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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 44)

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पिछले भाग में आप लोगों ने पढ़ा कि मैं किस तरह अपने नादान पुत्र की नादानी भरी आसक्ति के सम्मुख नतमस्तक हो गयी। मुझ पर उसकी आसक्ति धीरे धीरे मेरे नारी शरीर के आकर्षण में बदल गई। इस आकर्षण ने उत्कंठा को जन्म दिया। उसकी उत्कंठा ने उसे उकसाया कुछ और, कुछ और मुझमें तलाशने के लिए, कुछ और खुशी, कुछ और आनंद पाने की लालसा में उसके नादान प्रयासों ने मुझे मजबूर किया अपनी नारी देह को उसके आगे समर्पण के लिए। समाज की नजरों में यह एक अति निकृष्ट, घृणित कार्य था, किंतु उन सबसे बेपरवाह हम मां बेटे बह गए ऐसे वासना के सैलाब में, जहां से निकलना हमारे लिए कठिन ही नहीं नामुमकिन था। स्त्री शरीर के साथ मैथुन का वह प्रथम अनुभव उसके लिए स्वर्गीय आनंद से कम नहीं था। खुशी के मारे वह तो पागल ही हो गया था मुझसे शारीरिक संबंध का सुख पाकर। मैं कितनी भी गई गुजरी छिनाल हूं, किंतु अपने खुद के पुत्र के साथ संभोग की कल्पना भी कभी मेरे जेहन में नहीं आया था। लेकिन परिस्थितियों नें कुछ ऐसा मोड़ लिया कि मैं उसके सम्मुख पसरने को बेबस हो गयी थी। वासना की आग में धधकती मुझ जैसी छिनाल के नाजुक अंगों के साथ उस नादान बच्चे की हरकतों ने मानो आग में घी का काम किया और मैं अपने को रोक नहीं पाई और नतीजा हम मां बेटे के बीच इस अंतरंग संबंध का जन्म। एक बार जब हम फिसले तो फिर हमने पीछे मुड़ कर देखने की जहमत भी नहीं की और सारी मर्यादाओं को तोड़ कर बेखौफ फिसलते ही चले गये। सिर्फ एक ही रात में हमारे बीच के संबंध में सबकुछ बदल गया था। वह तो बेचारा नादान था, लेकिन मैं एक पूर्ण व्यस्क स्त्री होते हूए भी सबकुछ समझते बूझते रिश्ते को शर्मसार करने में कहां पीछे रही। डूबती गयी, उस गंदे खेल के आनंद में।

रात भर हमारे बीच वासना का जो नंगा नाच हुआ, उसकी खुमारी अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि दिन के उजाले में भी क्षितिज के कमरे में हमने फिर उसी कुकृत्य को दुहराया। काफी देर तक मेरे दरवाजे को भड़भड़ाने से मेरी निद्रा भंग हुई। मैंने देखा एक बज रहा था। हड़बड़ा कर उठी और दरवाजा खोला तो दरवाजे पर चिंतित मुद्रा में हरिया को पाया। “तबीयत कैसी है तुम्हारी अब?”

“ठीक हूं।” संक्षिप्त सा जवाब दिया मैंने।

“फिर ठीक है, आ जाओ खाने की मेज पर, खाना तैयार है”

“ठीक है, आती हूं”, कहकर मैं खाने की मेज पर आ गई। अभी तक थकान पूरी तरह उतरी नहीं थी, किंतु मैं सामान्य होने की कोशिश कर रही थी। जब मैं डाईनिंग हॉल में पहुंची तो देखा, क्षितिज पहले से वहां मौजूद था।

“कैसी है तबीयत मॉम?” अपनी मुस्कुराहट छिपाते हुए पूछा क्षितिज।

“ठीक हूं अब” संक्षिप्त सा उत्तर था मेरा। बनावटी रोष के साथ मैं घूर कर उसे देखी। मन ही मन बोल रही थी, “साले मादरचोद, चोद चोद कर बेहाल कर दिया, अब पूछ रहे हो कैसी हो, मां के लौड़े।” जल्दी जल्दी खाना खा कर उठते हुए बोली, “खाना खा कर थोड़ा आराम कर ले, फिर शाम को शॉपिंग चलना है ना।”

“ठीक है मॉम” कहकर वह खाना खाने लगा। मैं डाईनिंग टेबल से अपने कमरे की ओर जाने लगी तो ऐसा लग रहा था कि क्षितिज की नजरें मुझ पर ही टिकी हों। पलट कर देखी तो पाया कि वह मुझे ही घूरे जा रहा था, उसकी भेदती नजरों से ऐसा लग रहा था मानो मेरे शरीर पर अभी भी कोई वस्त्र नहीं हों। लरज कर रह गई मैं। कमीना कहीं का। अपने कमरे में आ कर धम्म से बिस्तर पर गिरी और नींद के आगोश में चली गई।

शाम को पांच बजे हम मां बेटे बाजार की ओर चल पड़े। जहां क्षितिज फॉर्मल ड्रेस में था, नीली जींस और काले टी शर्ट में वहीं मैं आसमानी रंग की सलवार कमीज पहने थी। काफी फ्रेश और तरोताजा दिख रहे थे हम दोनों। कार मैं ही चला रही थी। क्षितिज मेरे बगल में बैठा शैतानी कर रहा था। अपने दायें हाथ से बार बार मेरी बांयी जांघ पर हाथ फेरता जा रहा था। पूरे रास्ते मैं उसके हाथ को झटकती हुई झिड़कती रही। “हाथ संभालो अपना शैतान, मारूंगी हां।”

“हां, वो तो देख लिया कितना मारती हो। इतने प्यार से मारोगी तो मर ही जाऊंगा मेरी जान।”

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“हट बदमाश।”

“हाय मॉम, तेरी इसी अदा पर तो मरता हूं।” मैं समझ गयी कि इसे कुछ कहना बेकार है। चुपचाप कार चलाती रही और वह मेरी जांघ सहलाता रहा। बाजार पहुंच कर शॉपिंग किया, कुछ नये कपड़े वगैरह लिए फिर हम आईलेक्स में मूवी देखने घुसे। सीट हमें सबसे पीछे से सामने वाली कतार में दाहिने किनारे की मिली थी। मैं दायीं ओर और क्षितिज बांई ओर बैठा था। फिल्म थी “मर्डर”। हालांकि मुझे थ्रिलर फिल्में पसंद नहीं थीं लेकिन क्षितिज की जिद के कारण मैं तैयार हो गयी। वैसे तो यह रहस्य रोमांच से भरी फिल्म थी किंतु उसमें नायक नायिका के कुछ अंतरंग दृश्य भी थे। उन दृश्यों के आते ही क्षितिज मुझसे सट जाता था और अपना दायां हाथ मेरे कंधे पर रखकर अपनी ओर खींच लेता था। एक बार तो उसने मुझे चूम ही लिया। मैं छिटक कर अलग होने की कोशिश करती थी किंतु उसकी पकड़ काफी मजबूत थी। कभी कभी उसका हाथ मेरी जांघ पर होता था और सरकता हुआ मेरी योनि की ओर बढ़ता था जिसे मैं बार बार हटाती रहती थी।

“क्या करते हो? पीछे वाले देख रहे होंगे, शैतान।”

“अरे कोई नहीं देखता है मॉम, सब फिल्म देख रहे हैं।” मेरे कानों में फुसफुसाया वह। फिल्म हम क्या देखते, पूरी फिल्म खत्म होने तक यही सब चलता रहा। फिल्म समाप्त होते होते मुझे काफी गर्म कर चुका था बदमाश। फिल्म हॉल से निकलते वक्त मुझे पीछे से आवाज सुनाई पड़ी, “साले लौंडे को तो जबरदस्त माल हाथ लगी है, हॉल में खूब मस्ती कर रहा था साला।” मैंने पीछे मुड़कर देखा, 22 – 23 साल के और करीब 25 – 26 साल के दो युवक, शक्ल सूरत, कद काठी और कपड़ों से अच्छे भले घर के दिखने वाले, लेकिन उनके होंठों पर शोहदों वाली मुस्कुराहट खेल रही थीं। मैं समझ गई कि हॉल के अंदर क्षितिज की हरकतों को इन लोगों ने देख लिया है। मैंने किसी प्रकार अपने गुस्से को नियंत्रण में रखा। क्षितिज इन सब बातों से बेखबर मुझसे आगे आगे चल रहा था। जब मैं कार का दरवाजा खोल कर अंदर घुसने ही वाली थी कि मेरे भरे पूरे नितंब पर एक हाथ पड़ा और दबा दिया किसी ने, साथ ही आवाज सुनाई पड़ी, “क्या मस्त गांड़ है मेरी जान, इस लौंडे को छोड़, चल हमारे साथ।” गुस्से का पारावार न रहा मेरा। पीछे मुड़ कर देखा तो वही दोनों खड़े अश्लील मुस्कुराहट के साथ मुझे देख रहे थे।

गुस्सा मेरा सातवें आसमान पर था, “साले कुत्तों, तुम लोगों की मां बहन नहीं है क्या घर में?” जोर से चीखते हुए बोली। मेरी आवाज सुनकर आसपास के सभी लोग हमारी ओर देखने लगे।

“क्या हुआ मॉम?” क्षितिज भी मेरी आवाज सुनकर कार से उतरकर मेरे पास आ गया।

“साले लौंडे मॉम बोलता है, हॉल में तो…..” पच्चीस छब्बीस साल वाला कद्दावर युवक क्षितिज की ओर बढ़ते हुए बोला, लेकिन उसकी बात पूरी होने से पहले ही मेरे दायें हाथ का भरपूर घूंसा उसके मुंह पर पड़ा। उसके लिए यह अप्रत्याशित था। वह लड़खड़ा कर एक कदम पीछे हो गया। उसका निचला होंठ फट गया था और खून छलक आया।

उसका दूसरा साथी जैसे ही आगे बढ़ा, क्षितिज उसे देख कर बोला, “अरे सुजीत तुम?” वह युवक चौंक कर क्षितिज को देखने लगा। लेकिन शर्मिंदा होने की जगह बेशर्मी से बोला, “साले क्षितिज बड़ा छुपा रुस्तम निकला रे तू तो। कॉलेज में तो बड़ा शरीफ बना फिरता है मादरचोद। इतनी जबरदस्त माल…..” इससे आगे वह भी बोल नहीं पाया, मेरे बांये हाथ का जन्नाटेदार झापड़ उसके बांये गाल पर पड़ा। सर घूम गया उसका, इतना जबरदस्त प्रहार हुआ था। आश्चर्य से उसकी आंखें फटी की फटी रह गयीं। अपना गाल पकड़ कर जड़ हो गया था अपने ही स्थान पर।

“कौन है यह?” मैं गुस्से से क्षितिज की ओर मुखातिब हुई।

“यह सुजीत है मॉम, एन आई टी में मेरा सीनियर।” क्षितिज घबराहट में बोला, मेरा रौद्र रूप पहली बार देख रहा था वह।

“चल भाग मां के लौंडे यहां से, वरना मार मार के हुलिया बिगाड़ दूंगी, साले लौंडीबाज हराम के जने कमीने।” मैं गुस्से से चीखी। लेकिन तबतक पहले वाला युवक संभल कर फिर मेरी ओर बढ़ा, उसका चेहरा बता रहा था कि इतने लोगों के बीच एक औरत से मार खाने की बेइज्जती से तिलमिलाया हुआ था।

“साली कुतिया, अभी बताता हूं तुझे।” वह खूंखार लहजे में बोला। क्षितिज भी आगे बढ़ा मगर मैंने उसे पीछे ढकेल दिया और उस युवक को और कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया मैंने। मेरी एक करारी लात उसके पेट पर पड़ी। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह,” कहते हुए पेट पकड़ कर दोहरा हो गया, तभी मेरे दायें घुटने का प्रहार उसके चेहरे पर हुआ, वह वहीं उलट कर धराशायी हो गया। इधर रोहित उसे उठाने के लिए बढ़ा और क्षितिज की ओर खूंखार नजरों से देखते हुए धमकी भरे अंदाज में बोला, “साली तुम्हें देख लूंगा और साले क्षितिज, तुझे तो कॉलेज में समझाऊंगा।” यह सुनकर क्षितिज आगे बढ़ा तो मैं क्षितिज को किनारे ढकेल कर राहुल के सामने गई, “क्या बोल रहा था कमीने? मुझसे बात कर साले।”

“साली रंडी तुझे तो…” उसकी बात अधूरी रह गई। मेरे दाएं हाथ का भरपूर मुक्का उसके जबड़े पर पड़ा। वह पीछे की ओर गिर पड़ा, फिर तो मैंनें उसे अपनी लातों में रख लिया और मारते मारते बेदम कर दिया।

“कमीने कुत्ते, धमकी किसी और को देना, फिर कभी तू या तेरा यह घटिया दोस्त, क्षितिज या मुझे, कोई नुकसान पहुंचाने की सोच रहे हो तो भूल जाओ, जिंदा दफन कर दूंगी। तम लोगों को पता नहीं तुम्हारा पाला किससे पड़ा है।” फुंफकारते हुए मैं बोली। फिर क्षितिज को घसीटते हुए कार के अंदर ढकेल कर कार स्टार्ट करके वहां से चल पड़ी। वहां खड़ी मूकदर्शक हिजड़ों की फौज में से न ही कोई हमें बचाने आगे आया, न ही कोई उनके समर्थन में आगे आया।

इसके आगे की घटना लेकर मैं अगली कड़ी में आऊंगी। तबतक के लिए अपनी कामुक लेखिका रजनी को आज्ञा दीजिए।

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