। ओह और अब जो भीषण चुदाई आरंभ हुआ, करीब 45 मिनट तक, “मेरी लंड दी कुड़िए, लौड़े दी फुद्दी, मेरी रांड, आज मैं तुझे दिखावांगा सरदार का दम रंडी,” बोलता जा रहा था और चोदता जा रहा था।

कुछ बस के हिचकोले और कुछ सरदारजी का झटका, “आह ओह कितना मज़ा, अनिर्वचनीय आनंद, उफ्फ।” मैं पागल हो चुकी थी। 10 मिनट में छरछरा कर झड़ने लगी “ओह गई मैं” कहते हुए झड़ गई। यह मेरा पांचवां स्खलन था। मैं तक कर चूर निढाल हो चुकी थी। मगर सरदार तो मेरे जैसी कमसिन लड़की की चूत पाकर पागलों की तरह चोदने में मशगूल, झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। करीब 45 मिनट की अंतहीन चुदाई के बाद जब उसने मुझे कस कर दबोचे अपना गरमागरम लावा सीधे मेरे गर्भाशय में भरने लगा, “ओह आह हाय” उफ्फ वह स्खलन, मैं तो पागल ही हो गई। सरदार का काफी लंबा स्खलन था और मैं उनके दीर्घ स्खलन से अचंभित और आनंदित आंखें मूंदकर उनके दानवी शरीर से चिपक कर अपने चूत की गहराइयों में उनके आधे कप के बराबर गरमागरम वीर्य का पान करते हुए निहाल हुई जा रही थी। यह हमारा सम्मिलित स्खलन था। यह मेरा छठवां स्खलन था। मैं थरथरा उठी।

“आह ओह राजा, हाय मेरे चोदू सरदारजी, आपके लंड की दीवानी बन गई मेरे बूढ़े सरदारजी,” मैं फुसफुसाई, और सरदारजी मुस्कुरा उठे।

“हां मेरी रांड, मेरा लंड भी तेरी चूत का दीवाना हो गया है मेरी कुतिया” सरदार कभी मुझे चोद कर निवृत्त हुआ ही था कि मेरे कानों में फुसफुसाहट सुनाई पड़ी, “अब मेरा नंबर है”, मैं ने चौंककर आंखें खोली तो देखा वही गंदा कंडक्टर बड़े भद्दे ढंग से मुस्कुरा रहा था। इससे पहले कि मैं कुछ मैं कुछ बोल पाती, सरदारजी मद्धिम स्वर में बोले, “इसे भी चोद लेने दो कुड़िए, इसी ने पीछे सीट खाली करवा कर चोदने का इंतजाम किया है। इसे भी खुश कर, याद रखना तेरा वीडियो मेरे पास है।।” मैं क्या कहती, उस गन्दे कंडक्टर से चुदने की कल्पना मात्र से ही मुझे घिन आ रही थी। मगर मैं सरदारजी के हाथों ब्लैकमेल होती हुई उस बेहद गन्दे घटिया इंसान को अपना तन सौंपने को मजबूर थी।

मुझे उसी अवस्था में छोड़ कर सरदारजी उठे और अपने पजामे का नाड़ा बांधकर अपनी सीट पर जा बैठे। मैं खामोशी से उसी तरह लेटी रही और उस वहशी कंडक्टर ने बड़ी बेसब्री से अपने पैंट को ढीला कर नीचे सरकाया। ओह भगवान, पूरा लंबें लंबे झांटों से भरा बेहद घिनौना काला खतना किया हुआ करीब 8 इंच का लंड, वितृष्णा से मेरा मन भर गया, मगर मैं मजबूर थी। ज्यों ही वह मेरे ऊपर आया, उसके तन से उठती पसीने और गंदगी की मिली जुली बदबूदार महक मेरे नथुनों से टकराई। मैं ने बड़ी मुश्किल से उबकाई को रोका और अपने मन को कड़ा कर उसके गंदे बदबूदार शरीर के हवस की भूख मिटाने के लिए अपने तन को परोस दिया। उस हरामी ने बड़ी बेताबी से झट से अपना लंड मेरी चुद चुद कर ढीली लसलसी चूत में अपना लंड ठोक दिया और दनादन किसी मशीन की तरह चोदना चालू किया। इसी दौरान वह अपने घिनौने मुंह से मुझे चूमता चाटता रहा और अपने हाथ की उंगली को मेरी चूत से निकलने वाली लसलसे रस से लथेड़ कर मेरी गांड़ में घुसा घुसा कर गांड़ का छेद फिसलन भरा बनाता रहा फिर बिना किसी पूर्वाभास के अपना पूरा लंड निकाल कर चूत से नीचे मेरी गांड़ में भक्क से एक ही बार में पूरा लंड उतार दिया।

“आह नहीं, गांड़ में नहीं,” मैं तड़प उठी और फुसफुसाई।

“चुप बुर चोदी, तेरा गांड़ तो इतना मस्त है, इसे चोदे बिना कैसे छोड़ दें। चुपचाप गांड़ चुदा हरामजादी।” वह फुसफुसाया। वह बड़े घिनौने ढंग से गांड़ का बाजा बजा रहा था और बड़बड़ कर रहा था,”आह साली गांडमरानी रंडी, ले मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में, आह क्या मस्त गांड़ है रे रंडी साली कुतिया।”

“हाय मैं मर गई, आह, ओह, अम्मा, इस्स्स।” मैं सच में आज इस बस में एकदम रंडी बन गई। करीब 20 मिनट तक चोदता रहा और मैं इस बीच इतने गन्दे घटिया इंसान से इतने घिनौने तरीके से चुदती हुई आश्चर्यजनक ढंग से फिर उत्तेजना में भर कर इस कमीने कंडक्टर के संग कामुकतापूर्ण खेल में आनंदमग्न बराबर की हिस्सेदार बन गई और मेरा बड़बड़ाना भी चलता रहा, “चोद साले मादरचोद कंडक्टर, कमीने, अपनी रंडी बना ले कुत्ते, हाय राजा, ओह मेरे गांड़ के रसिया, चोद ले हरामी बेटी चोद।”

करीब 20 मिनट की धक्कमपेल के बाद वह कमीना अपना वीर्य मेरी गांड़ में भरना शुरू किया और इसी समय मैं भी झड़ने लगी। “आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओह, मैं गई रे बेटी चोद, आ्आ्आह।” मैं वहीं लस्त पस्त निढाल पड़ गई और वह जालिम कंडक्टर संतुष्टि की मुस्कान के साथ अपने गंदे होंठ चाटता हुआ मेरे ऊपर से उठा, अपना पैंट पहन कर मुस्कुराता हुआ वहां से हट कर सामने चला गया। मैं कुछ देर उसी तरह नुची चुदी थक कर चूर पड़ी रही फिर धीरे धीरे उठी, पैंटी पहनी और भारी कदमों से आकर अपनी सीट पर धम्म से बैठ गई। बस में मेरे तीनों बूढ़े, सरदारजी और कंडक्टर को छोड़ कर किसी को कानों-कान खबर नहीं थी कि सभी यात्रियों के रहते मैं कितनी बड़ी छिनाल बन चुकी थी।
मेरे तीनों बूढ़े अपराधियों की तरह मुझसे नज़र चुरा रहे थे, मगर मैं तो एक नये रोमांचक अनुभव से गुजर कर नये ही आनंद में मग्न थी। मेरे तीनों बूढ़े बिनब्याहे पतिदेव गण चुपचाप मेरे छिनाल बनने की घटना के मूक साक्षी, खामोश बैठे रहे, सरदारजी मुझे चोद कर खुश मुस्कुरा रहे थे, उधर हरामी कंडक्टर मेरी मस्त गोल गोल गांड़ का भोग लगा कर खुश मग्न मुस्कुरा रहा था। यह सब होते होते कब हम रांची पहुंचे पता ही नहीं चला। करीब 12 बजे हम रांची पहुंचे।

बस से उतरते समय हरामी कंडक्टर मेरे कान में फुसफुसाया, “बहुत मस्त गांड़ है तेरा रानी, फिर कभी मिलूंगा तो फिर तेरी गांड़ चोदुंगा, मन नहीं भरा।।” मैं गनगना उठी, गन्दा है मगर मस्त चुदक्कड़ है, “ठीक है ठीक है” कहती मैं आगे बढ़ी। सरदारजी भी मेरे कानों में बोलते गये, “बहुत मजा आया कुड़िए, अपना फोन नंबर दो, जब मुझे चोदने का मन होगा मैं फोन करूंगा, याद है ना तुम लोगों का वीडियो मेरे पास है” धमकी भरे शब्दों में कहकर रुके। मैं ने चुपचाप अपना नंबर दिया और अपने प्यारे बूढ़े आशिकों के साथ लुटी पिटी थके हारे कदमों के साथ एक साझी बिनब्याही पत्नी की तरह नानाजी के घर की ओर चल पड़ी।

यह कड़ी कैसी लगी अवश्य बताईएगा

आपकी रजनी

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