Erotic Stories
Free Desi Indian Hindi Sex stories, Tamil sex stories

कामिनी की कामुक गाथा (भाग 36)

⏰ 1 min read

हां तो मैं बता रही थी कि श्यामलाल के साथ मेरा जो शारीरक संबंध दस साल पहले एक बार जो शुरू हुआ वह तो फिर चलता ही रहा। वह तो दीवाना हो गया मेरा। बार बार मेरे साथ संभोग के लिए ललायित रहता। अब उसकी दिनचर्या हो गयी थी, मेरा इंतजार करना ऑटो स्टैंड मेंं। फिर किसी सुनसान जगह में अपने तन की प्यास बुझा लेते थे हम। इसी दौरान करीब दो हफ्ते बाद एक दिन ऐसे ही मैं ऑटो स्टैंड पहुंची तो देखा कि श्यामलाल एक स्कॉर्पियो के पास खड़ा है।

“क्या हुआ, आज तुम्हारा ऑटो कहाँ है?”

“मैडम, आज मेरे एक दोस्त के स्कॉर्पियो का सर्विसिंग था, तो हम ऑटो छोड़कर स्कॉर्पियो ले कर आया था सर्विसिंग के लिए। सोचा कि लौटते वक्त इसी में आप को ले लेंगे।”

“ठीक है चलो” मेरे मन में अबतक उसने विश्वास जमा लिया था, कोई शंका की बात नहीं थी। मैं सामने की सीट पर बैठ रही थी तभी उसने मुझे पीछे सीट पर बैठने का आग्रह किया, जिसे मैंने सहज भाव से लिया और ड्राईविंग सीट के पीछे वाली सीट पर बैठ गई।

“हम ग्लास चढ़ा कर ए सी चला देते हैं, आपको “गर्मी” बहुत लगती है ना” वह अर्थपूर्ण भाव से मुस्कुरा रहा था।

“बहुत शैतान हो गये हो” मैं ने उसे मीठी झिड़की दी। वहां से जैसे ही हम लोआडीह चौक पहुंचे, एक काले से आदीवासी आदमी ने स्कॉर्पियो रुकवाया। श्यामलाल शायद उसका पूर्व परिचित था।

“मैडम, यह बलराम है, इस स्कॉर्पियो का मालिक। इन्हें भी रामपुर ही जाना है। वहीं रहता है यह भी। इनका घर वहीं पर है।” श्यामलाल बोला। इससे पहले कि मैं कुछ कहती, वह आदीवासी आदमी मेरी ही सीट पर आ बैठा। गाड़ी के अंदर आते ही मेरे नथुनों में शराब का तेज भभका टकराया। ऐसा लग रहा था वह बहुत शराब पिए हुए था। मैं तनिक असहज हो उठी और तनिक मायूस भी कि आज मेरी चुदाई प्रोग्राम का भट्ठा बैठ गया। मन मसोस कर रह गई। उसके तन से भी पसीने की बदबू आ रही थी। पता नहीं क्या था उस पसीने और शराब की मिली जुली दुर्गंध में कि मेरे अंदर पुरुष संसर्ग की कामना भड़क उठी।

मेरी मायूसी को भांपते हुए श्यामलाल तनिक झिझकते हुए बोला, “मैडम, बलराम को हमारे बारे में सब पता है। आज ही मुझ से कह रहा था कि एक बार मुझे भी मैडम की दिला दो। क्या कहती हैं आप?”

“तुम सब मर्द एक ही जैसे हो। बता दिया सब कुछ इन्हें? शर्म नहीं आई? आखिर फंसा ही दिया मुझे। तुम्हारी जगह कोई और होता तो तुम्हें पता है कि मैं उसका क्या हस्र करती। तुम्हारी बात कुछ और है इसलिए तुम्हारी बात रखने के लिए…..(मैं चुदने को तैयार हूँ इस बेवड़े से, मन ही मन तो खुश हो रही थी)” मैं बेबसी का नाटक करती हुई बोली। मेरे उत्तर से उन दोनों के चेहरे खिल उठे।

“ओह मैडम, दिल खुश कर दिया,” कहते हुए मुझ से सट गया और अपने दायें हाथ से मुझे समेट लिया और सीधे मेरी दायीं चूची पर हाथ रख दिया, सिर्फ हाथ ही नहीं रखा, तीन चार बार दबा भी दिया। “क्या मस्त चूची है, वाह मैडम” वह बोला, साथ ही अपने होठों से मेरे गालों, गले, होठों को चूमने लगा।

“छोड़ो मुझे, इस तरह रास्ते में कोई देख लेगा।” मैं छिटक कर अलग होने का नाटक करने लगी।

Also Read: कामिनी की कामुक गाथा (भाग 27)

“कोई नहीं देखेगा मैडम, गाड़ी के काले शीशे के बाहर से कोई अंदर नहीं देख सकता है। अंदर से बाहर सब कुछ दिखता है।” कहते हुए बलराम ने अपनी बायीं हाथ मेरी जांघ पर रख कर तीन चार बार दबा दिया। मैं उसका हाथ हटाने की असफल कोशिश करती रही मगर धीरे धीरे जबरदस्ती, वह मेरी साड़ी के ऊपर से ही मेरी जांघों के बीच हाथ ले आया और ठीक मेरी योनी के ऊपर सहलाने लगा। उफ्फ्फ, मैं अपने शरीर पर से नियंत्रण खोती जा रही थी। मेरी वासना की भूख को हवा दे दिया था उस खड़ूस नें। कामदेव नें मुझे बेबस कर दिया और मैं कामदेव के तीर से घायल, मदहोश होती जा रही थी।

“उफ्फ्फ, छोड़ो मुझे प्लीज,” मेरे विरोध में छिपे आमंत्रण को बलराम ने बखूबी पढ़ लिया था। उसकी हरकतें बढ़ती जा रही थीं। उसने मेरी साड़ी धीरे से उठा दी और अब सीधे मेरी पैंटी के ऊपर से मेरी पहले से पानी छोड़ती हुई योनी को सहलाना शुरू किया। “आह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह, उफ्फ्फ,” मैं अपनी उत्तेजना को छिपा पाने में असमर्थ हो गई, सिसिया उठी मैं। वह धीरे धीरे मुझ पर पूरी तरह हावी हो गया।

“मैडम जी, आप तो गजब की चुदक्कड़ हो। आपकी चूत तो बिल्कुल पावरोटी की तरह फूली हुई है। चूचियां गजब की बड़ी बड़ी। खूबसूरत तो हो ही, मगर एक नंबर की चुदक्कड़ भी हो। श्यामलाल जैसा बोला था, एकदम वैसी ही हो। आज मजा आएगा चोदने का।” अब बलराम खुल कर मेरे शरीर से खेलने लगा। गाड़ी धीरे धीरे चल रही थी, म्यूजिक सिस्टम में सेक्सी गाने एक के बाद एक बजते जा रहे थे। हाईवे पर कब नामकुम पार हुआ, कब रामपुर पार हुआ पता नहीं। एक एक करके मेरे कपड़े खुलते गए और अंततः मैं पूरी मादरजात नंगी हो गई। मेरे नग्न शरीर की छटा देख कर वह तो मानो पगला गया। गाड़ी की सीट को ऐसा एडजस्ट किया कि ड्राईविंग सीट के पीछे का हिस्सा बिस्तर में तब्दील हो गया। आनन फानन वह भी अपने कपड़ों से मुक्त हो कर मादरजात नंगा हो गया।

“ओह्ह्ह्ह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ इतना बड़ा्आ्आ्आ्आ, हाय राम इत्त्त्त्त््त्त्आ्आ्आ्आ्आ््आआ मोटा्आ्आ्आ्” इतना बड़ा लिंग था उसका। आठ इंच लंबा, मगर गधे की तरह फनफनाता करीब चार इंच मोटा। फिर वही, मेरा घबराने का नाटक। भीतर ही भीतर तो मैं पुलकित हो रही थी, आखिर मैं भी पूरी चुदक्कड़ हूँ ना। उसका पूरा शरीर काला भुजंग, हब्शियों की तरह। शरीर की बनावट, गठा हुआ, मजबूत, बनमानुष की तरह, पेट निकला हुआ। मुझे उसके शरीर की बनावट की वजह से पता नहीं क्यों कुछ अधिक ही उत्तेजक लग रहा था। एक अलग अनुभूति हो रही थी।

“साली छिनाल मैडम, तेरी चूत के लिए तो ऐसा ही लौड़ा ठीक है। साली बुरचोदी मैडम, पता नहीं कितना लौड़ा खा चुकी है इस भोंसड़ा में। नाटक कर रही है हरामजादी मैडम।” मेरी फूली हुई चिकनी पनिया उठी चूत को देख कर अब वह पूरी तरह समझ चुका था कि मैं किस किस्म की औरत हूँ। “अरे श्यामलाल यह तो पूरी रंडी है रे रंडी, इतना बड़ा्आ्आ्आ्आ चूत, साली ऐसा लग रहा है मानो किसी भैंस की चूत है” बलराम मेरी चूत को देखकर अचंभे में पड़ गया।

“अरे बलराम भाई, जरा चोद के तो देखो, ऐसा चूत पहले कभी नहीं चोदा होगा, कसम से, मजा नहीं आया तो मेरा नाम श्यामलाल से चूतलाल रख देना।” ड्राईव करते करते श्यामलाल बोला। उसकी बात सुनकर कोई भूमिका बांधे बिना सीधा मुद्दे पर आ गया। मेरे पैरों को फैलाया और अपनी एक उंगली मेरी योनी में घुसा दिया और उंगली निकाल कर चाट लिया।

“वाह, टेस्टी है” वह चटखारे ले कर बोला।

“छि: छि:” मेरे मुंंह से निकला। उसने फिर वही क्रम दुहराया, लेकिन इस बार उसने दो उंगलियां घुसा दीं। “आह्ह्ह्ह्ह, क्या करते हो” मेरे मुह से निकला। लेकिन अब वह दनादन दो उंगलियां अंदर बाहर करने लगा और करीब दो मिनट तक वह तूफानी रफ्तार से ऐसा ही करता रहा जिसके कारण मैं अपने को रोक नहीं पाई और “ओह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह्” करती हुई मैं उसी वक्त झड़ गई। मेरी थरथराहट और मेरे मुख से निकले निश्वास से उसे पता चल गया कि मैं झड़ रही हूँ।

“इतनी जल्दी ढीली मत पड़ो मैडम, अभी तो जी भर के चोदुंगा तुम्हें। रोज कोई न कोई मिल जाती थी चोदने के लिए, लेकिन आज कोई औरत मिली नहीं और किस्मत से मिली भी तो इतनी मस्त चुदक्कड़ औरत। सच में मजा आ गया” कहते हुए उसने मेरी चूचियों को चूसना और चाटना शुरू कर दिया। उंगलियां निकाल कर मेरी चूचियों पर मेरे चूत रस को मल दिया और बदस्तूर चाटता रहा चूसता रहा। फिर उसने अपनी उंगलियां मेरी चूत में डालकर उंगलियों से चोदना जारी रखा, उसकी इन हरकतों ने मुझे दुबारा जागृत कर दिया। मेरे बदन को ऐंठते देख कर वह समझ गया कि तवा गरम है, बिना एक पल गंवाए अपने विशालकाय लंड का सुपाड़ा मेरी चूत के मुहाने पर रख कर, मेरी कमर को कस के पकड़ा और एक करारा ठाप लगा दिया।

“ले साली कुतिया मैडम मेरा लौड़ा, ओह्ह्ह्ह हुम्म्म्म्म्म्म, ओह, साली इतना बड़ा भोंसड़ा मगर इतना टाईट? ओह्ह्ह्ह मजा आएगा अब सचमुच में चोदने में। सच बोला श्याम, साले मादरचोद, ऐसी माल को अकेले अकेले इतने दिन से चोदता रहा। हमें भूल गया था गांडू।” बलराम आनंदित होता हुआ बोला।

“हा्आ्आ्आ्आय्य्य्य्य्य्य रा्आ्आ्आ्आ्आम, फट्ट्ट्ट्ट गई््ईई््ईई््ईई््ईई,” सचमुच में इस प्रहार से दर्द के मारे बेहाल हो गई। मेरे अंदाज से कुछ ज्यादा ही मोटा था उसका लंड। ऐसा लग रहा था फट गई मेरी चूत। अपनी सीमा से बाहर फैल गई थी और मेरी चूत ने उसके लिंग को कस कर जकड़ लिया था।

“चिल्लाओगी हरामजादी, चिल्ला, जी भर के चिल्ला। पता नहीं कितने लोगों का लंड अपनी चूत में डलवाई है, अब मेरा लौड़ा गया तो गांड़ फट रही है, साली रंडी।” खूंखार हो गया था वह, मानो शेर को खून का स्वाद मिल गया हो। अब वह मेरी चीख पुकार की परवाह किए बगैर मेरी कमर को सख्ती से अपनी दानवी गिरफ्त में ले कर गचागच चोदने में मशगूल हो गया। उफ्फ्फ, उसके चोदने का वह वहशियाना अंदाज, मेरी चूचियों पर अपने दांत गड़ा दिया, मेरे गालों को दांतों से काटने लगा था, मेरी गर्दन पर अपने दांतों का निशान लगाता जा रहा था। मेरे शरीर को किसी वहशी जानवर की तरह भंभोड़ता रहा करीब चालीस मिनट तक। शुरू में मैं उसकी पाशविक प्रवृत्ति से घबरा गई थी, किंतु कुछ मिनट पश्चात वही पीड़ा दायक पाशविक संभोग मुझे बेहद आनंदित करने लगा, “ओह्ह्ह्ह राजा, आह्ह्ह्ह्ह मेरे बल्लू (बलराम), ओह्ह्ह्ह चोदू, उफ्फ्फ मेरी मां, ओह मेरे कामदेव, ऐसा सुख पहले कभी नहीं मिला रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, मार डालो मुझे ओह्ह्ह्ह भगवान, मां के लौड़े, ओह्ह्ह्ह मादरचोद, आह्ह्ह्ह्ह बहनचोद, रंडी बन गई रे तेरी ओह मैं कुतिया बन गई रे साले चूत के लौड़े,” आनंद के अतिरेक से बेहद गंदे अल्फाज निकल रहे थे मेरे मुह से। दूसरी ही दुनिया में पहुंच गई थी।

“हां मेरी रानी, मुझे भी ऐसी खूबसूरत चुदक्कड़ औरत से पहली बार पाला पड़ा है, ओह साली बुरचोदी रानी, आह रंडी, साले मादरचोद श्याम, ऐसी खूबसूरत छिना्आ्आ्आ्आल को कहां से पाया रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए ओह्ह्ह्स्स्स्साली्ई्ई्ई् की मस्त टाईट चूत, ओह्ह्ह्ह बुरचोदी की मस्त चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊचियां्आं्आं्आं” वह भी अनाप शनाप कुछ भी बोले जा रहा था और मैं भी तो ऐसी अवस्था में बिल्कुल जंगली बन जाती हूँ, बेहद गंदे अल्फाज मेरे मुह से भी निकल रहे थे। करीब चालीस मिनट की अंतहीन पाशविक चुदाई के बाद जब वह खलास हुआ, तबतक मैं दो बार झड़ चुकी थी, तीसरी बार अभी झड़ने ही वाली थी कि वह खलास होकर लुढ़क गया।

“उफ्फ्फ, चोदते रहो प्लीज मैं भी झड़ने वाली हूं” मेरी आवाज पता नहीं वह सुन पा रहा था कि नहीं, अचानक गाड़ी रुकी और श्यामलाल ने मानो मेरा उद्धार कर दिया।

कूद कर मेरे ऊपर आया और बदहवास, बेसब्री से चोदने का अधूरा काम पूरा करने में जुट गया, “साली कुतिया मैडम जी, बहुत देर बर्दाश्त किया साली बुरचोदी मैडम, ले अब मेरा लौड़ा खा मां की लौड़ी मैडम,” लगा धकाधक चोदने।

“आजा साले बहनचोद, तू भी आ जा,” मैं नीचे से उछल उछल कर चुदवाने लगी। पल भर में ही मैं झड़ गई। मगर श्यामलाल तो अभी शुरू ही हुआ था। वह भी करीब आधे घंटे तक मुझे झिंझोड़ता रहा। पूरा निचोड़कर रख दिया उन दोनों ने मुझे। ओह्ह्ह्ह ऐसा मजा जो उस दिन मुझे मिला वह अकथनीय था। जहां गाड़ी खड़ी थी वह रामपुर पार करके करीब अस्सी किलोमीटर की दूरी पर थी। मैं उन दोनों की दीवानी हो गयी थी और उनके साथ मस्ती का जो सिलसिला आज से दस साल पहले जो शुरू हुआ, वह आज तक जारी है। बलराम ने अपनी चुदाई कला और क्षमता से काफी प्रभावित किया था जिस कारण मैं सदैव उसके लिए उपलब्ध रहने की पूरी कोशिश करती थी। वह भी मुझसे काफी प्रभावित था जिस कारण मुझे चोदने का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहता था। बलराम के पास चार और गाड़ियां थीं जिन्हें वह भाड़े पर चलाता था। उसके पास चार ड्राईवर थे जो उसकी गाड़ियों को ऑर्डर पर ले कर जाते थे। यह तो संयोग था कि उस दिन उसका एक ड्राइवर नहीं आया था जिसके कारण श्यामलाल उसके स्कॉर्पियो को सर्विसिंग के लिए ले कर गया था और आगे जो कुछ हुआ मैं बता चुकी हूं। बलराम के संपर्क में आने के साथ ही साथ उसके ड्राईवरों के संपर्क में भी आई और एक बूढ़े शरीफ ड्राईवर को छोड़ कर बाकी तीन ड्राइवरों के साथ मेरा शारीरिक संबंध स्थापित हो चुका था जिससे बलराम अनभिज्ञ नहीं था। कुछ अवसरों में उन्होंने सामूहिक संभोग के लिए भी बाध्य किया, बाध्य क्या, यह समझ लीजिए कि मुझे राजी किया और मैं अपनी अदम्य कामुकता के वशीभूत उनके सम्मिलित संभोग का रसास्वादन करने को मजबूर हुई। फिलहाल अब वैसा रोजाना नहीं होता है, कभी दो हफ्ते में एक बार या कभी महीने में एक बार। अब तो वैसे भी मैं काफी व्यस्त हो गई हूं। ऑफिस का काम काफी बढ़ गया है और साथ ही साथ वृद्धाश्रम का काम भी देखना पड़ता है।

This story कामिनी की कामुक गाथा (भाग 36) appeared first on new sex story dot com

Part 36 of 58 complete
Continue to Part 37 →
कामिनी की कामुक गाथा (भाग 37)
View all 58 parts →