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नंगी लाइन फिल्म प्रॉडक्शन ( 1 )

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धर्मकन्या विद्यालय अनाथ लड़कियों का स्कूल था। इसे प्रिंसिपल बेलारानी भोसले चलाती थी। विद्यालय में सात से तेरह बरस की कन्याएँ पढ़ा करतीं। यह विद्यालय हाल ही में शुरू किया गया था और इसमें धन की कमी थी। स्कूल में ज्यादा बच्चियाँ नहीं थी क्योंकि यह एक विशेष प्रकार का स्कूल था, इसलिए इसमें मुश्किल से 40 कन्याएँ थीं। इनकी शिक्षा और देखभाल के लिए एक संचालन समिति भी थी जिसमें कुल पाँच लोग थे: तीन अधेड़ पुरुष और दो अधेड़ स्त्रियाँ। जिस कस्बे में और जिस मुहल्ले में यह था उसकी दशा अच्छी नहीं थी। कस्बे में जवान टीन-एजर लड़कियों के उत्पाती लड़कों से सेक्स संबंध चलते थे जिससे लड़कियों को अनचाहा गर्भ रह जाता। बहुतकर यह गर्भ गिरा दिया जाता पर कुछ मामलों में संतान हो जाती। ऐसी संतान को अनाथ शिशुशाला में ही शरण मिलती। इसके अलावा जिस मुहल्ले में धर्मकन्या विद्यालय था उसमें खुली वैश्यावृत्ति का भी एक अड्डा था।। मुहल्ले में एक ओर यह विद्यालय था तो दूसरी ओर ‘ सनातंनधर्म महाविद्यालय अर्थात लड़कों का कॉलेज। इस कॉलेज में सहशिक्षा अर्थात लड़के-लड़कियों की साथ-साथ पढ़ाई होती थी। कॉलेज के ज़्यादातर लड़के दुष्ट प्रवृत्ति के थे। कॉलेज में पढ़ा रहे प्राध्यापक और आचार्य भी शरीफ नहीं बल्कि गलत रुचि के थे। दुर्भाग्य से इसी मुहल्ले में ‘कामाख्या मंदिर’ नाम से एक मंदिर भी था जहां देवदासी प्रथा जीवित थी। मंदिर में बहुत कमसिन लड़कों को देवदास और कमसिन लड़कियों को नित्य सुमंगली देवदासी बनाकर लाया जाता और भगवान को भोग चढ़ाने के नाम पर पुजारी महाराज नित्य उनसे संभोग करते।

ऐसे वातावरण में धर्मकन्या विद्यालय की स्थापना और उसका संचालन मेरे लिए रहस्य बन गया था। मैंने कन्या विद्यालय की विस्तृत जानकारी लेनी चाही तो पता लगा कि वहाँ शिक्षण देनेवाली 11 टीचर में से किसी का भी चरित्र सही नहीं है। फिर भी ऊपरी तौर पर यह नहीं लग रहा था कि वहाँ व्यभिचार चल रहा हो। हाँ, यह जरूर था कि विद्यालय को धन की कमी बुरी तरह से अखर रही थी। कस्बे में तीन सिनेमाघर थे जिनमें स्टंट, मारधाड़ वाली फिल्मों से लेकर रोमांटिक व अश्लील फिल्में भी दिखाई जाती। इनमें से एक सिनेमाघर कन्या विद्यालय के ठीक पिछवाड़े था।

कस्बा काफी बड़ा था इसलिए उसमें एक होटल भी था जो रेलवे स्टेशन व बस अड्डे के ठीक बीच में आया हुआ था। कस्बे से तीन किलोमीटर दूर एक अभयारण्य, व पुराना किला था जहां घुमक्कड़ आया करते व इस होटल को आबाद करते। होटल में ज़्यादातर बाहरी सैलानी ही ठहरते, धन्ना सेठ, युवा खिलाड़ी, भ्रष्ट राजनेता, वगेरह। होटल में दारू ( मदिरा, शराब ) पानी की तरह बहती, और सुना तो यह भी है कि यहाँ उम्दा कॉलगर्ल्स भी वाजिब रेट पर मिल जाती।

एक दिन यहाँ से प्रकाशित दैनिक पत्र ‘खुशहाल टाइम्स’ में एक विज्ञापन छपा: ” एक साफ-सुथरी फिल्म में काम करने के लिए अच्छी लड़कियों की जरूरत है; स्कूल गर्ल्स को प्राथमिकता। संपर्क करें: होटल अलंकार, कमरा नंबर 333 ( मधुर-माधुरी फिल्म्स प्रॉडक्शन कंपनी )। ”

यह विज्ञापन धर्मकन्या विद्यालय की प्रिंसिपल बेलारानी भोसले की नजर में नाचने लगा। उसे इस विज्ञापन में ” सार ” नजर आया। भोसले ने तुरंत अपनी सहायक शिक्षिकाओं की बैठक ली और तय हुआ कि अगर कोई फिल्म कंपनी यहाँ आई है तो विशेष उद्देश्य होगा। जो भी हो विद्यालय के लिए धन कमाने का यह सुनहरा अवसर था। बेलारानी ने तुरंत होटल फोन किया, जहां से उत्तर मिला कि वो होटल आकर प्रोड्यूसर चिम्मन भाई शाह से बात कर लें। चिम्मनभाई शाह सामाजिक फिल्में बनाया करते जिनमें गूढ शिक्षा रहती।

बेलारानी भोसले और दो शिक्षिकाएँ — कोकिला किशोरी तथा माधुरी दीक्षित — होटल पहुंची। फिल्म की प्रॉडक्शन टीम के पाँच महापुरुष व एक महिला एक बड़े कमरे में कई विशाल सोफ़ों पर सवार थे। स्वागत खुद चिम्मनभाई ने किया, वो ही प्रोड्यूसर, मालिक व धन लगाने वाले महारथी थे। उनके साथ निर्देशक सुखभोग प्रसाद, केमेरामेन रतलाम अली, कहानी लेखक कोकरति दास,, गीतकार धींगमल धचक, व सहायक निदेशिका भास्वती भोसले थीं। बेलारानी एक भद्र और सुलझी हुई कामुक महिला थी। वह यह समझ गई कि यह कंपनी कैसी-कैसी फिल्में बनाती हैं। बेला को बस मौके से फायदा उठाने से मतलब था। वह बोली: ” हमारा यह कन्याओं का विशेष विद्यालय है। हम उन्हें विशेष शिक्षा देते हैं, विशेष शारीरिक शिक्षा जिसमें नृत्य और अभिनय कला शामिल है। हमारी शिक्षिकाएँ भी उत्तम समझदार व सेक्सी हैं, हम किसी तरह का परहेज नहीं करतीं। हमारे पास कन्याओं के फोटो एल्बम हैं। हमने मेहनत कर उनके एक-एक अंग को तराशा है। देखिये मेरे पास कुछ वीडियोज़ हैं इन कन्याओं के हुनर के। ”

निर्देशक बोले: ” यह खुशी की बात है कि आपने हमारे भीतर की सही बात सही ढंग से पकड़ ली है। क्या आपके पास अपनी धर्मकन्याओं के फोटोज हैं?? ” इस पर बेलारानी ने एक एल्बम निकाला जिसमें सभी 40 बालिकाओं की खिली-खिली तस्वीरें थीं। क्रमानुसार ये तस्वीरें बालिकाओं के चेहरे, वक्षस्थल, पेट व नाभि, जांघें और नितंबों की थीं। एल्बम में इन सब छोरियों के बदन के पूरे नाप थे। फिर निर्देशक सुखभोग प्रसाद ने कन्याओं के वीडियोज़ भी देखने चाहे। बेला रानी ने जब वे दिखाये तो निर्देशक का अंग-अंग फड़क उठा। बेला रानी ने हँसते हुए कुछ अच्छी छोरियों के स्लाइड्स जब दिखाये तो निर्देशक सन्न रह गया। इन स्लाइड्स में हर अच्छी लड़की की नंगी चूत और कड़क नंगी गांड साफ-साफ और खुलकर नजर आ रही थीं। कन्याओं की अलग-अलग चूतों का नजारा जबर्दस्त था। निर्देशक ने बेला रानी से कहा, ” आप तो सच्ची में महान कलाकार हैं; अगर आप खुलकर हमारे साथ सहयोग करें तो हम आपकी लड़कियों को इंद्र की परियाँ बना दें, और आपके स्कूल को सेक्स का स्वर्ग। ” यह कह कर उसने प्रोड्यूसर चिम्मनभाई शाह को फोन किया, वे थोड़ी देर में आ गए। शाह जी ने जब 11 कन्याओं की चूतों के स्लाइड देखे तो भौंचक रह गए। निर्देशक ने कहा, बेला रानी आपसे तन-मन से सहयोग करना चाहती है पर धन से नहीं। शाह जी ने तब बेलारानी से अलग से बातचीत की। तय हुआ कि दोनों मिलकर नंगी लाइन की फिल्में बनाएँगे और दूसरी नंगी कलाओं को ऊंचा उठाएंगे। आमदनी का 65% स्कूल को दिया जाएगा। इस पर बेला ने अपनी संगिनी दो शिक्षिकाओं कोकिला किशोरी और माधुरी दीक्षित को भी बुला लिया। तय हुआ कि इस शहर से दूर एक फार्महाउस में एक बड़ा बंगला बनेगा जिसमें दफ्तर व स्कूल शिक्षकाओं के रहने व मौज करने के लिए आलीशान बंगले होंगे। निर्देशक ने कोकिला किशोरी को बताया कि इस तरह का रिवाज जापान देश में बहुत प्रचलित है; वहाँ स्कूली लड़कियां रोज अच्छा कमा लेती हैं; स्कूल की पढ़ाई के अलावा वो और-और तरह की भी गुप्त पढ़ाई करती हैं। उनकी कला को कोई ताड़ नहीं सकता; बहुत मासूम होती हैं वे। ”

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सेठ ने तत्काल 11 लाख रुपये बेला जी को दे दिये और तय किया कि उनके धर्मकन्या विद्यालय की 40 स्कूलगर्ल्स व 11 शिक्षिकाओं की कला का वे खुद जायजा लेंगे। शाह ने कोकिला किशोरी को रात भर अपने बंगले में रुकने को भी कहा। कोकिला मधुरता से मुस्कराई और शाह जी की जांघ से चिपक कर बैठ गई। बेला रानी व माधुरी दीक्षित वहाँ से रवाना हुई।

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कुछ वक्त लगा पर तीसरे दिन बेला रानी भोसले चिम्मनभाई शाह से मिलने उनके प्राइवेटबंगले में पहुंची। एकदम सुबह सात बजे। उसने शाहजी को कहा, ” सारा माल तैयार है ” । तय हुआ कि सबका जायजा सुनसान फ़ार्महाउस में ही लिया जाएगा। पहले दिन 11 शिक्षिकाओं का व दूसरे दिन 40 स्कूलगर्ल्स का। दिन के ठीक 11 बजे बेला रानी व कोकिला किशोरी समेत 11 शिक्षिकाओं का दल सुनसान फ़ार्महाउस पहुंचा। बेला रानी ( 38 वर्ष ) को छोड़ सबकी उम्र 21 और 27 वर्ष के बीच थी और, जी हाँ, सबकी सब सेक्सी व उम्दा थीं। कोकिला किशोरी तो रात भर शाहजी के निजी रिहायशी बंगले में रुकी भी थी सो वो शाहजी की तबीयत को जानती थी।

इस मीटिंग में शाहजी ने अपनी फिल्म प्रॉडक्शन टीम के सभी मेंबरान को बुला लिया था। एक गेस्ट समाजशास्त्री ( sociologist ) भी थे, डॉक्टर सीतारमण भट्टाचार्य ( 58 वर्ष )। सबसे पहले उन्होने लच्छेदार भाषण झाड़ा।

वे बोले: व्यभिचार आज की सबसे बड़ी आवश्यकता और कला है। पुरुष हो या स्त्री सबके अवचेतन मन में कामुक विचार रहते हैं। इसकी पूर्ति के लिए आधुनिक दुनिया में अरबों रुपये की पूंजी से एक भारी उद्योगधंधा, हेवी इंडस्ट्री चल निकली है। आज एक 13 वर्ष की बच्ची भी एक साल में मेहनत कर एक करोड़ कमा लेती है अगर उसे ठीक लाइन में चढ़ाया जाय। हम और हमारे चिम्मनभाई के मेंबरान आप को और आपकी छोकरियों को उस संसार में ले जाएंगे जहां सुख ही सुख है, जहां रोज, नित नया सेक्स का मज़ा है, जहां रुपयों की मूसलाधार वर्षा होती है। अगर आप और आपकी बालिकाएँ मेहनत कर सकती हैं तो हम गारंटी करते हैं की उनको स्वर्ग का लुत्फ मिलेगा। ”

फिर वे बोले: ” यह सब इतना आसान नहीं है, सोच लीजिए। सबके स्वास्थ्य की परीक्षा होगी, सबके स्वास्थ्य का बीमा होगा, सबके स्वास्थ्य को व्यायामशाला की प्रयोगशाला में परखा जाएगा, पोषणयुक्त आहार दिया जाएगा, सबका शरीर हृष्टपुष्ट बनाया जाएगा। सबको 24 घंटे में 10 घंटे की मेहनत करनी होगी। ”

फिर बोले: ” व्यभिचार कला में सम्पूर्ण नग्न, पूरा नंगा-नंगी होकर ही प्रवेश किया जाता है पर मैं गारंटी देता हूँ कि इसका पता सिर्फ आपको रहेगा, इसका पता आपके सिवाय कानी चिड़िया को भी नहीं लगेगा कि आप रोज-ब-रोज नंगी हो-हो क्या गुल खिला रही हैं! आपकी जिगरी सहेलियों को भी पता नहीं लगेगा, फिर मां-बाप, भाई-बहन को पता लगना तो दूर की कौड़ी है। ”

बोले: ” हम आपको ऊंचे विश्वविद्यालय व मोटी-महान इंडस्ट्री के मालिकों से धनप्राप्ति का सर्टिफिकेट दिलवाएँगे। बस आपको हमारे कहे अनुसार काम करना है। ”

उसके बाद चिम्मनभाई अपनी बेटी नूतन- रंभा को सामने लाये जो मुश्किल से 18 वर्ष की थी। बोले ” मेरी बेटी की नंगी फिल्मों को देखोगे तो आपके दिल की धड़कनें तेज हो जाएंगी। यह मेरी पुत्री ब्रह्मचर्य का पालन करती है और कला जगत की सेवा भी। क्या गलत है इसमें? ”

निर्देशक सुखभोग प्रसाद बोले: ” एक-एक दृश्य पर हम 3-घंटे मेहनत करते हैं, दृश्य जरूरत के मुताबिक अश्लील, फूहड़, और घिनौना भी बनाते हैं और बहुत ज्यादा सात्विक और धार्मिक दृश्य भी हम ही तैयार करते हैं। यह सब कुछ कहानी की जरूरत के अनुसार करना पड़ता है। ”

इस पर बेला रानी भोसले बोली: ” देखिये, हमें कला से ज्यादा लेना-देना नहीं है; हमें तो पैसा चाहिए, रुपया, बंगला, गाड़ी, विदेश यात्रा, अच्छे से अच्छे होटलों में घूमना फिरना, ये सब। हम अपने स्कूल की बालाओं को प्राइवेट शो में नंगी नचवाते हैं, एक-दो छोरी पर दो मोटे सेठ चढ़े भी हैं। यार, जब इन लड़कियों के मां-बाप तक को एतराज नहीं है तो एकेडेमिक भाषण झाड़ने की क्या जरूरत हैं??

इस पर निर्देशक सुखभोग प्रसाद ने कहा, ‘ मुझे खेद है, आपकी टोली का समय लिया। अब हम आपकी रुचि के अनुसार असली काम शुरू करते हैं।

इस पर सब 11 शिक्षिकाएँ एक कतार में खड़ी हो गईं। हरेक शिक्षिका ने चटकमटक, उत्तेजक कपड़े पहन रखे थे जैसे वे टीचर ना हो, बल्कि केबरेगर्ल हो। सबके अलग-अलग लिबास थे। स्कर्ट, मिनी-स्कर्ट, लहंगा-चोली, उत्तेजक सलवार-कुर्ती, नाभि दर्शना कसी हुई साड़ी, जीन्स, ज़िप लगी बिकिनी, और कई तरह की अद्भुत सेक्सी मसालेदार ड्रेसेज में ये थीं। 21 व 23 वर्ष की शिक्षिकाएँ ज्यादा थी, इसलिए पहले उनके अंगों का मुआयना हुआ कि वे अश्लील कामसुख कितना दे सकती हैं।

पहली शिक्षिका का नाम गंगा था।

…. क्रमशः ( 2 ) ” गंगा का गंगास्नान “

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