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बच्चों की फिल्म बनाने के बहाने गलत किया

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सोलह साल की देवयानी को नृत्य करना और ड्रामा में डायलॉग अदायगी के साथ अभिनय करने में कई पुरस्कार मिल चुके थे। नृत्य वह 9 साल की उम्र से और नाटकों में अभिनय 11 साल से करने लगी थी । उसके नृत्य गुरु छगन महाराज थे जो अब नहीं है, अब जो गुरु है वो क्लासीकल के बजाय  चालू लोकनृत्य ज्यादा सिखाता है। देवयानी केअब के गुरु कुन्दन महाराज बहुत उम्रदार नहीं बल्कि बस 28 के ही हैं, जबकि छगन महाराज 47 के थे।कुन्दन तो नाम का ही महाराज है , उसे तो लड़कियां अब मिस्टर कुंदनलाल कहने लगी हैं। नाटकों में देवयानी ने काफी भाग लिया; शुरू से ही वो इनमें छोटी बच्ची का रोल करती आई है। उसे पिछले पाँच वर्षों में तीन पुरस्कार भी मिल चुके हैं। उसकी स्कूल की प्रिन्सिपल मंजरी दी ने उसे चिल्डरन फिल्म सोसाइटी की बाल फिल्मों में भूमिका दिलाने की कोशिश तो की थी पर वो काम बना नहीं। इस बीच देवयानी ने एक अलग तरह के नाटक ‘जंगली कबूतर’ में एक अल्हड़ लड़की का रोल कर लिया था जिसमें कुछ अश्लीलता भी थी। इसमें देवयानी ने खुद कुछ अश्लीलता नहीं की न अश्लील डायलॉग बोले मगर एक 7 मिनट के दृश्य में तीन स्टूडेंट्स व एक टीचर जो कि उसमें एडल्ट रोल कर रहे थे वे ही बोले थे। देवयानी ने तो संवादों को सिर्फ सुना था और सुन कर जीभ निकाली थी। फिर नाटक हिट रहा और किसी को गलत नहीं लगा; यहाँ तक कि देवयानी के मम्मी-पापा को भी।

इस नाटक के हिट होने के बाद देवयानी की मॉम व डैडी के पास कुछ ऑफर  आए पर वो सेनीटरी निपन के थे इसलिए उसके पापा ने मना कर दिया। एक दिन एक बड़ी वेगन उनके मकान के सामने उतरी जिसमें एक भव्य महिला और तीन-चार बच्चे उतरे । बच्चे तो 7-9 वर्ष के ही थे पर महिला 35 की थी।महिला ने बताया कि उसने देवयानी का नृत्य व ड्रामाबाजी देखी है, बोली– आपकी बच्ची में प्रतिभा है। मैं एक बच्चों की फिल्म कंपनी  ‘नूतन बाल बहार’ से हूँ; हमें बच्चे तो बहुत मिल गए बस कमी है तो दो-चार प्रतिभाशाली बच्चियों की। देवयानी के पिताश्री पर इस महिला का मोहक प्रभाव पड़ा और वे अपनी बेटी देवयानी को उसकी फिल्म कंपनी में उतारने को तैयार हो गए। उसके कुछ फोटो खास ढंग से खींचे गए, एक नया वीडियो था जिसमें देवयानी की नृत्यकला के नमूने थे। महिला वह लेती गई पर काफी दिनों से उसका कोई जवाब नहीं आया तो देवयानी के पिता ने महिला को फोन कर स्थिति जाननी चाहिए व तकाजा भी किया। पिता चाहते थे कि इसी फिल्म कंपनी मे देवयानी का कारज सिद्ध हो। महिला ने बताया कि कुच्छ टेकनिकल पेंच हैं अगर आप अपनी बच्ची इस कंपनी में लगाना चाहते हैं तो हमारे दफ्तर आकर बात कर लीजिये। चूंकि काम के साथ पैसों का भी ऑफर अच्छा खासा था उसके पिता मामला जानने कंपनी के दफ्तर पहुँच गए। कंपनी में बच्चे ही बच्चे थे और महिलाएं ही महिलाएं। सिर्फ कंपनी का डाइरेक्टर जनरल एक प्रौढ़ पुरुष था। उसने बताया कि उन्हें ‘ठीक बच्चियाँ तो अभी भी नहीं मिली है और आपकी बच्ची के काम को भी मैं जानता हूँ। एक तो आपको अभिभावक के  नाते एग्रीमंट करना होगा और दूसरा फिल्म लाइन के दस्तूर समझने होंगे। एग्रीमेंट की भाषा कुछ टेक्निकल है , वो अगर समझ में आती है तो ठीक, अगर न भी आती है तो आप मेरे विश्वास पर दस्तखत करेंगे, अपने वकील से मैं आपको मिलवा देता हूँ। ये इस अटैची में अग्रिम रकम है जो हम खानापूरी होते ही तुरंत आपको दे देंगे। हमारी पहली बाल फिल्म ”नन्ही परी जल में उतरी ” है  और इसमें आपकी बच्ची को परियों कि ड्रेस में जल में उतर नृत्य करना है, बाकी दृश्य आपको डाइरेक्टर समझा देंगी।’ रुपयों का लालच और वहाँ का तामझाम देख देवयानी के पिता आकाश पादुकोण ने करार पर दस्तखत कर दिए; तकनीकी भाषा उन्हें समझ मे नहीं आई। फिर भी सह-निदेशिका लीलावती ने बताया कि इसमें कभी-कभी बच्ची को अर्ध नग्न होना पड़ेगा पर वो बच्चियों के बीच ही होगा; इसके अलावा कहानी की जरूरत हुई तो कुछ ज्यादा भी। आजकल ऐसे दृश्यों को गलत नही समझा जाता; अगर आप अपनी बच्ची का भविष्य, उसकी प्रसिध्हि देखना चाहते है और अच्छा धन कमाना चाहते हैं तो आपको पुराने विचार, टेबू फेंकने होंगे। आकाश को कुछ समझ मे नहीं आया; वे  बुत बने रहे , फिर बोले– तो बच्ची को आपकी सेवा में कब भेजूँ? रुपयों भरी अटेची वे ले आए और पत्नी को भी सारी बात बता दी। पत्नी बोली हमारी बिटिया बाल फिल्म में नंगी भी हो जाती है तो क्या? आखिर फिल्म वाले समझदार लोग हैं और फिर सेंसर बोर्ड भी है।

अगले दिन देवयानी अपने माता-पिता के साथ गई। डाइरेक्टर जनरल ने कहा — स्क्रीन टेस्ट और बहुत सारे क्रिया कर्म होंगे , काफी रात तक ये फारिग होगी। आप चाहें तो रुकें या फिर घर जाएँ। ये लाइन ही ऐसी है, बहुत मेहनत करनी पड़ती है। सो उसके माता -पिता तो उसे फिल्म आश्रम में छोड़  अपने घर चले आए।

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देवयानी को  बैठे-बैठे ज्यूस और मिठाई खाने को मिली। स्क्रीन टेस्ट में भी कुछ खास नही हुआ बल्कि उस भद्र महिला ने कहा कि टेस्ट की जरूरत ही नहीं है, इसलिए डाइरेक्टर -महिला उसे सही सलामत उसके मां-बाप के घर छोड़ आई। बच्ची ने भी कहा– सब अच्छे लोग है और गलत कुछ नही हुआ।

दूसरे दिन उसका ट्रायल-रिहर्सल था, उसे नन्ही परी की ड्रेस में फ्रॉक पहनने को दी वह उसकी जांघों से काफी ऊंची जा रही थी , साथ ही ऊपर — मतलब छाती के कपड़े काफी महीन और कमजोर थे। इन कपड़ों में उसे पानी में उतरना, खिलखिलाना, व तैरना था जो उसने किया पर भीगने के कारण उसका बदन प्रायः नंगा दिख रहा था। जब वह जल से निकली तो तुरंत सूखे तौलिये से खुद को ढंका व कपड़े बदले। उसे कोई गलत नही लगा । इतना तो होता ही है फिल्म लाइन में।

अगले दिन भी उसने फ्रॉक पहनी , इस का आकार कुछ और छोटा था। चूंकि देवयानी 16 की हो चुकी थी उसके स्तन अर्थात मम्मे दिव्य दर्शन दे रहे थे। फ्रॉक इतनी छोटी थी कि उसमें से भीतर की पेंटी भी दिख रही थी।उससे कहा गया कि अगले दृश्य में उसे बिकीनी भी पहननी है तो उसने कह वो पहन लेगी। इन कपड़ों में जब वो जलविहार को जा ही रही थी कि उसे डाइरेक्टर जनरल का संदेश मिला कि जर्मनी की एक फिल्म टीम उसे डाइरेक्टर के दफ्तर में बुला रही है। जब वह इन कपड़ों में पहुंची तो सबकी आँखें उसके नाजुक अंगों पर ठहर गई। तीन पुरुष ‘जर्मन फिल्म प्रमोशन प्राइवेट ‘ से थे। उनमें से एक ने उसे अपनी गोद में बैठा लिया। यह मर्द निकर में ही था और दो दूसरे भी हाफ पेंट में। डाइरेक्टर-जनरल भीमराज ने कहा ‘ लड़की टेलेंटेड है, और एडल्ट रोल कर सकती है ‘। देवयानी को अजीब लगा कि ये कैसे फिल्म वाले है कि लड़की को, वो भी अर्ध नग्न को गोद में बैठा लेते हैं मगर उसने कुछ कहा नहीं क्योंकि ये उसके केरियर का सवाल था। डाइरेक्टर-जनरल ने उसके गालों पर हाथ फेर कर पूछा — ” बेटी, तुम एडल्ट रोल कर लोगी ;; तो वह बोली — ‘अगर मुझे वो रोल समझा दो तो कर लूँगी ।’ इस पर दूसरा बड़ा जर्मन महापुरुष बोला –‘ मेरे खयाल से, इसे समझाना क्या, दिखा ही देते हैं, मेरा खयाल है ये कर लेगी।’ फिर उसे एक दूसरे कमरे में ले गए जहां 7 लड़कियां थी और सातों ही नंगी, वे एक-दूसरे पर उछल-कूद कर रही थीं और उन्हें कुछ भी शरम न थी।  अब बेटी, तुम भी नंगी हो जाओ , चटाचट ! तो देवयानी ने कहा ‘वो नंगी नहीं होगी ‘, अगर होगी भी तो पापा के कहने पर ही। इस लिए उसके पापा आकाश पादुकोण को बुलाया। एक वकील भी वहाँ आ गया व एक और महिला वकील भी। डाइरेक्टर जनरल के हाथ में करार का लीगल दस्तावेज़ था; उसने आकाश से कहा – – कहानी के एक दृश्य में तुम्हारी लड़की को पूरी नंगी होना है और ये कह रही है नंगी नहीं होऊँगी, पापा कहेंगे तो होऊंगी , अब या तो तू इसे समझा ले या जेल और जुर्माने के लिए तैयार हो जा, हमने पुलिस बुला ली है और कल अदालत में तुम पर मुकदमा चलेगा, जमानत नहीं हो सकेगी। समझा अपनी लौंडिया को। ‘ आकाश धन के लालच में बुरी तरह फंस चुका था । वह घबराते हुए बोला– ‘ बेटी को मैं खुद अपने हाथों से नंगी करूंगा , ये कैसे नंगी नही होगी ?’ जरमनी वाला बोला– तो ठीक है, कर इसे नंगी और बैठा इसे मेरे लौड़े पर ! यह कह उसने अपने निकर की ज़िप खोल नंगा लौड़ा बाहर निकाला। अब बाप ने खुद अपनी बिटिया रानी को नंगी किया और जब वह जर्मन महापुरुष के लंड पर उसे बैठा ही रहा था, दूसरा महापुरुष कूद कर आ गया और बोला कि कहानी की जरूरत के अनुसार इस फिल्म में तुम्हारी छोकरी की चुदाई होगी, आगे से और पीछे से। ‘ अब देवयानी अपनी आँखों को अपने हाथों से ढक कर नंगी खड़ी थी और तीनों महापुरुष बारी-बारी इस छोकरी को आगे से व पीछे से चोद रहे थे।

इस वाकये से नैतिक शिक्षा ये मिलती है कि धन का लालच नहीं करना चाहिए और अगर फिल्म लाइन का कोई करार करना है तो अपने वकील को दिखा कर और पूरी समझदारी व होशियारी से करें। धन्यवाद!

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