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बलात्कृता

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क्या सभी आकस्मिक घटनाएँ पूर्व निर्धारित होती है? अगर कोई आकस्मिक घटना घटती है तो अचानक अपने आप यूँ ही घट जाती है; जिसका कार्यकरण से कोई सम्बन्ध है?

बहुत ही ज्यादा आस्तिक नहीं थी सुसी, न बहुत ज्यादा नास्तिक थी वह. कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि ये सब बातें मन को सांत्वना देने के लिए केवल कुछ मनगढ़ंत दार्शनिक मुहावरें जैसे है.

सुबह से बहुत लोगों का ताँता लगने लगा था घर में. एक के बाद एक लोग पहुँच रहे थे या तो कौतुहल-वश देखने के लिए या फिर अपनी सहानुभूति प्रकट करने के लिए. घर पूरी तरह से अस्त-व्यस्त था. जीवन तो और भी अस्त-व्यस्त था! दस दिन हो गए थे, इधर-उधर घुमने-फिरने में, आज ही ये लोग अपने घर लौटे थे. रास्ते भर यही सोच-सोचकर आ रहे थे, घर पहुंचकर शांति से गहरी नींद में सो जायेंगे. रात के तीन बजे उनकी ट्रेन अपने स्टेशन पर आनेवाली थी. इसलिए मोबाईल फ़ोन में ‘अलार्म’ सेट करने के बाद भी, आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. पलकें एक मिनट के लिए भी नहीं झपकी थी. थोडी-थोडी देर बाद नींद टूट जाती थी. ट्रेन से उतरकर घर लौटकर देखा था, कि घर अब और कोई आश्रय-स्थल नहीं रहा था.

सुबह से ही घर में लोग जुटने लगे थे. कभी-कभी तीन-चार मिलकर आ रहे थे तो कभी-कभी कोई अकेला ही. सभी को शुरू से उस बात का वर्णन करना पड़ता था, कि यह घटना कैसे घटी होगी.यहाँ तक कि डेमोंस्ट्रेशन करके भी दिखाना पड़ता था. सब कुछ देखने व सुन लेने के बाद, वे लोग यही कहते थे कि आप लोगों को इतना बड़ा खतरा नहीं उठाना चाहिए था. अगर कोई एक आदमी भी घर में रुक जाता तो, शायद आज यह घटना नहीं घटती . ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि अपराधी को हर हालत में अपराध करने का पूरा-पूरा हक़ है. और सुसी के परिवार वालों की भूल है कि उन्होंने कोई सावधानी नहीं बरती.

इन्हीं ‘सावधानी’ व ‘सतर्कता’ की बातें सुनने से सुसी को लगता था, कि बारिश के लिए छतरी, सांप के लिए लाठी, अँधेरे के लिए टॉर्च का प्रयोग कर जैसे उसकी सारी जिंदगी बीत जायेगी! ऐसा कभी होता है क्या? चारों-दिशायें, चारों-कोनें, ऊपर-नीचे देख-देखकर साबुत जिन्दगी जीना संभव है?

:” आप इंश्योरेंस करवाए थे क्या?”

:” इंश्योरेंस, नहीं, नहीं.”

:” करवाना चाहिए था ना!”

सुसी और क्या जबाव देती?इस संसार में सब कुछ क्षणभंगुर और अस्थायी है. जो आज है,कल वह नहीं रहेगा. किस-किस चीज का इंश्योरेंस करवाएगी वह? और किस-किस का नहीं ! घर, गाड़ी, जीवन, आँखें, कान, नाक, ह्रदय, यकृत और वृक्क? इंश्योरेंस कर देने के बाद, ‘पाने और खोने’ का खेल बंद हो जायेगा? किसी भी रास्ते से तब भी आ पहुँचेगी दुःख और यंत्रणा, तक्षक सांप की तरह!

:”कितना गया?”

:” क्या -क्या गया ? “

धीरे-धीरे, कुछ -कुछ याद कर पा रही थी सुसी . एक के बाद एक चीजें याद आ रही थी उसको . क्या बोल पाती वह ? आते समय , जिस हालत में उसने अपने घर को देखा था बस उसी बात को दुहरा रही थी सभी के सामने .

उस दिन जब उन्होंने अपने घर की खिड़की के टूटे हुए शीशे के छेद में झाँककर देखा , तो दिखाई पड़ी थी अन्धेरें आँगन में चांदनी की तरह फैली हुई रोशनी. आश्चर्य से सुसी ने पूछा था ,” अरे ! बेबी के कमरे की लाइट कैसे जल रही है ?” जब कभी वे लोग बाहर जाते थे , तो घर की लाइट बंद करना और ताला लगाने का काम अजितेश का होता था . इसलिए यह प्रश्न अजितेश के लिए था . ” आप क्या बेबी के कमरे की लाइट बुझाना भूल गए थे ?” गाडी से सूटकेस व अन्य सामान उतार रहा था अजितेश. कहने लगा था ,” मैंने तो स्विच ऑफ किया था .” बेबी बोली थी :-” पापा , आप भूल गए होगे . याद कीजिये जाते समय लोड-शेडिंग हुआ था ना ? .”

ग्रिल का ताला खोल दी थी सुसी . इसके बाद वह मुख्य -द्वार का ताल खोलने लगी थी . ताला खोलकर ,धक्का देने लगी थी .पर जितना भी धक्का दे पर दरवाजा नहीं खुल रहा था . “अरे ! देखो , “चिल्लाकर बोली थी सुसी ,”पता नहीं क्यों ,दरवाजा नहीं खुल रहा है . लगता है किसी ने भीतर से बंद किया है ? कौन है अंदर ? ” .सुसी का दिल धड़कने लगा था . वह कांपने लगी थी . ” दरवाजा क्यों नहीं खुल रहा है ? ” भागकर आया था अजितेश , पीछे -पीछे वह ड्राईवर भी . सुसी ग्रिल के दरवाजे के पास आकर ,टूटे शीशे से बने छेद में से झाँककर देखने लगी वह दृश्य . बड़ा ही ह्रदय विदारक था वह दृश्य! उसकी अलमीरा चित्त सोयी पड़ी थी. दोनों तरफ बाजू फैलाते हुए. खुले पड़े थे अलमीरा के दोनों पट. सुसी की छाती धक्-धक् कांपने लगी थी जोर जोर से.रुआंसी होकर बोली थी,-“हे,देखो!”

:” ऐसा क्यों कर रही हो?” बौखलाकर अजितेश बोला था. इसके बाद उसने बड़े ही धैर्य के साथ पडौसियों को जगाया था. ड्राईवर और पडौसियों को साथ लेकर पीछे वाले दरवाजे की तरफ गया था अजितेश. पीछे का दरवाजा खुला था. पर किसी ने बड़ी सावधानी के साथ, उस दरवाजा को चौखट से सटा दिया था. दूर से ऐसा लग रहा था जैसे दरवाजा वास्तव में बंद है.

ड्राईवर कहने लगा-“चलिए,सर! पुलिस स्टेशन चलेंगे.” पडौसी सहानुभूति जता रहे थे. कह रहे थे,-” दो-चार दिन पहले, आधी रात को, धड-धड की आवाजें आ रही थी आपके घर की तरफ से. हम तो सोच रहे थे कि शायद कोई पेड़ काट रहा होगा.”

अजितेश ड्राईवर को लेकर पुलिस स्टेशन जाते समय यह कहते हुए गया था-” किसी भी चीजों को इधर-उधर मत करना. छूना भी मत. थाने में एफ.आई.आर देकर आ रहा हूँ.” अजितेश के जाने के बाद पडौसी भी आपस में चलो चलो कहते हुए अपने घर को लौट गये.

सुसी ने देखा था कि उसका पूरा घर बिखरा-बिखरा , अस्त-व्यस्त पडा था. जो चीज जहाँ होनी चाहिए थी, वहां पर नहीं थी. किसी ने सभी तकियों को फर्श पर बिछा कर, उसके उपर सुला दिया था उसकी अलमीरा को. पास में मूक-दर्शक बनकर खड़ी हुई थी बेबी की वह अलमीरा. जमीन पर बिखरी हुई थी बाज़ार से खरीदी हुई इमिटेशन ज्वैलरी जैसे कान के झुमके,बालियाँ और गले का हार.यहाँ तक कि, भगवान के पूजा-स्थल को भी किसी ने छेड़ दिया था.

सुसी ने सभी कमरों में जाकर देखा था. टीवी अपनी जगह पर ज्यों का त्यों था, कंप्यूटर भी वैसे का वैसे ही पड़ा था. माइक्रो-ओवेन रसोई घर में झपकी लगाकर सोयी हुई थी. और बाकी सभी वस्तुयें अपनी-अपनी जगह पर सुरक्षित थी. पर चोर ने नोकिया का पुराना मोबाइल सेट और एक पुराने कैमरा को अनुपयोगी समझकर बेबी के बिस्तर में फेंक दिया था.

परन्तु जब सुसी ने बेड रूम के बाहर का पर्दा हटाकर देखा, तो वह आर्श्चय-चकित रह गयी यह देखकर कि उस रूम का ताला ज्यों का त्यों लगा हुआ था.अरे! किसीने उस कक्षा को छुआ तक नहीं, उसे ज्यों का त्यों अक्षत छोड़ दिया.

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बेबी ने आवाज लगायी, “मम्मी, देखो,देखो.”

“क्या हुआ,” बेबी के कमरे में घुसते हुए सुसी ने पूछा.

“जिस चोर ने तुम्हारी अलमीरा को तोडा, उसने मेरी अलमीरा को क्यों नहीं तोडा?”

आस-पास ही थी दोनों अलमीरा, बेबी के कमरे में. एक सुसी की अलमीरा, तो दूसरी बेबी की.बेबी की अलमीरा में बेबी की हरेक चीज तथा कपडा रखा जाता था. सुसी की अलमीरा में लॉकर को छोड़ बची हुई जगह में साडी का इतना अधिक्य था कि और साडी रखने से उसे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता था.

देखते ही देखते सुबह हो गयी.ड्राईवर और अजितेश, पुलिस स्टेशन में थानेदार को न पाकर , उसके घर चले गए थे.थानेदार की किडनी में स्टोन था. वह वेल्लोर से कुछ दिन हुए लौटा था. “मैं सुबह नौ बजे से पहले नहीं आ पाउँगा ” बड़े ही कटु आवाज में बोला था थानेदार, ” आप लोग जाइये, सब कुछ सजा कर रख दीजिये, मैं नौ बजे तक पहुँचता हूँ.”

ड्राईवर की सहायता से नीचे मूर्छित पड़ी अलमीरा को उठाकर खडा किया था अजितेश ने. अब, दोनों अलमीरा पास पास खड़ी हुई थीं.

ड्राईवर ने जाने की इजाज़त मांगी, ” तो, मैं जा रहा हूँ ,सर.” अजितेश को थानेदार के ऊपर पहले से ही काफी असंतोष था, और ड्राईवर से कहने लगा,”ठीक है, तुम जाओ, और रूककर करोगे भी क्या?” ड्राईवर रात दो बजे से प्रतीक्षा कर रहा था स्टेशन पर. अजितेश का अनुमति पाते ही वह तुरंत रवाना हो गया. किस रस्ते से चोरी हुई होगी, छान-बीन करने के लिए सुसी और अजितेश इधर-उधर देखने लगे. पता चला कि बाथरूम के रोशन दान में लगा हुआ शीशा टूट कर नीचे गिरा हुआ था. चोर जरुर उसी इसी रास्ते से होकर अंदर घुसा होगा, जिसका वह प्रमाण छोड़कर गया कोमोड़ के ऊपर रखा हुआ था फूलदान. आरी-पत्ती की मदद से सब ताले टूटे हुए थे.

सूटकेस, एयर बैग, तब तक ड्राइंग रूम में रखा जा चुका था. इतनी देर तक हाथ-मुहं धोने की भी फुरसत नहीं थी सुसी की. सवेरे-सवेरे टहलते हुए लोग बाहर चारदीवारी का दरवाजा खोलकर घर के भीतर आ गये थे. पता नहीं, इतनी सुबह-सुबह इस घटना की जानकारी लोगों को कैसे मिल गयी?

:” अरे,ये सब कैसे हो गया?”

:” आप लोग कहाँ गये थे?”

:” चार दिन पहले, मोर्निंग-वाक में जाते समय मैंने देखा था की आपके कमरे की एक लाइट जल रही थी. मैंने सोचा कि आप लोग बंद करना भूल गये होंगे.”

:” दस दिन के लिए बाहर गये थे? किसी को तो बताकर जाना चाहिए था.”

:” आपको पता नहीं है, ये जो जगह है, यहाँ चोरों की भरमार है.”

उस समय तक पूरा शरीर थक कर चूर-चूर हो चूका था. एक, उपर से लम्बी यात्रा की थकान; दूसरी, रात भर की अनिद्रा. ऐसा लग रहा था मानो शरीर का पुर्जा-पुर्जा ढीला हो गया हो. लेकिन लोगों का आना-जाना जारी था. जल्दी-जल्दी, घर साफ़ कर पहले जैसी साफ-सुथरी अवस्था में लाने की कोशिश कर रही थी सुसी.

उसने हाथ घुमा कर भीतर से देखा था कि लॉकर के भीतर फूटी कौडी भी नहीं थी और लॉकर बाहर से टूटकर टेढा हो गया था. सोना चांदी के गहने और अब कहाँ होंगे? घर सजाते-सजाते, बाद में सुसी को यह भी पता चला कि पीतल का एक बड़ा शो-पीस, कांसे की लक्ष्मी की मूर्ति, चांदी का कोणार्क-चक्र भी शो-केस में से गायब हैं.

यह सब देखकर बेबी को तो मानो रोना आ गया हो. अजितेश डांटते हुए बोला था,” रो क्यों रही हो? ऐसा क्या हो गया है?”

:” मम्मी, देख रही हो, मेरे कान के दो जोड़ी झुमके भी चोर ले गया. चोर मर क्यों नहीं गया? मैं उसको, श्राप देती हूँ कि उसको सात जन्मों तक कोई खाना नहीं मिलेगा?”

:” चुप हो जा, पागल जैसे क्यों हो रही हो?”

सुसी डांटने लगी थी. बेबी को कान के झुमकों के लिए रोते देखकर सुसी को याद आने लगा था अपने सारे गहनों के बारे में.

:” तुम्हारी सोने की एक चेन , मेरा मगल सूत्र, दो चूड़ियाँ इतना ही तो घर में था न?” पूछने लगी थी सुसी बेबी से.

:”और मेरी अंगूठी?” पूछने लगी थी बेबी.

:” हाँ, हाँ, वह अंगूठी भी चली गयी.”

:” पापा की गोल्डन पट्टे वाली घड़ी?”

:” ठीक बोल रही हो, वह भी.”

:” और याद करो तो बेबी और किस-किस चीज की चोरी हुई होगी?”

:” आप के सोने का हार, उसको आपने कहाँ रखा था?”

:” इमिटेशन डिब्बे में ही तो था. क्रिस्टल के साथ गूँथकर रखा हुआ था.” सुसी बेबी के नकली गहनों के सब डिब्बे खोल-कर देखने लगी थी.

:” नहीं, नहीं, यहाँ तो कहीं भी नहीं है.” बेबी कह रही थी.

:” एक और बात, अगर आपको पता चल जायेगा तो आपका मन बहुत दुखी हो जायेगा, इसलिए मैं आपको नहीं बता रही हूँ.”

सुसी की आँखों में आंसू देखने से जैसे उसको ख़ुशी मिलेगी, उसी लहजे में चिढाते हुए बोली थी बेबी, ” बोलूं?”

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