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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 65)

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पिछले भाग में आपलोगों ने पढ़ा कि रामलाल अपनी कहानी हमलोगों के सामने बता रहा था कि किस तरह उसने अपने छोटे भाई की पत्नी सरोज के साथ शारीरिक संबंध स्थापित किया। वह तो नासमझ था किंतु सरोज ने उसकी नासमझी का पूरा पूरा फायदा उठाया। उसने न सिर्फ रामलाल से शारीरिक संबंध स्थापित करके मां बनने का सौभाग्य प्राप्त किया बल्कि इस चक्कर में रामलाल को स्त्रियों से संभोग सुख का चस्का भी लगा दिया। जब वह गर्भवती हुई तो योनि मैथुन का आदी रामलाल की कामक्षुधा कैसे शांंत हो? तो उसका भी आनंददायक विकल्प मिल गया, गुदा मैथुन का। सरोज की गुदा मैथुन में उसे एक अलग ही आनंद प्राप्त हुआ। संकीर्ण गुदामार्ग में उसके विशाल लिंग को एक अलग तरह की तृप्ति का सुख प्राप्त हुआ। सरोज के मां बनने के बाद तो रामलाल की निकल पड़ी। कभी योनि मैथुन तो कभी गुदा मैथुन। बहुत प्रसन्न था वह। किंतु एक दिन उनके निर्बाध चलते इस अनैतिक रिश्ते का भंडाफोड़ हो गया। पकड़े गये दोनों रंगे हाथ, संभोग में लिप्त। उनकी जरा सी असावधानी, दरवाजा खुला छोड़ कर अपनी हवस मिटाने की जल्दबाजी नें रबिया के सामने उनके अनैतिक रिश्ते पर से बेपर्दा कर दिया। इस तरह अकस्मात रबिया के आगमन से स्तब्ध सरोज, लज्जा से गड़ी, भयभीत मुंह छिपा कर भागी दूसरे कमरे में। यूं तो भांडा फूटा भी तो सिर्फ रबिया के सामने, जो उनकी पड़ोसन थी, लेकिन सरोज पानी पानी हो उठी। सिर्फ लज्जित ही नहीं, भयभीत भी, कि कहीं यह बात जगजाहिर न हो जाय।

रश्मि अब भी रामलाल से चिपकी तन्मयता से उसकी कथा में खोई हुई थी। रामलाल उसके चिकने नितंब पर पर हाथ फेरता हुआ अपनी कहानी बता रहा था। अब आगे:-

“रबिया चालीस साल की भरे भरे बदन वाली सांवली विधवा औरत हमारी पड़ोसन थी, जो लोगों के घरों में चौका बर्तन का काम करती थी। दूसरों के घर चौका बर्तन का काम करके अपना और अपनी बेटी, जो सत्रह बरस की हो चुकी थी और कॉलेज में पढ़ रही थी, का पेट पाल रही थी और बेटी को पढ़ा रही थी। शायद किसी काम से आई थी। अचानक इस हालत में पकड़े जाने से मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन सरोज, वह तो घबरा ही गयी। हड़बड़ा कर अलग हो गयी और झेंपती हुई वहां से भागी। मैं वहीं अपने तनतनाए लंड के साथ खड़ा रह गया। मैं परेशान, अपने खड़े लंड की अनबुझी प्यास के साथ खड़ा रबिया को देखता रह गया। गुस्सा भी आ रहा था उसपर। औरत और वह भी रबिया जैसी भरे बदन वाली औरत, अच्छी खासी सेहत वाली, मेरे भूखे लंड के लिए बिल्कुल सही औरत, ऊपर से चुदाई के बीच में कूद पड़ने वाली औरत, मेरी समझ से, जिसे शायद भगवान ने इसी वास्ते भेजा था कि बाकी की चुदाई उसी से पूरी कर लूं, देख कर मेरा भेजा ही फिर गया था। उधर मेरे लंड को देख कर रबिया बीबी की आंखें फटी की फटी रह गयी। अपनी जगह खड़ी की खड़ी रह गयी। उसके मुंह से निकला, “हा्आ्आ्आ्आ्आ्आय अल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ला्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्ह।”

“क्या हुआ?” पूछ बैठा मैं, उसी तरह खड़े, अनबुझी आग में तपते हुए, खड़े तनतनाए लंड के साथ। मैं घूरता रह गया उसे, उसकी गोल मटोल, भरे पूरे गदराए बदन को भूखी नजरों से।

“क क क क कुछ नहीं, कुछ नहीं।” हड़बड़ा गयी वह। जैसे किसी नींद से जागी वह। वह पीछे मुड़ कर वापस जाने लगी। मैं ने लपक कर पीछे से उसे पकड़ लिया।

“जाती कहां हो रबिया बीबी?” मैं चुदास में पागल हुआ जा रहा था।

“छोड़िए मुझे भईया, ओह्ह्ह्ह्ह जंगली, छोड़िए मुझे, यह क्या कर रहे हैं?।” मेरी बांहों में छटपटाती हुई बोली वह।

“क्या कर रहा हूं? वही जो सरोज के साथ कर रहा था।”

“ओह्ह्ह्ह्ह भईया, बेशरम, छोड़िए ना।” वह साड़ी पहनी हुई थी। साड़ी के ऊपर से ही मेरा लंड उसकी बड़ी बड़ी गांड़ में घुसा चला जा रहा था। वह मेरी बाहों में कसमसा रही थी। मैं पूरी तरह नंगा था और वह पूरे कपड़े में। मैं एक हाथ से उसकी कमर को सख्ती से जकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ से उसकी ब्लाऊज से बाहर छलक पड़ते, तरबूजों जैसी बड़ी बड़ी चूचियों को दबाना शुरू कर चुका था। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, काफी बड़ी बड़ी और मुलायम चूचियां थीं उसकी। बड़ा मजा आ रहा था दबाने में, नरम बैलून की तरह। “ऐसे कैसे छोड़ दूं रबिया तुझे।”

“हाय अल्ल्ल्ल्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह, चिल्ला दूंगी मैं, आह्ह।”

“मत चिल्ला रबिया बहन। चोदने दे। मुझे अच्छा लगेगा, तुम्हें भी अच्छा लगेगा।” मैं मना रहा था उसे। उसका विरोध थोड़ा थोड़ा कम हो रहा था।

“बहन बोलते हैं और ऐसा करते हैं?” मुंंह से ही अब विरोध कर रही थी।

“बहन क्या औरत नहीं होती है?”

“मां बहनों के साथ यह सब नहीं किया जाता भाई साहब।” वह विरोध नहीं कर रही थी, उसकी सांसें तेज हो गयी थी, थोड़ी बहुत कसमसा जरूर रही थी। मुंह से ही मुझे समझाने की कोशिश कर रही थी। इधर मैं उसकी चूचियां दबाए जा रहा था। उसने ब्लाऊज के चूचकसना भी नहीं पहना था। मेरा तनतनाया हुआ लंड उसकी गांड़ में साड़ी समेत घुसा चला जा रहा था, जितना कसमसा रही थी उतना ही। मुझे ऐसा लग रहा था कि शायद उसे अब यह सब अच्छा लग रहा था।

“मां बहनें? मुझे क्या पता। सरोज को चोदने के बाद मुझे तो लगता है, हर औरत चुदने के लिए ही पैदा हुई है। चूत बनाया है भगवान ने तो चुदवाने के लिए ही ना। मुझे तो औरत से मतलब है। इस समय तो पता नहीं क्यों तुम्हें देखते ही सरोज भाग गयी, लेकिन तुम तो हो, वैसे भी तुम मेरी बहन थोड़ी न हो।” मुझे लग रहा था कि अब उसकी ओर से कोई मना नहीं था। मैं ने भी उसे ढीला छोड़ दिया था, लेकिन अब वह भागने की कोई कोशिश नहीं कर रही थी। मैंने उसकी चूचियां दबाना बंद नहीं किया, अब एक हाथ से उसकी साड़ी उठाने लगा। तुरंत ही उसकी साड़ी कमर से ऊपर उठा दिया। साड़ी साया के अंदर उसने कुछ नहीं पहना था। बाप रे बाप, इतनी मोटी मोटी गोल गोल गांड़, देखकर तो मेरे मुंह में पानी आ गया।

“हाय दैया, यह यह क्या कर रहे हैं? मानिएगा नहीं?” वह अब ढीली पड़ गयी थी। सिर्फ उसकी आवाज में थोड़ी शरम और डर थी।

“नहीं। चोदे बिना तो मानूंगा नहीं। तुम्हारी डर से सरोज चुदाई के बीच में ही भाग गयी। अब तुम ही बताओ, इस खड़े लंड का क्या करूं?” मैं अब उसकी गांड़ सहलाने दबाने लगा।

“उफ्फ्फ्फ्फ्फ आ्आ्आ्आ्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह, यह ककककक्या्आ्आ्आ्आ्आ कर रहे हैं आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह?” उसकी आंखें बंद हो गयी थीं और उसका सिर मेरी छाती पर टिक गया था। मैं समझ गया कि अब मैं उसे चोद सकूंगा। मैंने उसे अपनी ओर घुमा दिया। अब उसका चेहरा लाल हो चुका था। मैं उसके चेहरे को चूमने लगा। उसके ब्लाऊज को खोल दिया। बाप रे बाप, थलथला कर उसकी चूचियां सामने छलक उठी थी। मैं तो पागल ही हो गया। मैं अपने को रोक धहीं पाया और उसकी चूचियों को बारी बारी से चूसने लगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह,” उसके मुंह से सिसकारियां निकलने लगी। मैं और देर करना नहीं चाहता था। उसकी साड़ी को उठाए उठाए ही वहीं जमीन पर लिटा कर चोदने के लिए तैयार हो गया। ओह भगवान, उसकी चूत देख कर तो मैं अकचका गया। इतनी बड़ी, भैंस जैसी फूली हुई काली काली चूत और उसके ऊपर घुंघराले बाल भरे हुए थे। मस्त, बिल्कुल मेरे लंड के लिए ही बनी थी उसकी चूत। तभी उसने अपनी आंखें खोली और इतने सामने से मेरा लंड देख कर घबरा ही गयी।

“नहींईंईंईंईंईंईंई, बाप रे बाप, इतना बड़ा लौड़ा्आ्आ्आ्आ।” घबराहट म़े उसके मुंह से निकला।

“नहीं क्या? क्या नहीं? अब और काहे नहीं?”

“हाय, इतना बड़ा्आ्आ्आ्आ लौड़ा्आ्आ्आ्आ। मर जाऊंगी मैं। फाड़ दीजिएगा आप तो या खुदा, रहम।” अब वह सचमुच में घबराई हुई थी। इस अंतिम क्षण में, जब मैं उसकी रसीली चूत पर हमला बोलने के बिल्कुल नजदीक था, यह सुनकर झल्ला उठा।

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“चुप हरामजादी, चुपचाप चोदने दे। तब से नखरे किए जा रही है। एक तो सरोज की चुदाई के बीच में बाधा बन कर आई और अब मेरे लंड को तरसाए जा रही है।” मैं कड़क कर बोला और उसकी मोटी मोटी जांघों को फैला कर अपना लंड उसकी चूत में सटाने लगा।

“ओह्ह्ह्ह्ह भैय्या, रहम कीजिए।”

“रहम ही तो कर रहा हूं, नहीं तो अबतक जबर्दस्ती चोद चुका होता।”

“उफ्फ्फ्फ्फ्फ अम्मी, ओह्ह्ह्ह्ह।” वह मरी सी आवाज में बोली, लेकिन उसकी चूत चुगली कर रही थी, चुदने को तैयार, पानी पानी हो चुकी थी।

“चल तैयार, ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह हुम्म्म्म्म्म्म।” भच्च से मैंने अपना लंड उसकी चूत में एक ही बार में सरसरा कर उतार दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह, मा्आ्आ्आ्आ्आर डा्आ्आ्आ्आला्आ्आ् अब्ब्ब्बू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ।” दर्द से तड़प उठी वह। लेकिन अब मैं कहाँ रुकने वाला था। गरमागरम चूत का स्वाद जो मिल गया था मेरे लंड को। बड़ी आराम से घुसा था मेरा लंड, लेकिन पता नहीं क्यों वह चीख उठी थी। उसकी चीख सुनकर सरोज भी दौड़ी चली आई। उसे देख कर रबिया रोते हुए बोली, “सरोज, बचा मुझे इस जानवर से ओह्ह्ह्ह्ह, मुझे मार डालेगा।”

सरोज क्या बोलती, उल्टे खुश हो कर बोली, “वाह जेठ जी, ठीक पकड़े हैं। चोद डालिए इसे भी, वरना यह हमारी पोल खोल कर रख देगी। रबिया दीदी, अब चुद भी जाईए, पूरा लंड तो घुस ही गया। वाह, कमाल कर बैठी आप तो। इतने बड़े लंड को अपनी चूत में खा लेने के बाद अब मजा लीजिए ना। रोने से क्या फायदा।”

“अरी कुतिया, इनका घोड़े जैसा लौड़ा मेरी कोख तक घुस गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह है। उफ्फ्फ्फ्फ्फ। दर्द से मरी जा रही हूं मैं और तू मजा लेने की बात कर रही है।” तड़प कर रबिया बोली। उनकी बातों की परवाह किए बगैर मैं अब उसकी चूतड़ के नीचे हाथ लगा कर गचागच चोदने लगा। थोड़ी ढीली हो गयी चूत उसकी और चीखना चिल्लाना उसका कम होने लगा। फच फच फच फच की आवाज निकलने लगी उसकी चूत से।

“ओह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह, आह्ह, आह हाय हाय,” बोलती बोलती चुदते चुदते कुछ ही मिनटों में उसकी बोली में परिवर्तन होने लगा। अब वह, “आह आह आह आह ओह ओह ओह इस्स्स्स्स्स्स्स इस्स्स्स्स्स्स्स,” की आवाज निकालने लगी और उसकी कमर अपने आप ऊपर की ओर उछल रही थी और गपागप मेरे उसी लंड को अपनी चूत में ले रही थी जिसे देखकर उसकी हवा गुम हो गयी थी और पहली बार चूत में घुसते समय चीख चिल्ला रही थी।

“अब आ रहा है न मजा, ओह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह, ले ले ले और ले आह्ह ओह,” मैं जोश में आ कर चोदे जा रहा था और वह मोटी भैंस रबिया, अपनी टांग मेरी कमर पर चढ़ा कर बड़ी मस्ती से चुदवा रही थी।

“आह्ह भैया, ओह्ह्ह्ह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, उफ्फ्फ्फ्फ्फ अम्म्ई्ई्ई्ई्ई, ओह्ह्ह्ह्ह अब्ब्ब्बू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ, चोदिए भैय्या चोदिए, बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा्आ्आ्आ्आ आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह आ्आ्आ्आ रहा है्ऐ्ऐ्ऐ्ऐ।”

“अहा, अब आया मजा न दीदी, जेठजी का लंड लेने का मजा आ रहा है न। जेठ जी, अच्छी तरह से चोदिएगा इसे, ताकि आपके लंड की दीवानी बन जाए, हमारी पोल नहीं खोलेगी कभी जिंदगी में।” सरोज हमें आनंद से चुदाई करते हुए देख कर उत्साहित हो कर बोली। कुछ देर पहले जो पोल खुलने के डर से मुंह छिपा रही थी, खुशी के मारे खिल उठी थी।

“डरपोक कहीं की, मेरे लंड को प्यासा छोड़कर भागी थी, अब बड़ी हिम्मत दिखा रही है लंडखोर। आ, तू भी आ जा। रबिया बहना को चोदने के बाद तुझे भी चोदता हूं।” कहकर दनादन चोदने में जुट गया।

उसी समय रबिया मुझसे चिपक कर, “इस्स्स्स्स्स्स्स अम्म्म्म्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ,” कहते हुए ढीली पड़ने लगी। मिनट भर बाद ही वह सचमुच पूरी तरह ढीली पड़ गयी और लंबी लंबी सांसें लेने लगी। मैंने उसे वहीं जमीन पर छोड़ा और कूदकर सरोज को पकड़ लिया जो वहां खड़ी हमारी चुदाई देखने में खोई हुई थी। बिना कोई समय गंवाए, इससे पहले कि सरोज संभल पाती, मैंने उसकी साड़ी उठाई और वहीं बावर्ची खाने के स्लैब पर झुका कर पीछे से उसकी चूत में एक ही बार में लंड घुसेड़ दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह,” बस यही बोल पायी वह, इसके बाद मैंने उसकी चूत की जो चुदाई की कि वह हाय हाय कर उठी। करीब पंद्रह मिनट बाद मैंने उसे कस के दबोच कर अपने लंड का पानी छोड़ने लगा और तभी, ओह्ह्ह्ह्ह मैं झड़ी्ई्ई्ई्ई्ई झड़ गयी्ई्ई्ई्ई्ई रे अम्म्म्म्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह,” कहते हुए वह भी निढाल हो गयी।

“उफ्फ्फ्फ्फ्फ राजा, आप तो बड़े जबरदस्त चुदक्कड़ हैं भैया। पांच साल पहले शहला के अब्बू के इंतकाल के बाद से चुदने को बेकरार रहती थी, और कहती भी तो किससे, आज वह मौका मिला भी तो इतने जबरदस्त मर्द से। शहला के अब्बू का लौड़ा तो सिर्फ पांच इंच लंबा था। आपका तो बाप रे बाप, एक फुट का गधे जैसा। रुला ही दिया था पहली बार घुसा तो।” बड़ी खुशी झलक रही थी उसकी बोली में।

“हट, झूठी। रुला ही दिया था? तुझ मोटी को? तू तो घोड़े का लंड भी ले सकती है।” सरोज बोली।

“मोटी हुई तो क्या हुआ, पहली बार इतने बड़े लौड़े से चुदवाना मजाक है क्या?” रबिया बोली। मैं बड़ा खुश था। पहले सिर्फ सरोज थी जिसे चोदकर मैं संतुष्ट था। अब मुझे दो दो औरतों की चूत चोदने का मौका मिला तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। खासकर रबिया को चोदने का मजा तो कुछ और ही था। उसकी गांड़ इतनी बड़ी थी कि पीछे से उसे देखकर ही मेरा लंड दन से खड़ा हो जाता था। गांड़ चोदना तो सरोज से सीख ही चुका था। रबिया की गांड़ चोदने का मजा ही कुछ और था। पहली बार जब मैं उसकी गांड़ चोदना चाहा तो साफ मना कर दी। लेकिन मैंने जबरदस्ती उसे पटक कर उसकी गांड़ चोद ही ली। बड़ी टाईट थी। बड़ी मुश्किल से घुसा था मेरा लंड। खूब रोने चिल्लाने लगी थी, लेकिन फिर उसे जब मजा मिलने लगा तो मजे से गांड़ चुदवाने लगी। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, बता नहीं सकता कितना मजा आया। उतनी बड़ी गांड़ आज तक मैंने नहीं देखी। दो गोल गोल, बड़े बड़े तरबूजों के बीच की फांक हो जैसे, उन्हें दबोच दबोच कर चोदने का मजा ही कुछ और मिला मुझे। जब मैं उसकी गांड़ चोद कर लंड बाहर निकाला तो देखा, मेरे लंड पर पीला पीला मल लिथड़ा हुआ था। रबिया तो बड़ी मुश्किल से किसी प्रकार उठकर सीधे पैखाने में घुस गयी और भर्र भर्र करके हगने लगी।

कुछ देर बाद पैखाने से निकली और बोली, “बा्आ्आ्आ्आप रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आप, मेरी गांड़ खोल कर रख दी आपने तो। पूरा पेट खाली हो गया।” फिर मेरे लंड को देख कर मुझे खींचते हुए नल के पास ले गयी और बड़े प्यार से लंड धोने लगी। उस दिन के बाद अब तो इनकार नहीं करती है गांड़ चुदवाने के लिए। प्रायः मैं उसके घर चला जाता हूं जब चोदने की इच्छा होती है और कभी कभी वह खुद चली आती है किसी न किसी बहाने चुदवाने के लिए। सब कुछ बड़े मजे से चल रहा था लेकिन एक दिन एक गड़बड़ हो गयी।”

“क्या गड़बड़?” मैं तुरंत बोली। बड़ी उत्तेजक कहानी के बीच में यह विराम खल गया मुझे।

“हां हां, जल्दी बोलिए ना।” रश्मि भी रामलाल के नंगे जिस्म से चिपकी उतावली से बोल उठी। रामलाल का हाथ अब भी रश्मि के नितंबों पर अठखेलियाँ कर रहा था।

“एक दिन जब मैं रबिया बीबी को उसके घर में चोद रहा था तो अचानक न जाने कैसे उसकी बेटी शहला आ पहुंची। शायद उसकी छुट्टी जल्दी हो गयी थी। रबिया तो घबरा गयी। गनीमत थी कि मैं सिर्फ उसकी साड़ी उठा कर चोद रहा था। जल्दी से उठ गयी, साड़ी ठीक की और मुझे अलमारी के पीछे छिपा कर दरवाजा खोलने चली गयी, यह कहते हुए कि वहीं छिपा रहूं, जबतक कि वह मुझे भागने का इशारा न करे। हड़बड़ी में हमने ध्यान नहीं दिया कि मेरे कपड़े वहीं बिस्तर पर पड़े थे। मैं अलमारी के पीछे नंगा ही छिपा हुआ था।” इतना कहकर वह फिर रुक गया।

“आगे?” उतावली से रश्मि बोली।

“अब आगे तेरी गांड़ चोदने के बाद।” रामलाल रश्मि को चूमकर पलटते हुए बोला।

“नहीं, गांड़ नहीं।” रश्मि घबरा गयी।

“तो जाओ, नहीं बताता। कहानी बताते बताते मेरा लंड आपकी गांड़ चोदने को तड़प उठा है। देखिए।” उसने अपने मूसल लंड पर रश्मि का हाथ रखते हुए बोला।

“हाय नहीं, प्लीज नहीं। फाड़ दीजिएगा आप।” रश्मि उसके बंधन से आजाद होने की कोशिश करने लगी। लेकिन रामलाल जैसे शक्तिशाली पुरुष के आगे वह कर भी क्या सकती थी। फड़फड़ा कर रह गयी।

“इतनी मस्त गांड़ पर तब से हाथ फेर रहा हूं, तब तक खुश थी। अब चोदने की बात पर नहीं? ऐसा कैसे होगा?” रामलाल गांड़ चोदने पर उतारू था और रश्मि राजी ही नहीं हो रही थी। इधर हम भी उत्तेजित, या तो रामलाल की आगे की कहानी, या एक दौर और चुदाई का।

“चोदिए रामलाल जी चोदिए। जल्दी चोदिए साली की गांड़ और इधर हम भी एक दौर चुदाई का चला लेते हैं। फिर कहानी बताते रहिएगा।” मैं उत्तेजना के आवेग में बोली, इस बात से बेखबर कि हरिया और करीम के मन में क्या चल रहा था।

आगे की कथा अगले भाग में। तबतक के लिए इस कामुक लेखिका को आज्ञा दीजिए।

रजनी

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