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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 41)

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पिछले भाग में आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह मेरा बेटा क्षितिज मेरे बिस्तर तक आया और परिस्थितियों ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि मैं निर्वस्त्र हालत में अपने कोख जाए जवान बेटे की नग्न देह से चिपकी अपने तन को पूरी तरह से समर्पित करने के कागार पर खड़ी थी। शायद भगवान नें भी इस घृणित कृत्य की ओर से अपनी नजरें दूसरी ओर फेर ली थी। क्या यह घृणित कृत्य था? समाज के बनाए नियमों के अनुसार हां। लेकिन ये नियम हम मानवों ने ही तो बनाए हैं, सिर्फ इस बात को ध्यान में रख कर कि परिवार रुपी संस्था बनी रहे। हम अपने को बौद्धिक रुप से सभी प्राणियों में श्रेष्ठ मानते हैं और यही कारण है कि हमने अपने जीने के तौर तरीकों को कायदे कानूनों की लक्ष्मण रेखा खींच कर उसके अंदर बंद कर दिया है। हमारे अंदर की स्वतंत्र सोच को क्रियान्वित करने पर अंकुश लगा रखा है। क्या हम अन्य जीवों से अलग हैं? क्या हमारी शारीरक आवश्यकताएं अन्य प्राणियों से भिन्न हैं? नहीं, कदापि नहीं। हम भी अन्य प्राणियों की तरह ही हैं। इस संसार के सभी प्राणियों की विभिन्न प्रजातियों में भगवान ने नर मादा का सृजन किया है। जबतक संतान छोटा है, तभी तक मां अपने बच्चों की देखभाल करती है। जब वही बच्चे बड़े हो जाते हैं तो बच्चा सिर्फ नर होता है और बच्ची सिर्फ मादा होती है। नर बच्चा बड़ा होकर किसी भी मादा, चाहे वह उसकी अपनी बहन या मां ही क्यों न हो, से स्वतंत्र, स्वछंद रुप से संभोग करता है और प्राकृतिक रुप से प्रजनन की प्रक्रिया को सतत जारी रखता है और उसी तरह नारी बच्ची बड़ी होकर सिर्फ एक मादा होती है, जिससे कोई भी नर, चाहे वह उसका पिता या भाई ही क्यों न हो संभोग करता है। जब सारे प्राणी ऐसा कर सकते हैं तो हम मानव क्यों नहीं। हो सकता है आप लोगों में से कई लोग इसे मेरी कामुकता भरा कुतर्क कहकर नकार दें, लेकिन जरा सोच कर देखिए कि यह सत्य नहीं है क्या? हम तथाकथित सभ्य समाज वााले, खुद को बौद्धिक रूप से सभी प्राणियों में श्रेेष्ठ समझने वाले लोग, अपने ही बनाए नियमों के बंधन में बंंध कर घुट घुट कर जीने को वाध्य। जिन्होंने थोड़ी हिम्मत दिखाई, वे ढंके छुपे तौर पर यह सब किए जा रहे हैं और जिंदगी का भरपूर लुत्फ उठा रहे हैं। खैर इन सब बातों में उलझ कर मैं अभी क्यों अपना और आपका कीमती समय क्यों बरबाद कर रही हूं।

इस वक्त तो मैं पूरी तरह अपने बेटे के चंगुल में फंस चुकी थी, जिसकी नादानी को मैंने वासना के उस फिसलन भरे गर्त में गोता खाने के लिए ढकेल चुकी थी, जहां से निकलना उसके वश की बात नहीं थी। उसे तो मानों मुहमांगी मुराद मिल चुकी थी। शेर को खून का स्वाद मिल चुका था, वह भला अब पीछे कैसे हट सकता था। दबाता चला गया दबाता चला गया तबतक, जबतक उसका पूरा का पूरा आठ इंच का लिंग मुझ रंडी की योनि चीरता हुआ जड़ तक समा नहीं गया। “ओह्ह्ह्ह्ह्ह मा्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, कककक्य्य्आ्आ्आ्आ कर दिया मेरे बेटे, उफ्फ्फ, तेरा पपलू मेरी मुनिया को चीईईईईईर्र्ररररर दिया रे, आह।” मैं बेसाख्ता बोल पड़ी।

“ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी स्वीट मॉम, आह्ह् आपकी मुनिया ने मेरे पपलू को पूरा का पूरा निगल लिया। दर्द हो रहा है क्या? होने दो मॉम अपने ब्वॉयफ्रेंड के लिए, अपने ब्वॉयफ्रेंड की खुशी के लिए, बर्दाश्त कर लो मॉम, बड़ा्आ्आ्आ्आ आनंद मिल रहा है मुझे। ओह शायद इसी की तलाश थी मुझे और मेरे पपलू को। स्वर्ग है मेरी रानी आह्ह् यही स्वर्ग है, हां यही सुख का वह खजाना है, मिल गया मुझे मिल गया।” खुशी का पारावार न रहा उसका।

“आह्ह् ओह्ह, चुप शैतान, हाय रे मेरी मुनिया” मुझे बींध कर मेरा बेटा कितना खुश था। सारी लाज शरम को तिलांजलि दे कर मैं कूद पड़ने को तत्पर हो गई इस कामुक खेल में। मैंने दर्द का बनावटी दिखावा करते हुए अपनी कमर को पीछे की ओर उचकाया, लेकिन क्षितिज ने पुनः अपनी पूरी शक्ति से मेरे नितंबों को अपनी ओर खींच लिया। फिर से उसका लिंग मेरी योनि में पैबस्त हो गया। मैंने भी ठान लिया कि आज अपने बेटे को इस आनंद से पूरी तरह रूबरु करा दूंगी। मैंने सप्रयास अपनी योनि को संकुचित करके उसके विशाल लिंग को अपनी योनि से कस लिया। मेरी कसी हुई योनि में उसके लिंग के अंदर जाने और बाहर आने से घर्षण का जो आनंद उसे प्राप्त हुआ, उसका का परिणाम यह हुआ कि उसने अनजाने में ही बिना किसी मार्गदर्शन के अपने लिंग का प्रहार पहले धीरे धीरे फिर धकाधक मेरी योनि में करना शुरू कर दिया।

“आह ओह अहा मजा आ रहा है मेरी जान, उफ अबतक यह सब क्यों नहीं हुआ, आह मेरी मॉम, मेरी स्वीट मॉम, मेरी प्यारी रानी, ओह ओह अद्भुत।” वह मेरी कमर पकड़ कर ठाप पर ठाप लगाये जा रहा था और बुदबुदाता जा रहा था, मुझे चूमे जा रहा था, उत्तेजना के आवेग में मेरे गालों पर अपने दांत भी गड़ा दे रहा था।

“ओह मेरे पागल रसिया, मेरी मुनिया के दीवाने, आह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह मार ही डालोगे क्या अपनी रानी को, उफ्फ्फ जालिम, इतनी खुशी से कहीं मर ही न जाऊं, ओह मेरे बच्चे, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी जान,” मैं उसकी मजबूत बांहों में बंधी अपनी कमर उचकाती हुई उसके ठाप का जवाब ठाप से देने लगी थी। ओह अपने बेटे से पहली बार चुदने के वे रोमांचक अविस्मरणीय पल, अखंड आनंद, उफ्फ्फ, सच में कहीं मैं पागल न हो जाऊं। मेरा रोम रोम तरंगित हो उठा।

“ओह मेरी जान, हम जो कर रहे हैं यह क्या है मॉम?” हांफते हुए वह बोला।

“संभोग है मेरे बच्चे, यह संभोग है। चुदाई है, चुदाई मेरे प्यारे नादान चुदक्कड़। जैसे ही तूने अपने पपलू, अपने लंड को मेरी मुनिया में डाला, मेरी चूत में डाला, तू बन गया मेरा चुदक्कड़।” मैं हांफते हुए उत्तेजित स्वर में बोली। वह मेरी बातें सुनकर पल भर रुका, जो मुझे बेहद नागवार गुजरा, तुरंत बोली, “चोद मेरे बच्चे चोद, अपनी मम्मी को चोद, जम के चोद, निकाल ले अपनी कसर, आह मेरे रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, बना ले मुझे पूरी तरह अपनी गर्लफ्रैंड, बना ले मुझे अपनी रंडी,” अब मैं अपनी असली औकात में आ रही थी।

“हां मेरी रानी, चोद रहा हूँ, आपको आज पूरी तरह मेरी गर्लफ्रैंड बना लूंगा, रानी बना लूंगा, रंडी बना लूंगा, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी जान,” बोलता जा रहा था और चोदता जा रहा था। पूरी ताकत से ठोके जा रहा था। बहुत जल्दी सीख रहा था मेरा बेटा, आखिर रंडी मां की औलाद जो ठहरा। इतनी अधिक उत्तेजित थी कि मैं दस मिनट में ही मैं छरछरा कर झड़ने लगी, “आ्आआ््आआह्ह्ह्ह,”। मैं छिपकली की तरह उसके शरीर से चिपक कर थरथराने लगी।

“क्या हुआ मॉम?” वह हांफता हुआ बोला।

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“कुछ नहीं रे, बहुत सुख दे रहे हो अपनी मां को बेटे, बर्दाश्त नहीं हो रहा है, तू चोदता रह।” किसी तरह अपनी सांसों पर काबू पाकर बोली।

मेरी बातों से आश्वस्त हो कर अपनी सुविधा के अनुसार अब उसने मुझे नीचे कर दिया था और मेरे ऊपर चढ़ गया था। मैं दुबारा उत्तेजित हो उठी। मैं भी साली छिना्आ्आ्आ्आल, बिछी जा रही थी अपने बेटे के नीचे, अपनी टांगों को फैला कर उसकी कमर में लपेटे मगन हो चुदी जा रही थी। बेड रूम में फच फच चट चट की आवाज गूंज रही थी और साथ ही हमारी सम्मिलित कामुकतापूर्ण “आह उह इस्स्स्स्स उस्स ओह्ह्ह्ह्ह्ह,” आहें और सिसकियां। बीस मिनट तक हम मां बेटे का यह कामुकतापूर्ण आनंददायक, घिनौना खेल चलता रहा। गुत्थमगुत्था होते रहे, एक दूसरे के शरीर में समा जाने की जद्दोजहद करते रहे। अंततः, उसके शरीर में तनाव आने लगा, ठोकने की रफ्तार तूफानी हो गई और तभी, उसने मुझे इतनी जोर से जकड़ लिया कि मेरी पसलियां कड़कड़ा उठीं। उसका लिंग मेरी योनि के अंदर और भी विशाल आकार लेने लगा और तब ऐसा लगा मानो गरमागरम लावा मेरी योनि में फच्च फच भरता जा रहा हो। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह मेरी जा्आ्आ्आ्आन,” कहता हुआ उसका शरीर शिथिल होने लगा। तभी मैं भी झड़ने लगी, “ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे राजा, मेरे चोदू बेटे, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, मैं गई रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए,” कहते हुए उसके शिथिल पड़ते शरीर से चिपक कर लंबी लंबी सांसें लेने लगी। हम दोनों ऐसे हांफ रहे थे मानो बड़ी लंबी दूरी की दौड़ पूरी करके मंजिल तक पहुंंचे हों। उसके चेहरे पर पूर्ण संतुष्टि और प्रसन्नता देख कर मैं निहाल हो गई। हम एक दूसरे की बांहों में समाये दूसरी ही दुनिया में पहुंच चुके थे।

“ओह माई स्वीट मॉम, आई लव यू,” कहते हुए मुझे बड़े प्यार से चूम लिया उसने।

“आई लव यू टू मेरे चोदू डियर। कैसा लगा?”

“बहुत ही अच्छा। बता नहीं सकता। आज तक मुझे इस सुख से वंचित कैसे रखा आपने, बताओ न मॉम।”

“देख बेटे, मां बेटे के बीच के ऐसे शारीरक संबंध को समाज अपराध के रुप में देखता है, इसलिए मैं डरती थी। वैसे भी मैंने कभी सोचा नहीं था कि हमारे बीच ऐसा कभी होगा। मैंने आज तक तुझे सिर्फ एक बेटे के रूप में देखा था।”

“तो अब किस तरह देख रही हो मॉम?”

“हट बदमाश, मारूंगी हां। अब तो तू न सिर्फ मेरा ब्वॉयफ्रेंड रह गया है, बल्कि मेरे तन मन का मालिक भी बन गया है। मालूम है तुझे कि जब एक बेटा अपनी मां के साथ संभोग करता है तो उसे क्या कहते हैं?”

“नहीं मालूम।”

“तो सुन, उसे कहते हैं मदर फकर, याने मादरचोद।” कहकर मैं खुद शरमा गई और उसके सीने पर चेहरा छुपा लिया।

“ओह मेरी जान, अपने प्यारे मादरचोद से शरमा गई? हाय, तेरी इस अदा पर तो फिदा हूं मॉम डियर।” मुझे अपनी बांहों में समेट कर बोला। उस रात क्षितिज को जो चुदाई का चस्का लगा, रात भर न खुद सोया न मुझे सोने दिया। जवान हट्ठा कट्ठा लड़का था, रात भर में पांच बार चोदा मुझे। चोद चोद कर मेरी हालत खराब कर दी उसने। मेरे गालों पर, गर्दन पर, चूचियों पर उसके दांतों के लाल लाल निशान उभर आए थे। चूचियों को दबाया, चूसा, काटा। चूत को चूसा, चाटा, चोदा, फुला दिया। मैं भी रंडी की तरह आनंद मगन खुल कर चुदती रही। सवेरे तक छोड़ ही नहीं रहा था मुझे। पूरी तरह आसक्त हो गया था मुझ पर। साय बजे सवेरे मुझे होश आया कि सात बज गये हैं। जबरदस्ती किसी प्रकार मना बुझा कर उठी मैं।

हाय राम, अभी इस वक्त क्षितिज मेरे कमरे से निकलेगा और हरिया या करीम में से किसी ने देख लिया तो क्या सोचेंगे? मेरी शरीर की हालत खुद रात भर के नोच खसोट की चुगली कर रही थी। मैं किसी तरह उठी, कपड़े पहन कर दरवाजे के बाहर झांका और रास्ता साफ देखकर क्षितिज को जबरदस्ती कमरे से बाहर धकेलते हुए बोली, “भाग यहाँ से जल्दी, वरना किसी ने देख लिया तो गजब हो जाएगा।”

क्षितिज अपने कपड़े पहन चुका था, लेकिन उसकी लाल लाल आंखें रात भर के जागरण और काली करतूतों की चुगली कर रही थीं। “ठीक है मॉम, अभी तो जाता हूँ, लेकिन आज रात फिर आऊंगा।” कहते हुए मुझे बांहों में ले कर चूम लिया।

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