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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 18)

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अब तक आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह मेरे सुहागरात में हमारे बेडरूम में वासना का नंगा नाच खेला जा रहा था। मेरी मां, चाची, पंडित जी हमारे ही कमरे में हमारे सामने बेशरमी से वासना का नंगा नाच खेल रहे थे। मेरे पतियों ने मेरी मां के शरीर से अपने अपने अंदाज में जी भर के मौज किया। उनकी चुदाई देख देख कर मैं भी उत्तेजित हो गई थी।। उसी उत्तेजना को शांत करने के लिए मैंने पंडित जी जैसे बदशक्ल, बेढब, आदमी की अंकशायिनी बनना स्वीकार किया था। पंडित जी की तो जैसे लाटरी निकल पड़ी। पहले सालों से चाची को चोदने की तमन्ना पूर्ण हुई। फिर मेरी मां के मादक जिस्म को भोगने का स्वर्ण अवसर प्राप्त हुआ। अब मेरी दपदपाते मदमस्त गदराए यौवन का रसपान करने का कल्पनातीत स्वर्णिम अवसर मिल रहा था। उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह स्वप्न है या हकीकत। मैं उसकी हालत समझ रही थी। मैं शुरू से देख रही थी कि पंडित जी की भूखी नज़रें मुझ पर ही टिकी हुई थीं। जब वे मेरी मां की मादक देह का मर्दन कर रहे थे, जब चाची की चूत की चटनी बना रहे थे, तब भी उसकी नजरें मेरे ही जिस्म से चिपकी हुई थीं। ऐसा लग रहा था मानो मां और चाची को चोदते समय उनके दिमाग में सिर्फ मैं थी और शायद कल्पना में मुझे ही चोद रहे थे।

लाटरी तो मेरी भी निकल पड़ी थी। पंडित जी के आकर्षक विशाल लिंग से चुदने की कल्पना साकार होने जा रही थी। मेरे सारे शरीर में चींटियां रेंगने लगी। पंडित जी जंगली भालू की तरह लग रहे थे। उनका बड़ा सा लिंग सामने किसी काले नाग की तरह झूम रहा था। बाहर की ओर निकले बड़े बड़े पीले दांत दिखाते हुए अश्लीलता पूर्वक मुस्कुराते हुए खड़े हो गए और मेरे नग्न जिस्म को खा जाने वाली नजरों से देखने लगे। मेरे पास आकर मेरे चेहरे से हाथ हटाते हुए बोले, “बहुरानी, देख मैं आ गया हूं तेरी प्यास बुझाने।” इतने नजदीक से पंडित जी के वीभत्स रूप को देख कर एक बार तो मैं वितृष्णा से भर उठी। फिर मैं सोचने लगी कि मुझे इसके रुप रंग से क्या लेना देना है। चुदना तो उसके लिंग से है। मैं कुछ बोली नहीं, खामोशी से अपने नग्न जिस्म को उस कामुक भेड़िए के भोग के लिए समर्पित कर दिया। उसने अपने बदबूदार मुंह को पास ला कर गंदे होंठों से मेरे होंठों को चूम लिया। सांस लेने में मुझे घुटन सी महसूस हो रही थी, किंतु अपनी इस हालत के लिए तो मैं खुद ही जिम्मेदार थी, अतः बर्दाश्त करने को वाध्य थी। फिर उनके बनमानुषी पंजे मेरे उन्नत उरोजों पर नृत्य करने लगे।

उन्होंने एक हाथ से मेरा हाथ पकड़ा और अपने मूसल सरीखे काले लिंग पर रख दिया और कहा, “ले बहुरानी, मेरा लौड़ा को पकड़ के देख। इसी लौड़े से मैं तेरी चूत की प्यास बुझाऊंगा।”

“हाय दैया, इतना मोटा और लम्बा।” गनगना कर मेरे लबों से सिर्फ यही अल्फाज़ निकले। दर असल मैं घबरा गई थी। मेरी जिंदगी में इतना बड़ा लिंग पहले कभी नहीं देखा था। दूर से इसका आकार इतना बड़ा नहीं लग रहा था। इतने सामने से दस इंच लम्बा और करीब चार इंच मोटा लिंग देख कर और हाथ में लेकर लेकर वाकई मैं दहशत में आ गयी। सिहर उठी मैं, रोंगटे खड़े हो गए। मैं समझ गई कि पंडित जी के विशाल फनफनाए लिंग से चुदने की इच्छा ने मुझे अच्छी खासी मुसीबत में डाल दिया है। अब भुगतना तो था ही। दिल कड़ा करके मैं ने सोच लिया कि ऊखल में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना।

पंडित जी माहिर चुदक्कड़ थे। मेरी मानसिक स्थिति को समझ गये। पहले मेरे उन्नत उरोजों को सहलाने लगे। उनकी जादुई हथेलियों के स्पर्श से मुझ पर नशा सा तारी होने लगा। मेरी आंखें बंद होने लगीं। मैं बेख्याली में अपने हाथों से उनके मूसल लिंग को पकड़ कर सहलाने लगी। उनके लिंग के चारों ओर बेहद घने लम्बे लम्बे बाल भरे हुए थे। वैसे तो उनका बेहद मोटा तोंदियल कोयले की तरह काला शरीर पूरा ही बालों से भरा हुआ था किंतु लिंग के चारों ओर करीब तीन तीन इंच घने लंबे बाल लिंग को और भयानक रूप दे रहे थे। मोटे और पत्थर की तरह कठोर लिंग के बाहरी चमड़े पर ऊंची ऊंची उभरी हुई नसों के कारण लिंग और भी भयावह दिख रहा था। कुछ मिनटों पश्चात उन्होंने मेरे सख्त उन्नत उरोजों को चाटना और चूसना शुरू कर दिया। मैं मदहोश होने लगी और मुह से सिसकारियां उबलने लगीं। कुछ मिनटों पश्चात उन्होंने मुझे सीधा लिटा दिया और चूमते चाटते अपना मुंह मेरी नाभि से होते हुए मेरी चिकनी योनि तक ले आए। मैं उनके इन कामोत्तेजक हरकतों से उत्तेजना के मारे मेरी सांसें धौकनी की तरह चलने लगी और सीना फूलने पिचकने लगा, मेरे शरीर में कामोत्तेजक लहरें उफ़ान मारने लगीं, मैं थरथराने लगी। पंडित जी ऐसी स्थिति में थे कि उनका भीमकाय लिंग ठीक मेरे मुंह के पास झूलने लगा था। इधर वे मेरी योनि के भगांकुर को अपनी जादुई जिह्वा से छेड़छाड़ करने लगे।

“उफ्फ, आ्आह्ह्ह” मैं आहें भरने को विवश हो उठी। पंडित जी इतने चालाक थे कि धीरे धीरे अपने लिंग के सुपाड़े को मेरे खुले होठों के बीच ले आए और हल्के-हल्के अपनी कमर को जुम्बिश देते रहे, परिणाम स्वरूप धीरे धीरे उत्तेजना के मारे बेध्यानी में उनके विशाल सुपाड़े को होंठों के बीच ले कर चूसने लगी। जीभ से चाटने लगी। पंडित जी मेरी कामुकता को हवा दे कर भड़का रहे थे ताकि उनके विकराल लिंग का भय मेरे मन से विलुप्त हो जाए। पंडित जी की योजना सफल होती जा रही थी। अब मैं उनके लिंग का एक तिहाई हिस्सा मुंह में ले चुकी थी और आनंद के अतिरेक में आंखें बंद किए बदहवास, चूसने में लीन थी। शायद उससे ज्यादा ले भी नहीं सकती थी। पंडित जी जबरदस्ती अपना लिंग मेरे मुंह में ठोक कर मुझे भयभीत नहीं करना चाहते थे, लेकिन चाट चाट कर मेरी फक फक करती योनि में भयानक अग्नि भड़का चुके थे। मैं कसमसाने लगी। पंडित जी समझ गये कि लोहा गरम है और फौरन सीधे हो मेरे पैरों को फैला दिया और जांघों के बीच आ गये। मैं बेचैनी से सिसकारियां भर रही थी। तभी पंडित जी ने अपने लिंग का विशाल सुपाड़ा मेरी गीली योनि के द्वार पर टिकाया और आहिस्ता आहिस्ता दबाव बढ़ाने लगे। उनका चिकना सुपाड़ा मेरी योनि के द्वार को फैलाता हुआ अहिस्ता आहिस्ता अंदर सरकता जा रहा था। मैं इतनी उत्तेजित थी कि मेरी योनि को सीमा से बाहर फैलाता हुआ इतने मोटे लिंग के प्रवेश से होने वाली व्यथा पर, बेलनाकार लिंग के बाहरी भाग का मेरी योनि मार्ग की भीतरी दीवार पर हो रहे सरसराहट भरे घर्षण से उत्पन्न अद्भुत आनंद हावी हो गया और मैं आंखें बंद किए उस अनिर्वचनीय सुख के सागर में डूबती चली गई। कब उसका विकराल लिंग मेरी योनि के अंदर मेरे गर्भगृह तक पैबस्त हो गया मुझे अहसास ही नहीं हुआ। हां उसके लिंग के सुपाड़े की दस्तक को मैंने अपनी कोख में अवश्य महसूस किया। जब पंडित जी ने देखा कि उसने संभोग का प्रथम चरण सफलता पूर्वक तय कर लिया है तो एक पल रुका और धीरे धीरे कमर उठाते हुए लिंग बाहर निकालने लगा। उतना ही निकाला कि लिंग का सुपाड़ा योनि के अन्दर ही रहे।

“आह्ह्ह्ह्ह ओह ओ्ओ्ओ्ओह” उसके विशाल लिंग के लिए संकीर्ण योनि मार्ग में वह चरम आनंद प्रदान करने वाला घर्षण, अनूठा था। लिंग के बाहरी चमड़े पर उभरे हुए नसों के कारण घर्षण का आनंद दुगुना हो गया था। मेरी योनि की भीतरी दीवार उसके लिंग पर कसी हुई मचल रही थी। ओह वह अहसास। शब्दों में बयां करना मुश्किल था। फिर वह पुनः धीरे धीरे लिंग मेरी योनि में अंदर धकेलने लगा। “ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह” गज़ब का था वह अहसास, उसके मोटे लिंग पर अपेक्षाकृत मेरी संकीर्ण योनि का कसाव।

जब उसने देखा कि मैं उसके लिंग को सुगमतापूर्वक अपनी योनि में समाहित कर रही हूं, उसने मेरे दोनों पैरों को अपने कंधों पर चढ़ा लिया और मेरी कमर को दृढ़ता पूर्वक अपने दैत्याकार पंजों से थामा और बड़े ही भद्दे ढंग से मुस्कुराते हुए कहा, “तू तो बड़ी खेली खाई लौंडिया है बहु। मेरा लौड़ा पहली बार में ही आराम से ले ली। चल रानी अब तू देख मैं तेरी चूत की प्यास कैसे बुझाता हूं।” कहते हुए एक करारा ठाप मार दिया। “ले मेरा लौड़ा अपनी चूत में, ओह,” अबतक आराम से पंडित जी मेरे साथ पेश आ रहे थे किंतु अब उनकी पाशविक प्रवृत्ति जागृत हो गई थी। धीरे धीरे वे अपनी चोदने की रफ़्तार बढ़ाते चले गये। मैं उनके भैंस जैसे मोटे शरीर को अपनी बाहों से समेटने की असफल कोशिश करती रही। उनके शरीर के बालों का अपने नंगे जिस्म पर रगड़ना अलग ही मजा दे रहा था। ज्यों ज्यों उसकी रफ़्तार बढ़ती गई, मैं आनंद के अथाह समुद्र में डूबती गई।

“आह पंडित जी, ओह ओ्ओ्ओ्ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह” मैं बुद बुदाने लगी।आराम से चुदने और इस तूफानी अंदाज में चुदने में बहुत फर्क था और वह भी इतने बड़े लंड से। आम स्त्रियों के लिए सच में भयावह था, किंतु मैं उन आम स्त्रियों की श्रेणी में नहीं थी। खेल कूद में सदैव अव्वल रहने वाली सुगठित देह की स्वामिनी थी मैं। पिछले कुछ ही दिनों में मैं इस प्रकार के वासना के खेल में अच्छी खासी महारत हासिल कर चुकी थी। रतिक्रिया में माहिर पंडित जी अब मेरी नग्न कमनीय मादक देह को अपने दानवी शरीर से पूरी पैशाचिकता के साथ संभोग में मशगूल हो गए और अपनी अदम्य संभोग क्षमता से मुझे दूसरी ही दुनिया में पहुंचा दिया। मैं अपने पतियों और मां, चाची, सबकी उपस्थिति भूल गयी और मदहोशी के आलम में बेशर्मी पर उतर आई, “आह, ओह ओ्ओ्ओ्ओह चोदू पंडित जी, आह राजा ओह साले कमीने कुत्ते मेरी चूत के लौड़े, चोद मादरचोद, मां के चोदू, चाची की चूत के रसिया, हाय राजा, गधे के लौड़े, चोद राजा चोद साले मेरी चूत की चटनी बना दे आह आह मेरी बुर का भोंसड़ा बना डाल राजा, काले भैंसे, साले चोदू भालू” और न जाने क्या क्या बके जा रही थी।

मेरी बड़बड़ाहट से उत्साहित पंडित भी बड़बड़ाने लगा, “आह बहुरानी, ओह ओ्ओ्ओ्ओह रानी ओह रंडी कुतिया आह हरामजादी, मस्त लौंडिया है रे तू, लौंडिया की चूत, आह हुमा,” और न जाने क्या क्या बोले जा रहे थे और मुझे करीब तीस पैंतीस मिनट तक नर पिशाचों की तरह नोचते खसोटते रौंदते भंभोड़ते रहे। फच फच की आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी। इस दौरान हम दोनों आनंदातिरेक में डूबे अपने अंदर की मनस्थिति व मनोभावों को खुल कर अपशब्दों और बेहद घृणित अश्लील शब्दों के द्वारा व्यक्त करते रहे। मैं उनकी पैशाचिक हरकतों से हलकान होने की जगह पूरी बेहयाई पर उतर आई और रंडियों की तरह खुल कर पूरी शिद्दत से प्रति पल प्राप्त होने वाले नवीनतम आनंद से विभोर होती रही। उनके दीर्घ स्तंभन क्षमता की मैं कायल हो गई। रतिक्रिया के दौरान मैं अपनी चूतड़ नीचे से ऊपर उछाल उछाल कर पंडित जी का पूरा साथ दे रही थी। अंततः पंडित जी के स्खलन का समय आ पहुंचा। चोदने की रफ़्तार इतनी बढ़ गई थी कि ऐसा लग रहा था मानो वे मानव नहीं कोई संभोग की मशीन हों। मैं समझ गई कि पंडित जी खलास होने के करीब पहुंच गये हैं। सच बात तो यह है कि मैं इस दौरान दो बार झड़ चुकी थी। अभी तीसरी बार झड़ने के करीब थी। अचानक ही उन्होंने मुझे पूरी शक्ति से जकड़ लिया और फिर शुरू हुआ उनका अंतहीन स्खलन। उसी समय मैं भी झड़ने लगी।

“ओह मां, ओह ओ्ओ्ओ्ओह आह्नेह्ह्” संभोग के सुख का वह चरमोत्कर्ष, मैं निहाल हो गई। थरथराती कांपती हुई आंखें बंद किए स्वर्गीय सुख से सराबोर होने लगी।

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मेरे मुंह से बेसाख्ता सिसकारियां निकलने लगीं। “ले बुर चोदी बहुरानी मेरा माल अपनी चूत में आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह” किसी जंगली भालू की तरह मुझ से चिपक कर अपने लिंग के वीर्य से मेरी कोख को सींचने लगे। ऐसा लग रहा था मानो मेरी कोख में वीर्य का बाढ़ आ गया हो। इस समय मेरी संकुचित योनि उसके लिंग से कस के चिपक गई थी। मेरी योनि ने एक तरह से उनके लिंग को जकड़ लिया था। जब तक उनका लिंग स्खलित हो कर शिथिल नहीं हो गया तब तक मेरी योनि की दीवारें उनके लिंग से चिपकी उनके लिंग से निकलते वीर्य का कतरा कतरा अनमोल मोतियों की तरह जज्ब करती रही। पूरी तरह झड़ चुकने के बाद पंडित जी ने मुझे अपने दानवी पाश से मुक्त किया और उनका निचुड़ चुका लिंग मेरे द्वारा योनि को सप्रयास संकुचित कर सख्ती से पकड़े रखने की कोशिश के बावजूद शिथिल हो कर फच्च की आवाज से बाहर निकल आया। उनका राक्षसी लिंग इस वक्त भीगे हुए मासूम चूहे की तरह दिखाई दे रहा था। मैं पूर्ण रूप से तृप्त हो चुकी थी। मेरा पूरा शरीर हल्का हो कर हवा में उड़ रहा था। मैं पगली दीवानी उस मोटे भैंस के बेडौल नंगे जिस्म से लिपट कर उनके कुरूप चेहरे पर चुम्बन जड़ दी। उनका घिनौना चेहरा और बेडौल तन मुझे बहुत प्यारा लगने लगा था।

“खुश कर दिया राजा। शुक्रिया मेरे पतियों, सुहागरात में इतना यादगार तोहफा देने के लिए।” मैं थकान से चूर बिस्तर पर लुढ़क कर लंबी-लंबी सांसें लेने लगी।

कमरे में उपस्थित बाकी सारे लोग खामोशी से तमाशबीनों की तरह हमारी कामलीला देख रहे थे। अब तक मेरी मां अपना होश संभाल चुकी थी। उनके मुख से निकला, “बना दिया ना मेरी बेटी को भी रंडी। पांच पांच मर्दों की पत्नी होने के बावजूद एक बाहर का आदमी मेरी बेटी को उनकी आंखें के सामने चोद रहा था और सारे के सारे नामर्द पति तमाशा देख रहे थे, साले मादरचोद कुत्ते।”

“चुप साली रंडी। हमारी पत्नी, तेरी बेटी, हमारी मर्जी से चुद रही थी, तेरे जैसी नहीं कि पति की आंख बचाकर किसी भी मर्द का लौड़ा लेने के लिए मरी जा रही है।” हरिया बोला।

“अच्छा तो मुझे रंडी कहने के पहले पहले ये बताओ हरामी, कि मैं आज दूसरे मर्दों से चुद रही हूं तो क्यों? क्योंकि मैं अंदर से बहुत चुदासी रहती हूं और इसके जिम्मेदार तुम, ससुर जी और बड़े ससुरजी हैं। तुम लोगों ने मेरी नादानी का फायदा उठाकर मुझे रंडी की तरह चोद चोद कर मुझे चुदाई का नशा चढ़ा दिया। मुझे इन बातों से अब कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि मैं इस तरह की जिंदगी में खुश हूं। मैं ने तो कभी मेरी इस स्थिति के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया, बल्कि उल्टे मैं तो खुश हूं कि आप लोगों ने मुझे जीवन जीने का आनंदमय मार्ग दिखा दिया। और तो और मेरे पति, कामिनी के पापा भी कम जिम्मेदार हैं क्या? वो नामर्द, कभी भी मुझे पत्नी का सुख नहीं दे पाया। दो मिनट में खलास हो कर हमेशा मुझे तरसती छोड़ कर सो जाता है।” बोलती जा रही थी “ऊपर से है समलैंगिक (गांडू), मर्दों से गांड़ मरवाने की आदत। हां, मेरे पति को स्त्रियों में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। चिकना है। अब आप लोग ही बताइए ऐसे मर्द की पत्नी क्या करे?” बड़े दादाजी की ओर देखते हुए बोली, “आप भी तो उनका गांड़ मारते हैं, अभी चुप क्यों हैं? बोलिए, सच है कि नहीं?”

“हां भाईयों यह सच है,” सर हिलाते हुए बड़े दादाजी बोले, “कामिनी का बाप चिकना तो है ही, ऊपर से उसको गांड़ मरवाने की आदत भी है। तुम सब लोगों को पता नहीं है क्या कि उसका गांड़ बिल्कुल औरतों की तरह है? मुझे वैसे भी गांड़ चोदने का शौक तो है ही। उसकी गांड़ देखने से ही मेरा लौड़ा खड़ा हो जाता है। पिछले दस सालों से मैं उसकी गांड़ मारता आ रहा हूं। मगर मैं जबरदस्ती कभी नहीं किया। वह खुद ही मुझे ललचा कर गांड़ मारने को तैयार किया। कई लोगों से उसका संबंध है। परिवार की इज्जत की खातिर मैं ने किसी को नहीं बताया, यहां तक कि रघु को भी नहीं। आज जब बात खुल ही गई है तो बता रहा हूं।”

हम सब को जैसे काठ मार गया था। कमरे में सन्नाटा पसर गया था। सब चुपचाप बड़े दादाजी की बातें सुन रहे थे। हे भगवान! यह कैसा परिवार था मेरा? नानाजी, दादाजी, बड़े दादाजी, पापा हरिया, करीम चाचा, मां सब एक से बढ़कर एक वासना के भूखे, कामुकता के दलदल में आकंठ डूबे। अब पिताजी के समलैंगिक होने का रहस्योद्घाटन। उन्हीं के नक्शे-कदम पर चलती अब मैं।

“तुम ठीक कह रही हो लक्ष्मी। मैं भी आज इस स्थिति में हूं तो इन्हीं के तरह के कामुक मर्दों की वजह से। सारे मर्द एक जैसे हैं। पहले हम जैसी स्त्रियों का शिकार करेंगे और खुद को पाक साफ दिखाएंगे, सारी बदनामी हम स्त्रियों के माथे मढ़कर।” अब तक चुप चाची भी बोल उठी।

“लो, अब तू भी बोल ले। अब तेरे छिनाल बनने में हमारा क्या दोष? तू तो पहले से बनी बनाई छिनाल है, हमने तो सिर्फ बहती गंगा में डुबकी लगाई है।” पंडित जी बोले।

“अच्छा तो सुनाऊं मैं आप मर्दों के किस्से? आप नहीं तो क्या हुआ, आप जैसे मर्दों की कमी है क्या हमारे समाज में? बताऊं मैं, शरीफों का नकाब ओढ़े हुए यहां के मर्दों के बारे में, जिन्होंने मुझे एक शरीफ घरेलू औरत से छिनाल बना कर रख दिया। मुझे चोद चोद कर किस तरह मेरे अंदर चुदास भर दिया है यहां के तथाकथित शरीफ मर्दों ने। अगर आप लोग सुनना चाहते हैं तो सुनिए।” चाची बोली।

“ठीक है ठीक है, तू भी अपनी रामकहानी सुना देना, मगर अभी नहीं, कल सवेरे। चलो अब सब सो जाओ।” दादाजी बोले।

मुझे भी बहुत सारी बातें जाननी थी। चाची की चुदाई यात्रा के बारे में और मेरे पापा के समलैंगिक होने के बारे में। और भी पता नहीं क्या क्या छिपा है हमारे परिवार के सदस्यों के बारे में। यही सब सोचते सोचते पता नहीं कब आंख लग गई।

बाकी की बातें अगली कड़ी में

तब तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।

आपकी रजनी

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