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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 15)

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अब तक आप लोगों ने पढ़ा, दादाजी के सामने मेरी मां की स्वीकारोक्ति के अनुसार वह किस तरह पतन की राह पर फिसलती हुई छिनाल बनती गई। भिन्न-भिन्न मर्दों से संभोग का सुख प्राप्त करती हुई वासना के दलदल में धंसती चली गई। अब आगे की कहानी दादाजी बताने लगे, ” फिर लक्ष्मी आगे बोलने लगी,

“एक बार तो गजब ही हो गया। आपको याद है, कि तीन साल पहले मेरी चाची की मृत्यु हो गई थी, जिसके यहां मैं अपने पति के साथ गई हुई थी। जब हम लौट रहे थे तो चूंकि पिछले पांच दिनों से मैं अपनी चूत की प्यास नहीं बुझा पाई थी इसलिए मैं चुदने के लिए तड़प रही थी। लौटते समय हम अंबाला स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करने लगे। इंतजार करते समय बार बार मेरा हाथ मेरी चूत की तरफ अनायास ही चला जाता था और मैं हल्के से चूत सहला देती थी। चल रही थी तो दोनों जांघों को आपस में रगड़ रही थी। बेंच पर बैठी थी तो टांग पर टांग चढ़ा कर कसमसा रही थी। सावन के महीने में कांवड़ियों की भीड़ में एक लंबा चौड़ा साधू बाबा हमारे पास खड़ा बार बार मुझे देख रहा था और मेरी स्थिति को समझ लिया था। मैं ने सर उठा कर जैसे ही उसकी ओर देखा तो वह बेहद अश्लील ढंग से मुस्करा उठा। उसकी आंखों में मैं ने वासना की भूख को पढ़ लिया था। मैं भीतर ही भीतर रोमांचित हो उठी। जब मैं पति के साथ अंबाला से ट्रेन में चढ़ी तो पलट कर देखा कि वह साधू बाबा देख रहा था मैं किस बोगी में चढ़ रही हूं। हम सेकेंड एसी बोगी में थे। ट्रेन में चढ़ने से पहले मैं ने देखा था कि जेनरल बोगी और नन एसी रिजर्व कंपार्टमेंट में लोगों की खचाखच भीड़ थी। रात करीब बारह बजे हमारी ट्रेन चल पड़ी। मैं नीचे बर्थ पर थी और ऊपर बर्थ पर मेरे पति। वे लेटते ही खर्राटे भरने लगे। मुझे पता नहीं क्या हुआ कि अचानक मेरे शरीर में चींटियां सी रेंगने लगी। पिछले पांच दिनों से मैं किसी से चुदी नहीं थी। मुझे चुदाई का कीड़ा काटने लगा। समझ नहीं पा रही थी कि क्या करुं। उसी समय वही दाढ़ी वाला साधू बाबा जो प्लेटफार्म पर मुझे घूर रहा था हमारे बर्थ के पास आया और मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया। मैं चुदासी के आलम में बिना आगे पीछे सोचे उसे रुकने का इशारा किया और टायलेट में जा घुसी और फटाफट ब्रा और पैंटी उतार कर अपने पर्स में डाल कर बर्थ के सिरहाने रख उसके पीछे पीछे चल पड़ी। वह नन एसी रिजर्व बोगी की ओर चल पड़ा। बोगी के दरवाजे और बाथरूम के आस पास रात के एक बजे भी लोग खचाखच भरे हुए थे। सावन का महीना था और कांवड़ियों की काफी भीड़ थी। वहां सभी उम्र के मर्द एक दूसरे से सट कर कुछ खड़े थे और कुछ बैठे हुए थे। वह साधु उसी भीड़ में मेरा हाथ पकड़ कर खींच कर घुसा दिया और मुझसे सटकर खड़ा हो गया। वह साधु बाबा करीब पचपन साल का काला छः फुट लंबा मजबूत कद काठी का आदमी था। बोगी की मंद रोशनी में मैंने देखा कि मेरे दाएं बाएं कुछ जवान लड़के खड़े थे। मेरे पीछे भी अधेड़ उम्र के कुछ कांवड़िए गेरुए वस्त्र में मुझ से सट कर खड़े थे। मैं उन सबके बीच पिसती हुई वासना की आग में जल रही थी। कुछ ही पलों में मैं ने अपनी दाहिनी चूचि पर किसी के हाथ का स्पर्श महसूस किया। उसी तरह बांई चूची पर भी किसी के हाथ का दबाव महसूस करने लगी। मैं समझ गई कि मेरे दाएं बाएं खड़े लड़के मेरी चूचियों पर हाथ साफ कर रहे हैं। मैं यही तो चाहती थी, चुपचाप खड़ी रही और उनकी हरकतों का मजा लेने लगी। फिर मैंने अपनी चूतड़ पर किसी कठोर वस्तु का दबाव महसूस किया। मुझे समझने में देर नहीं लगी कि यह और कुछ नहीं, किसी का लंड है। उसी समय मेरे सामने भी मेरी चूत के ऊपर किसी के कठोर लंड के दस्तक को मैंने महसूस किया। सर उठा कर देखा तो सामने दाढ़ी वाला बूढ़ा मुस्कुरा रहा था। पीछे कौन है यह देखने के लिए सर घुमाई तो देखा एक गुंडा टाईप मोटा मुस्टंडा अश्लील भाव से मुस्करा रहा था। मैं समझ गई कि अब ये सारे लोग मुझे यहीं भीड़ का फायदा उठाकर मेरे शरीर से ऐश करेंगे, जिसके लिए मैं मानसिक रूप से तैयार थी और उत्तेजित भी। मेरी चुप्पी को उन लोगों ने मेरी स्वीकृति मान लिया। धीरे धीरे मेरे अगल बगल के लड़कों ने मेरे ब्लाऊज के बटन खोल दिए और बिना ब्रा की बड़ी बड़ी चूचियों को बेरहमी से दबाने लगे। “बड़ी मस्त माल है बे, क्या मस्त चूचियां हैं। देख कितने मज़े से चूचियां दबवा रही है,” लड़के आपस में फुसफुसाने लगे। मैं आह उह करने लगी। मेरे मुंह से सिसकारियां निकलने लगी थी। इधर पीछे वाला गुंडा धीरे धीरे मेरी साड़ी उठा कर जैसे ही देखा कि मैं बिना पैंटी की हूं, मेरी गांड़ को मसलना शुरू कर दिया और गांड़ में उंगली घुसा कर अन्दर बाहर करने लगा। “वाह तू तो पूरी तैयारी के साथ आई है रानी, क्या मस्त गांड़ है, चोदने में बड़ा मज़ा आएगा।” वह फुसफुसाया। सामने वाला बूढ़ा भी सामने से साड़ी उठा कर मेरी चूत सहलाने और उंगली घुसाने लगा। मेरे मुंह से आनन्द भरी सीत्कार निकल गई। उन लोगों ने देखा कि मैं मदहोशी के आलम में हूं तो अगल बगल वाले लड़कों ने पैंट का चेन खोल कर अपने गरमागरम टनटनाए लंड निकाल कर मेरे हाथों में थमा दिया। मैं उत्तेजना की अवस्था में उनके लंड को सहलाने और दबाने लगी। “ओह साली रंडी, जोर से दबा कुतिया, मूठ मार हरामजादी, आह ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह” बुदबुदाने लगे। पीछे वाले गुंडे ने भी अपना लौड़ा निकाल कर मेरी गांड़ के छेद पर रखा और मेरी कमर पकड़ कर एक ही झटके में आधा लंड पेल दिया। मैं बड़ी मुश्किल से अपनी चीख को रोक पाई। इसी समय सामने वाला बूढ़ा भी अपनी धोती से अपना लौड़ा निकाला। मुझे उस भीड़ में पता ही नहीं चला कि उस साधु बाबा का लंड कितना बड़ा है। जब वह मेरी चूत में अपना लौड़ा डालने लगा तो मुझे अहसास हुआ कि उसका लंड गधे के लंड के जैसा मोटा है। मेरी चूत में उसका लंड जब घुसने लगा तो मैंने दर्द के मारे चीखने के लिए मुंह खोला तो साधु बाबा अपने बदबूदार मुंह से मेरे होंठों को दबा कर चूसने लगा और मेरी चीख निकल ही नहीं पाई। मैं घुट कर रह गई। उसका लंड तो घुसता ही चला जा रहा था, लग रहा था कि कोई लंबा बांस मेरी चूत में घुस रहा हो। पूरा मेरे गर्भाशय तक लौड़ा घुसा दिया था उस हरामी बाबा ने। मैं उन चुदक्कड़ों के बीच फंस कर छटपटा कर रह गई। पीछे वाला गुंडा दुबारा झटका मार कर पूरा लंड मेरी गांड़ में घुसा दिया। चूंकि सामने वाला बूढ़ा मुंह मेरे मुंह से सटा कर चूम रहा था इस लिए मेरी चीख दब गई थी। अब आगे पीछे से मेरी चुदाई होने लगी और मैं मस्ती में भर कर आंखें बंद किए आह आह आह करने लगी और अगल बगल के लड़कों का मूठ मारने लगी। करीब पन्द्रह मिनट बाद पीछे वाला गुंडा अपना माल मेरी गांड़ में झाड़ कर हट गया और मेरे बगल वाला लड़का सरक कर मेरी गांड़ में अपना लौड़ा घुसा दिया। इधर सामने वाला साधू बाबा भी अपना माल मेरी चूत में झाड़ कर जैसे ही हटा, दूसरी बगल वाला लड़का सरक कर मेरी चूत में अपना लौड़ा ठोंक कर दनादन चोदने लगा। अबतक आस पास के लोगों को भी पता चल गया कि यहां क्या हो रहा है। आस पास के लोग भी इस मौके का फ़ायदा उठाने के लिए मेरे समीप आ गये। मेरे पास खड़े जितने लड़के, जवान, बूढ़े थे, सभी मुझ पर टूट पड़े। कहां तो मैं मजा लेने के लिए आई थी, वहां जा कर फंस गयी। छटपटाती हुई मैं उन सबके बीच पिसती रही, सिसकती रही। कोई मेरी चूचियां मसल रहा था, कोई चूचियों को नोच रहा था, कोई चूचियों को चूस रहा था, अपने दांतों से काट रहा था, कोई होठों को चूस रहा था, कोई मेरे गालों को काट रहा था, एक एक करके बारी बारी से मेरी चूत और गांड़ को चोद रहे थे। सब फुसफुसा कर मुझे गंदी गंदी गालियां देते हुए चोद रहे थे, “छिनाल, रंडी मां की चूत, रांड, रंडी की बेटी, कुत्ती की औलाद,” और न जाने क्या क्या। मैं सिसक सिसक कर चुदती रही। मैं छटपटाती रही मगर वहां जितने खड़े लोग थे, लड़के, जवान, अधेड़, बूढ़े, जब सब ने जबतक मुझे चोद नहीं लिया छोड़ा नहीं। जैसे ही मैं उनके चंगुल से छूटी, थकान के मारे नीचे पड़ी एक बड़ी सी गठरी पर औंधे मुंह गिर पड़ी। मेरे उस तरह धम से गिरने पर आस पास बैठे ऊंघते यात्रियों की नींद टूटी तो वे एक पल को समझ नहीं पाये कि मामला क्या है, मगर आंखें मलते हुए जब अस्त व्यस्त परोसी हुई मेरे अधनंगे सेक्सी शरीर को देखा तो उन्हें भी वहशी जानवर बनने में देर नहीं लगी। फिर क्या था, मेरी हालत आसमान से गिरे तो खजूर में अटकी वाली हालत हो गई। आस पास बैठे सारे कांवड़िए, साधु और मैले कुचैले फटे पुराने कपड़े पहने गरीब गंवई सरकते हुए मेरे करीब आ गए और मुझे चारों ओर से घेर कर जिसे जिस तरह मन किया, मेरे शरीर को भंभोड़ना शुरु कर दिया। किसी किसी ने तो मेरे मुंह में भी लंड डाल कर चोदा। मुझे तो याद ही नहीं कि उस रात कितने लोगों ने मुझे चोदा। कुछ लोग मुझे चोद कर अपने अपने स्टेशन पर उतर गये और उन स्टेशनों पर चढ़े कुछ नये यात्रियों ने भी मौके का फायदा उठाकर मुझे रौंद डाला। मुझमें विरोध करने की शक्ति भी नहीं बची थी। मैं ने अपने आपको परिस्थिति के हवाले कर दिया। मैं कुछ कर भी नहीं सकती थी क्योंकि अनजाने में अजनबी साधू से चुदने के चक्कर में खुद ही इस मुसीबत को निमंत्रण दे बैठी थी। उस वीभत्स और बेहद घृणित परिस्थिति में पड़ी वहशतनाक मुसीबत से छुटकारे की आशा में भूखे कुत्तों की कुतिया की तरह नुचती चुदती रही। करीब साढ़े चार बजे तक मैं नुच चुद कर अधमरी हो गई। सवेरा होने वाला था तब उन लोगों ने मुझे छोड़ा। मैं लस्त पस्त पड़ी नज़र घुमा कर देखा, सभी शराफत के पुतले बने मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे। मेरी चूत और गांड़ का कचूमर निकाल दिया था हरामियोंं ने। छोटा लंड, लंबा लंड, पतला लंड, मोटा लंड और पता नहीं किस किस तरह का लंड मेरी चूत और गांड़ में घुसा मुझे अर्द्धबेहोशी की हालत में पता ही नहीं चल रहा था। जिस बेदर्दी से मेरी चुदाई हुई थी उस कारण मेरी चूत पावरोटी की तरह फूल कर कुतिया की तरह बाहर आ गई थी। गांड़ का सुराख बढ़ कर चूहे की बिल की तरह हो गया था। चूत और गांड़ से लसलसा वीर्य बह कर मेरी जांघों से होता हुआ मेरी एड़ियों तक आ चुका था। मेरी चूचियां खुले ब्लाऊज से बाहर निकली हुई थीं। मेरी साड़ी कमर तक उठी हुई थी। मेरी गांड़ और चूत बिल्कुल नंगी थी। मैं अपनी हालत देख कर बेहद शर्मिंदा हो गई और उन वासना के भूखे दरिंदों के वीर्य से सराबोर अपने शरीर की सारी शक्ति बटोर कर किसी तरह उठी और लड़खड़ाते हुए अपने कपड़ों को ठीक किया। फिर उसी तरह लड़खड़ाते हुए टायलेट में जा घुसी और अपने चूत, गांड़ और पैरों को धो कर किसी तरह अपने बर्थ तक पहुंची और धम से गिर कर थकान के मारे तुुंत ही गहरी नींद में सो गई।

“लक्ष्मी उठो, कब तक सोती रहोगी” कामिनी के पापा मुझे झंझोर कर जगा रहे थे। “देखो आठ बज गया है”

मैं थकान से चूर अलसाई सी उठी तो मेरे चेहरे के लाल लाल दागों को देख कर वह चौंक उठा और बोला, “अरे ये क्या हो गया है तेरे चेहरे और गर्दन पर?”

मैं समझ गई कि यह सब रात की निशानी है। “लगता है मुझे कोई एलर्जी हुई है। देखो मुझे हल्का बुखार भी है,” मैं बोली। सच में मुझे हल्का बुखार भी था।

“ठीक है तुम आराम से सो जाओ मैं अगले स्टेशन में देखता हूं कोई दवा” वे बोले। फिर मैं बारह बजे तक सोती रही। थकान उतरी तो बुखार भी उतरा मगर मेरी चूत, गांड़ और चूचियों में मीठा मीठा दर्द अभी भी उठ रहा था। टाटा पहुंचते पहुंचते मैं बिल्कुल नोर्मल हो गई थी। उस यात्रा के बाद तो मेरी चुदाई की भूख और बढ़ गई। अब आप ही देख लीजिए मैं क्या से क्या बन गई हूं।”

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उसकी पूरी कहानी सुनकर मैं समझ गया कि लक्ष्मी अब पूरी तरह कुतिया बन गई है और चूंकि इसकी शुरुआत हरिया और हम लोग पहले ही कर चुके थे इसलिए मुझे कुछ कहते नहीं बना और हमने हालात से समझौता करने में ही भलाई समझी और लक्ष्मी से कुछ नहीं कहा। तब से अब तक ऐसा ही चल रहा है।”

हम सब भौंचक हो कर दादाजी के मुंह से मेरी मां की कुतिया बनने की कहानी सुनते रहे। मैं हरिया, दादाजी और बड़े दादाजी से बोल उठी, “साले हरामियों, आखिर में मेरी मां को रंडी बना ही डाला आप लोगों ने। खैर अब आप लोग भी कर भी क्या सकते हैं। यह सब ऊपर वाले की माया है। अभी आप लोग खुद देख लीजिए, मैं आप लोगों की बिनब्याही पत्नी बन ही गई ना। मुझे तो इस बात की बहुत खुशी है कि मैं आप लोगों की सामुहिक औरत बन गई हूं। फिर भी अब, जब हम सब जान गये हैं कि मेरी मां छिनाल बन चुकी है तो मैं चाहती हूं कि मेरी मां भी जान ले कि मैं उसकी बेटी, उसी के नक्शे कदम पर चल कर उसका नाम रोशन कर रही हूं।” मैं बेशर्मी से बोली। “मैं चाहती हूं कि आप सब उसके सामने मुझे चोदें और फिर मेरे सामने ही उसकी चुदाई करें।”

एक पल के लिए वे चुप रहे फिर सबने एक स्वर से मेरी बातों का समर्थन कर दिया।

आगे की घटना अगले भाग में।

तब तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए,

आप लोगों की कामुक

रजनी

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