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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 5)

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अब तक आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह चार बुजुर्गों के साथ मेरा अंतरंग सम्बन्ध स्थापित हुआ और चार अलग-अलग तरह के बूढ़ों के साथ कामक्रीड़ा में शामिल हो कर अलग-अलग ढंग से उनकी कामपिपाशा शांत की और खुद भी नये अनुभवों से गुजरती हुई मैं संभोग सुख से परिचित हुई। हर बूढ़ा अलग था, मेरे यौवन का रसपान करने का उनका ढंग अलग था, निराला था, हर चुदाई का रोमांच अलग था। नया लंड, नया तरीका, नया रोमांच, दर्द भी और आनन्द भी।

रहीम चाचा ने तो अपने गदा सरीखे लंड की अंतहीन चुदाई से अचंभित कर दिया था। आरंभ में दहशतनाक दिखने वाला लंड चुदाई के अंतिम क्षणों में आश्चर्यजनक ढंग से करीब 9″ लंबा और 3″ मोटा हो कर और विकराल हो गया था। सामने का सुपाड़ा तो टेनिस बॉल की तरह था ही कुछ और बड़ा हो गया था। उनके गदारुपी लंड ने चुदाई करते हुए मेरी चूत की संकरी गुफा को मेरे गर्भाशय तक अपने अनुकूल फैला दिया था और सुगमतापूर्वक आवागमन करता रहा, नतीजतन आरंभिक पीड़ा के पश्चात मैं पूरी मस्ती के आलम में डूब कर उस विलक्षण चुदाई का अभूतपूर्व आनंद ले सकी और उस दढ़ियल के नये ताल में ठुकाई व दीर्घ स्तंभन क्षमता की मैं कायल हो गई। इतने विशाल लंड को अपने अंदर समाहित कर चुदाई के संपूर्ण आनंद का उपभोग कर सकने की अपनी क्षमता पर मुझे खुद पर नाज होने लगा।

चुदाई का नशा उतरने के बाद मैंने अनायास अपनी चूत को हाथ लगाया था, तो पाया था कि यह सूज कर पावरोटी बन गई थी। मेरी चाल ही परिवर्तित हो गई धी।

खैर जो भी हो, मैं तो इन बूढ़ों के हवस की भूख मिटाते मिटाते खुद भी शनै: शनै: इनके वासनामय गंदे खेल से उपजी अपने अंदर के अदम्य कमापिपाशा और काम सुख की आदी होती जा रही थी।

मैंने घर के अंदर प्रवेश किया, तो देखा सब लोग ड्राइंग हाल में बैठे गप्पें हांक रहे थे। सबकी प्रश्नवाचक निगाहें मुझ पर टिक गईं। “इतनी देर तक क्या कर रही थी?” मम्मी ने पूछा। ” कुछ नहीं मां, रीना को बता रही थी कि आज हम कहां कहां घूमे।” मैं बोली।

“ये आजकल की लड़कियां भी ना? पता नहीं है, आजकल इतनी रात तक लड़कियों का अकेले बाहर रहना कितना ख़तरनाक है?” मम्मी बोली।

“अरे मैं अकेली कहां थी। रीना और उसका भाई मुझे छोड़ने आए थे।” बोलती हुई अपने कमरे में चली गई। 10 मिनट बाद फ्रेश होकर फिर मैं भी बैठक में आई।

आज हम कहां कहां घूमे और क्या क्या किया उसी के बारे में बातें होने लगी (टैक्सी में और पार्क में जो कुछ हुआ उसको छोड़ कर)। दूसरे दिन नानाजी और दादाजी लोग वापस गांव लौटने वाले थे, उसके बारे में भी बातें होने लगी।

फिर अचानक नानाजी मुझसे बोले, “बिटिया, अभी तो तुम्हारी छुट्टियां चल रही है, क्यों न कुछ दिनों के लिए हमारे गांव चलती हो। छुट्टियां खत्म होते ही वापस आ जाना” उनकी आंखों में याचना और हवस दोनों परिलक्षित हो रहीं थीं। मैं असमंजस में पड़ गई, हालांकि मेरे पूरे बदन में रोमांचक झुरझुरी सी दौड़ गई, इस कल्पना से कि वहां तो कोई रोकने टोकने वाला होगा नहीं, पूरी आजादी से नानाजी मेरे साथ मनमाने ढंग से वासना का नंगा नाच खेलते हुए निर्विघ्न अपनी हवस मिटाते रहेंगे।

“हां ठीक ही तो कह रहे हैं तेरे नानाजी, पहले कभी गांव तो गयी नहीं, इसी बहाने गांव भी देख लेना।” मम्मी झट से बोल उठी।

“हम भी साथ ही चलेंगे, फिर रांची में दो दिन रुक कर अपने घर हजारीबाग चले जाएंगे।” दादाजी तुरंत बोल उठे, वे भी कहां पीछे रहने वाले थे।

मैं अभी भी द्विधा में थी कि जाऊं कि न जाऊं, “ठीक ही तो है। चली जाओ ना, छुट्टियां बिताने के लिए, एक नया जगह भी है। गौरव, (मेरा छोटा भाई) तुम भी साथ चले जाओ” पापा बोले।

मेरे घरवालों को क्या पता कि मैं उनकी नाक के नीचे इन्हीं हवस के पुजारी बूढ़ों द्वारा नादान कमसिन कली से नुच चुद कर वासना की पुतली, तकरीबन छिनाल औरत बना दी गई हूं।

“नहीं पापा मैं नहीं जा सकता, स्कूल का प्रोजेक्ट खत्म करना है।” झट से गौरव बोला।

मगर मैं, जो कामवासना के मोहपाश में बंधी इन बूढ़ों की मुंहमांगी गुलाम बन चुकी थी, ने धड़कते दिल से अपनी सहमति दी “ठीक है, ठीक है, जाऊंगी मगर एक हफ्ते के लिए, क्योंकि 10 दिन बाद मेरा कालेज खुल रहा है।” नानाजी का चेहरा खिल उठा।

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रात को ही खाना खाने के बाद मैंने बैग वैग में अपना आवश्यक सामान पैक किया और सोने की तैयारी करने लगी क्योंकि तड़के सवेरे हमें निकलना था कि दरवाजे में दस्तक हुई। मैं झुंझला उठी, “अब कौन आ मरा”। रहीम चाचा की खौफनाक चुदाई से वैसे ही बेहाल, सारा बदन टूट रहा था। रात के करीब 10:30 बज रहे थे। सब अपने कमरों में घुस चुके थे। मैं ने दरवाजा खोला तो देखा दादाजी दरवाजे पर खड़े थे।

“अब क्या?” मैं बोली।

चुप रहने का इशारा करते हुए मेरी बांह पकड़ कर उस कमरे की ओर बढ़े जिसमें तीनों बूढ़े ठहरे हुए थे। मैं ने हल्का विरोध किया मगर फिर उनके साथ खिंची उनके कमरे की ओर चली। ज्यों ही मैं ने कमरे में कदम रखा, दादाजी ने फौरन दरवाजा बंद कर दिया। कमरे में नाईट बल्ब की मद्धिम रोशनी में मैंने देखा कि नानाजी और बड़े दादाजी सिर्फ लुंगी पहने बेसब्री से नीचे फर्श पर बिछे बिस्तर पर हमारा इंतजार कर रहे थे।

“आज दिन में जो न हो सका, वही मेहरबानी अब जरा हम पर कर दे बिटिया,” मेरे कान में दादाजी की फुसफुसाहट सुनाई पड़ी। “हाय मैं कहां आ फंसी।” मैं घबराई। रहीम चाचा की कुटाई से अभी संभली ही थी कि यह नई मुसीबत। अब तीनों बूढ़ों को झेलना। “नहीं, आप तीनों के साथ एक साथ? हाय राम नहीं नहीं।” मैं फुसफुसाई।

“अरे अब का मुश्किल है तेरे लिए, आराम से चोदेंगे बिटिया, दिन भर बहुत तरसाई हो। अब मान भी जा रानी।” कहते हुए दादाजी ने मुझे बिस्तर पर ठेल दिया। दोनों बूढ़ों नें मझे दबोच लिया और पागलों की तरह मेरे कपड़ों समेत चूचियां दबाना और चूमना चाटना चालू कर दिया। लुंगी के अन्दर कुछ नहीं पहना था उन्होंने। फटाफट लुंगी खोल कर फेंक दिया और मादरजात नंगे हो गए और उनके लपलपाते खौफनाक लौड़े बड़ी बेशर्मी से मुझे सलाम करने लगे। मैं भी सिर्फ नाईटी में थी, फलस्वरूप तीनों ने बड़ी आसानी से पलक झपकते मुझे नंगी कर दिया और मेरी दपदपाती काया को भंभोड़ डालने को तत्पर हो गये ।

मेरी चूचियां मेरी कामुकता को उकसाने वाले वो बटन थे, जिसके मर्दन से मेरे जिस्म में विद्युत की थारा बहने लगी और मैं चुदवाने के लिए छटपटाने लगी। नानाजी अपने कुत्ते जैसी लंबी खुरदुरी ज़बान से मेरी फकफकाती रहीम चाचा से चुद चुद कर सूजी चूत को चप चप चाटने लगे, बड़े दादाजी नें मेरी चूचियों को मसलना और चूसना चालू किया और दादाजी मेरे होंठों को चूसने लगे। मैं तो पागल हो उठी और दो ही मिनट में छरछरा कर झड़ने लगी, ओह यह कामुकता की पराकाष्ठा थी। मगर ये लगे रहे और दुबारा मैं उत्तेजना के सागर में गोते खाने लगी।

जैसे ही दादाजी ने मेरे होंठों को आजाद किया मैं सिसिया कर एकदम रंडी की तरह बोली, “अब चोद भी डालो हरामियों, तरसा तरसा के मार ही डालोगे क्या? ”

लोहा गरम देख बड़े दादाजी ने अपने लौड़े का सुपाड़ा मेरी चूत के मुहाने पर रखा और घप्प से एक करारा झटका मार कर एक ही बार में पूरा का पूरा लंड जड़ तक ठोक दिया, “आ्आ्आह” मेरी कराह निकल पड़ी। फिर मुझे अपने लंड में फंसाकर पलट गये। अब मैं उनके ऊपर थी और मेरे कुत्ते नानाजी को तो लगता है कि इसी पल का इंतज़ार था, आव देखा न ताव तुरंत अपने लंड को थूक से लसेड़ कर मेरे गोल गोल गुदाज गांड़ की संकरी गुफा में कुत्ते की तरह पीछे से हुमच कर जड़ तक ठोक दिया, “ले मेरी कुतिया, उह हुम।”

“आह मेरी गांड़ फटी रे” मैं सिसक उठी। मेरे आगे पीछे के छेदों में दोनों बूढ़ों का लंड घुस चुका था और मैं ने हांफते हुए ज्योंही मुंह खोला दादाजी ने अपने लंड को सटाक से मेरे हलक में उतार दिया, “अग्गह गों गों” मेरी घुटी घुटी आवाज के साथ दादाजी भी बोले, “ले हमार रंडी मां, हमार लौड़ा खा।” अत्यंत ही कामुक माहौल बन चुका था, वासना का बेहद गंदा और नंगा खेल चलने लगा। कामोत्तेजना के आलम में सब अत्यंत ही उत्तेजक गन्दी गन्दी घिनौनी गालियां फुसफुसा रहे थे।

“ले कुतिया, आह हरामजादी रंडी, चूतमरानी बुर चोदी, आज से तू हमारी लंड रानी हुई रे,” और न जाने क्या क्या वे सम्मिलित स्वर में बड़बड़ाने लगे और धकाधक चोदने में मशगूल हो गये। मैं उनकेे बीच पिसती हुई इतने गंदे वासना के खेल में डूब गयी। फिर शुरू हुआ तीनों का मेरे साथ धकमपेल, चुदाई का तांडव। नीचे से बड़े दादाजी का लंड मेरी चूत में किसी इंजन के पिस्टन की तरह भचाभच अंदर बाहर हो रहा था, पीछे से नानाजी का लंड बड़ी बेरहमी मेरी गांड़ से होकर अंतड़ियों तक भच्च भच्च कुटाई किए जा रहा था और दादाजी का लौड़ा मेरे मुंह में तहलका मचा रहा था। मेरी चूत और गांड़ की चुदाई में भिड़े दोनों बूढ़े जब लयबद्ध तरीके से ठाप पर ठाप मारे जा रहे थे तो ऐसा लग रहा था मानो उनके मदमस्त लौड़े पेट कि अंतड़ियों और गर्भाशय के बीच की विभाजन दीवार को मिटा कर एकाकार होने की कोशिश में लगे हों। “आह वह चरम सुख का अद्भुत अहसास, आह अपने नारीत्व की पूर्णता का सुखद अहसास।”

10 मिनटों में ही मैं फिर झड़ने लगी “ओह मां ओह मां मैं गई मैं गई रे मादरचो्च्चोओ्ओ्ओद आ्आ्आह,” ओह वह अहसास, संभोग सुख का अद्भुत आनंद।

तीनों बूढ़े लगे रहे चोदने में, मानो उनमें चुदाई की प्रतियोगिता चल रही हो, और में चुदती चुदती फिर वासना के महासागर की अथाह गहराई में डूब कर स्वर्गीय आनंद का रसपान करती करती मदहोशी के आलम में बेशरम छिनाल की तरह बड़ बड़ करने लगी, “आह ओह चोद दादू, चोद मेरे चूत के रसिया, मेरे बुर के बलमा, हाय रे मैं रंडी, आपलोगों की बुर चोदी, हाय नानाजी मेरे कुत्ते बलमा, चोद ले साले कुत्ते, मादरचोद, आपलोगों की रंडी बन गई रे मैं आज, मुझे कुत्ती बनाके चोद, रंडी बना के चोद ले मेरे प्यारे बूढ़े चुदक्कड़ो, हाय मैं अब आपलोगों के लौड़ों की दासी बन गयी हूं, मुझे छोड़ना मत मेरे सजनो।”

“हां रे हमारी बुर चोदी मां, ले कुतिया और ले हम हम, ले लौड़ा ले, हम सब एक साथ तुझे अपनी औरत बनाएंगे रे रंडी मां, एक साथ एके बिस्तर में। कभी न छोड़ेंगे हरामजादी मां,” वे लोग भी बड़बड़ कर रहे थे।

करीब 30 मिनट वासना का बेहद रोमांचक और घिनौना नंगा खेल चलता रहा और अंततः हम आपस में गुंथ कर झड़ने लगे। सर्वप्रथम दादाजी ने मेरे मुंह में वीर्य पान कराना शुरू किया, दिन भर की दमित उत्तेजना से जमा कसैला और नमकीन प्रोटीनयुक्त वीर्य मेरे हलक में उतरता चला गया। वो स्खलित हो कर किसी भैंस की तरह हांफते हुए लुढ़क गये। फिर बड़े दादाजी फचफचा कर अपने वीर्य, मदन रस से मेरे गर्भाशय को सराबोर करते हुए झ़ड़ने लगे, “ओह रंडी रानी मां ले मेरा रस, मेरे बच्चे की मां बन जाआ्आ्आ्आ्आह,।” तभी मैं भी तीसरी बार छरछरा कर झड़ने लगी, “आह मैं गयी ये मेरे राजा, हां हां हां मुझे अपने बच्चों की मां बना्न्न्न्आ्आ्आ्आह्ह्ह ले रज्ज्ज्आ्आ्आह” उससे कस कर छिपकिली की तरह चिपक कर स्खलन के स्वर्गिक आनंद से सराबोर हो गई। वे भी शिथिल हो कर किसी भालू की तरह लुढ़क गये। हाय, नानाजी भी इसी समय झड़ने लगे। मुझे कुत्ते की तरह पीछे से जकड़ लिया और मेरे गुदा मार्ग में झड़ने लगे और हाय, मैं यह कैसे भूल बैठी थी कि उनका लंड आदमी के लंड की तरह नहीं बल्कि कुत्ते के लंड की तरह है।

उनका लंड जड़ तक मेरी गांड़ में घुसा हुआ था और ठीक गुदा द्वार के अंदर एक बड़ा सा बॉल बन कर अटक गया था। मैं ने अलग होने का प्रयास किया तो गांड़ फटने फटने को होने लगी और मैं उसी स्थिति में रुक गई। नानाजी भी लंड फंसाए किसी कुत्ते की तरह पलट गये। हमारी स्थिति कुत्ते कुत्ती की तरह थी। मैं जानती थी कि यह स्थिति आधे घंटे तक रहने वाली थी। “हाय मेरे कुत्ते सैंया, आखिर मुझे अपनी कुतिया बना ही डाला। मेरी चूत को पहले कुतिया की चूत बनाया और अब मेरी गांड़ को भी कुतिया की गांड़ बना दिया। हाय रे हाय मेरी गांड़।” बाकी दोनों बूढ़े इस मजेदार दृश्य का आनंद लें रहे थे।

“चुप कर कुतिया, जब तक लौड़ा फंसा है शांत रह, नहीं तो कुत्ते की तरह खींचता चलूंग और तू मेरी रांड कुतिया मेरे लंड से फंसी दर्द से बेहाल हो जाएगी।” नानाजी बोल उठे। करीब आधे घंटे बाद लंड का बॉल थोड़ा सिकुड़ कर छोटा हुआ और फच्च की जोरदार आवाज के साथ बाहर निकल आया। मेरी जान में जान आई और वहीं लस्त पस्त निढाल लुढ़क गई। उधर नानाजी भी किसी भालू की तरह हांफते हुए लुढ़क गए।हम चारों इस समय अपनी हवस शांत करके तृप्ति की सांस ले रहे थे।

अब मैं पूरी तरह इनकी हो गई थी, इनके वासनामय खेल की अभिन्न खिलाड़ी, पक्की रंडी, भोग्या, बिन ब्याही इनकी साझी पत्नी, जिसे वे जब चाहें, जैसे चाहें भोग सकते थे। मैं ने भी खुशी खुशी इस संबंध को स्वीकार कर लिया और अपने आप को उनके कदमों में निछावर कर मानो जन्नत पा लिया, आखिर इन बूढ़ों ने मुझे अपनी जवानी का लुत्फ लेने का इतना आनंददायक मार्ग जो दिखाया था। मैं ने मन में यही निर्णय लिया कि बस अब सिर्फ बुजुर्गों की ही अंकशायिनी बनूंगी। उनके जीवन के अस्ताचल में नया रंग भरने की कोशिश करती रहूंगी। मैं उन तीनों बूढ़ों के साथ नंग धड़ंग अवस्था में अस्त व्यस्त पसरी, एक टांग दादाजी के ऊपर, बड़े दादाजी का एक टांग मेरे ऊपर और नाना जी का हाथ मेरी चूचियों पर, एकदम बेहयाई की पराकाष्ठा, कितनी छिनाल बन गई थी इन तीन ही दिनों में।

उस वक्त रात का 1 बज रहा था। हम सभी नंग धड़ंग बिस्तर पर पसरे हुए थे। ऐसे ही कब हमारी आंख लगी पता ही नहीं। करीब 5:30 बजे अचानक मेरी नींद खुली और मैं हड़बड़ा कर उठ बैठी और चुद चुद कर दर्द और थकान से बेहाल शरीर में बमुश्किल शक्ति एकत्रित कर नाईटी पहन उन नंग भुजंग बूढ़ों को उसी अवस्था में छोड़ अपने कमरे की ओर लड़खड़ाते कदमों से भागी। खुदा का शुक्र था कि अब तक कोई नहीं उठा था। किसी को भनक तक नहीं लगा कि रात में मैं सारी शर्मोहया और रिश्ते नातों की मर्यादा (जिसकी परवाह इन हवस के पुजारी बूढ़ों को करनी चाहिए थी) को ताक में रखकर इस कामुकता भरे गंदे खेल की मस्ती में डूब कर पूरी रंडी बन चुकी थी। मैं धम्म से अपने बिस्तर पर गिरी और गिरते ही निढाल नींद के आगोश में समा गई।

प्रिय पाठकों यह भाग कैसा लगा, कृपया अपने विचारों से अवगत कराईएगा।

आपकी

रजनी

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