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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 33)

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पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि अपने क्लाईंट्स के साथ डील फाईनल करते करते किस तरह क्लाईंट्स की कामपिपासा शांत करने में भी महारत हासिल करती जा रही थी। इसी दौरान टाटानगर के व्यवसायी कुरूप और बदशक्ल रूपचंद और ज्ञानचंद के चंगुल में जा फंसी जो रूप के रसिया और विकृत सेक्स के दीवाने थे। उनके सहयोगी हिजड़े ऋतेश के आकर्षण में बंध कर इन कामलोलुप दरिंदों के जाल में मैं फंस चुकी थी। ऋतेश जहां मुझे अपनी मजबूत बांहों में जकड़े हुए कपड़ों के ऊपर से ही मेरे अंग प्रत्यंग से खिलवाड़ करता जा रहा था वहीं रूपचंद जी सामने बेड पर बैठ कर ऋतेश का उत्साह वर्धन कर रहे थे। “अच्छी तरह से गरम कर साली को ऋतेश, फिर इसे ऐसे चोदेंगे कि यह भी क्या याद करेगी।”

“आह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह मां, छोड़िए ना मुझे प्लीज। देखिए मुझे खराब मत कीजिए, मैं आप लोगों के पांव पड़ती हूं। मैं बरबाद हो जाऊंगी। प्लीज मुझे जाने दीजिए।” मैं अब तक गरम हो चुकी थी लेकिन मुझे भी शराफत का ढोंग तो करना ही था। मेरी योनी पानी छोड़ने लगी थी और पैंटी योनी के लसलसे द्रव्य से भीग चुकी थी। मेरे उरोज उत्तेजना के मारे सख्त हो कर तन गए थे।

“तुझे कौन बरबाद कर रहा है पगली। हम तो तुझे आबाद करने की फिराक में हैं। जब से तुझे ऑफिस में देखा है, तेरी इस खूबसूरत काया से खेलने के लिए तड़प रहे हैं। जल्दी उतार इसके सारे कपड़े ऋतेश। जरा हम भी इसकी जवानी का दीदार कर लें। इसके नंगे जिस्म को देखने के लिए मैं कब से तड़प रहा हूँ। तुझे तो पता है मेरा लंड इतनी जल्दी खड़ा नहीं होता है।” रूपचंद जी उतावले हो कर बोले। इसके बाद ऋतेश को रोकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया मेरे लिए। वह एक आज्ञाकारी गुलाम की तरह आनन फानन में मेरे सारे कपड़ों को केले के छिलके की तरह उतारता चला गया। मैं बनावटी असहाय भाव और बनावटी बेबसी का नाटक करती हुई छटपटाती रही और एक एक करके मेरा ब्लाऊज, ब्रा, स्कर्ट, पैंटी, सब मेरे तन का साथ छोड़ते चले गए और यह सब कुछ हो रहा था सिर्फ ऋतेश के आकर्षण में। अब मैं पूर्ण रूप से नंगी हो चुकी थी। अब ऋतेश मुझे और अधिक उत्तेजित करने के लिए मेेेरे होठों को चूमने लगा, मेरे मुह में अपनी जीभ डालकर चुभलाने लगा। उसके मजबूत पंजे मेरे उरोजों को सहला रहे थे, हल्के हल्के दबा रहे थे। मेरा विरोध फिर भी जारी था लेकिन ऋतेश भी माहिर खिलाड़ी था, उसे आभास हो गया था कि मैं उत्तेजित हो चुकी हूं क्योंकि अनजाने में उत्तेजना के आवेग में मैं ऋतेश के जीभ को चूसने लग गई थी। इधर मेरे मदमस्त नंगे जिस्म को देख कर दोनों की आंखें फटी की फटी रह गयीं। धीरे धीरे ऋतेश का एक हाथ मेरी योनी तक पहुंच गया और अपनी हथेली से मेरी योनी को सहलाने लगा। उसकी उंगलियां मेरी योनी के भगांकुर को छेड़ने लगीं तो ऐसा लग रहा था जैसे मेरी वासना की भूख अपने चरम पर पहुंच गई, कामुकता की तरंगें मेरे शरीर में बिजली बन कर दौड़ने लगीं। मैं तो पागल ही हो गई थी। मेरी आंखें बंद हो गयी थीं।

“आह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह, मार ही डालोगे क्या? अब …..” मैं बेसाख्ता बोल पड़ी।

अभी मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि रूपचंद जी बोल पड़े, “अब क्या? तू तो अभी से मरने की बात कर रही है, पहले मेरा लौड़ा खड़ा तो होने दे फिर दिखाता हूं तुझे चुदाई का जलवा। ले साली मेरा लंड अपने मुह में और चूस चूस कर खड़ा कर दे।” इतनी देर में रूपचंद पूरे निर्वस्त्र हो कर कब हमारे पास आ पहुंचे थे मुझे पता ही नहीं चला। मैं ने चौंक कर सामने देखा, उनका जिस्म उनके चेहरे की तरह ही बेढब और बेडौल था। ठिंगना होने के साथ ही साथ विकराल तोंद और पूरा शरीर रीछ की तरह बालों से भरा हुआ। जहां ऋतेश के गठे हुए कसरती शरीर और उसके मजबूत बांहों के बंधन में मुझे अद्वितीय सुख का अहसास हो रहा था वहीं रूपचंद के नग्न शरीर को देखकर किसी का भी मन वितृष्णा से भर जाता, किंतु मेरी स्थिति ऋतेश ने ऐसी कर दी थी कि अब मैं सिर्फ पुरुष संसर्ग के लिए मरी जा रही थी। वह पुरुष, कैसा है, मोटा, पतला, सुंदर, कुरूप, बेढब या लंगड़ा लूला, मुझे परवाह नहीं था। सामने से रूपचंद का लिंग सोई हुई अवस्था में ही करीब छ: इंच लंबा झूल रहा था। ऐसा लग रहा था मानो कोई सांप सोया हुआ है और उसके ऊपर झुर्रियों भरा चमड़े का आवरण ऐसा लग रहा था मानो कोई सांप अपनी केंचुली छोड़ने वाला हो। उनका अंडकोश भी काफी बड़ा था करीब आधा किलो के जैसा। इसके विपरीत ऋतेश अब तक पूरे वस्त्रों में था। वह मेेेरे साथ जो कुछ कर रहा था वह बिल्कुल मशीनी अंदाज में था, बिल्कुल भावहीन, एकदम किसी हुक्म के गुलाम रोबोट की तरह। अब मुझे ऋतेश से खीझ होने लगी थी। इतनी देर में तो कोई भी पुरुष अपना संयम खो कर मेरी मदमाती काया पर टूट पड़ता। पता नहीं किस मिट्टी का बना था वह, मर्द भी था कि नहीं। तब उस समय ऋतेश के आश्चर्य का पारावार न रहा जब उतावलेपन में मैं ने एक झटके से अपने को उसके मजबूत बंधन से आजाद किया और किसी भूखी कुतिया की तरह रूपचंद जी के सोये हुए छ: इंच लिंग पर टूट पड़ी और गप्प से अपने मुंह में ले लिया। फिर मैं लग गई जी जान से उनके लिंग को चपाचप चूसने ताकि वह जल्द से जल्द खड़ा हो सके और मेरी प्यासी योनी की धधकती ज्वाला को बुझा सके।

मेरे उतावलेपन को देख कर रूपचंद जी खुशी के मारे बोले, “वाह रे साली सती सावित्री की औलाद, आ गई ना रास्ते में। साली शरीफ औरत की चूत। चूस मेरा लौड़ा, मजे से चूस, फिर मैं दिखाता हूँ तुझे इस लौड़े का कमाल। आह ओह कितनी मस्त है रे तू। सच में तुझे चोदने में बड़ा ही मजा आएगा” कहते हुए एक हाथ से मेरी चूचियां सहलाने लगे और दूसरे हाथ से मेरे गुदाज चिकने नितंबों को सहलाने लगे। करीब दो मिनट बाद ही मैंने महसूस किया कि रूपचंद जी का लिंग सख्त हो रहा है, बड़ा हो रहा है, लंबा हो रहा है और मोटा भी। अगले एक मिनट बाद तो मैं उनके लिंग को मुंह में रखने में असमर्थ हो गई। जैसे ही मैं ने उनके लिंग को चूसना छोड़ कर मुह से निकाला मैं चौंक उठी। हे भगवान! इतना भयावह और दहशतनाक मंजर था। मेरे चेहरे के सामने करीब साढ़े ग्यारह इंच लंबा और करीब चार इंच मोटा किसी काले सांप की तरह फनफनाता रूपचंद जी का अमानवीय लिंग मेरे मुह के लार से लिथड़ा, अपने पूरे जलाल के साथ झूम रहा था। कोई कितनी भी बड़ी छिनाल हो, ऐसे लिंग का दीदार ही काफी था भयभीत करने के लिए। मैं कोई अपवाद तो थी नहीं, उस दहशतनाक मंजर को देख कर मेरी भी घिग्घी बंध गई।

“हाय राम, इत्ता बड़ा!” मेरे मुंह से अनायास निकल पड़ा। मैं दो कदम पीछे हट गई।

“डर मत पगली, बाकी औरतों की बात और है, मेरा लंड देख कर ही भाग जाती हैं। जिन्हें मैं ने चोदा, उनकी चूत फट गई, फिर कभी मेेेरे पास दुबारा नहीं आई कोई। मगर तू घबरा मत, तुझमें दम है। तेरी चूत ठीक मेरे लौड़े के लिए ही बनी है। तेरे जैसी चूत को मेरे जैसे लौड़े की ही जरूरत है। तू एक बार चुद के देख, कसम से बार बार चुदवाना चाहोगी।” रूपचंद जी मुझे डरा रहे थे कि हौसला बढ़ा रहे थे, मुझे समझ नहीं आ रहा था।

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“नहीं नहीं प्लीज मैं मर जाऊंगी।” मैं घबरा कर बोली।

तभी, “चल साली कुतिया, सामने जा रूपचंद जी के, खूब मजा करेगी” कहते हुए अचानक पीछे से ऋतेश ने मुझे एक धक्का दिया और मैं अपना संतुलन खो कर सामने गिरने लगी कि रूपचंद जी ने मुझे थाम लिया।

मैं ऋतेश पर विफर पड़ी, “साले नामर्द, खाली औरत को गरम करना जानते हो। मर्द हो खाली देखने में ही। मुझ पर ताकत दिखा रहे हो हिजड़े कहीं के।”

“अरे उस पर क्यों बिगड़ती हो मेरी जान, वह सही में हिजड़ा है। हट्ठा कट्ठा खूबसूरत हिजड़ा। मेरे लिए माल पटाता है। जिस दिन कोई माल नहीं मिला उस दिन मैं उसकी गांड़ चोद कर काम चला लेता हूँ। तुम औरतों से बढ़िया गांड़ है इसका। लंड भी बहुत बढ़िया चूसता है साला। अभी देख लेना, जब मेरा भाई आएगा तब इसकी करामात।” रूपचंद जी मुझे सख्ती से थामे हूए मुझे बोल ही रहे थे कि कॉल बेल बज उठा। ऋतेश तपाक से दरवाजे की ओर लपका। कुछ ही पलों में मेरे सामने एक और रूपचंद खड़ा मुस्कुरा रहा था। दो दो रूपचंद। कद में रूपचंद जी से थोड़ा कम करीब सवा चार फुट का था, चेहरे की बनावट एक ही तरह की थी किंतु रंग बिल्कुल काला। हां उनके चेहरे पर रूपचंद जी की तरह चेचक का दाग नहीं था। मैं हैरान, अवाक देखती रह गई।

“वाह भाई, इतना मस्त माल मिली कहाँ से? लगता है आसमान से कोई हूर उतर आई हो।” ज्ञानचंद बोला। बोलने का अंदाज भी रूपचंद की तरह ही था।

“किस्मत से भाई किस्मत से। आजा भाई तू भी शामिल हो जा। कामिनी मेरी जान, यह है मेरा जुड़वा भाई ज्ञानचंद। यूं ताज्जुब से मत देख। हम दोनों भाई जिस तरह से बिजनेस पार्टनर हैं उसी तरह कोई भी चीज हम दोनों भाई मिल बांट कर खाते हैं। आज भी हम दोनों भाई मिलकर तुझे जन्नत की सैर कराएंगे।” रूपचंद जी मुस्कुराते हुए बोले। ज्ञानचंद अपने भाई का आमंत्रण भला कैसे ठुकरा सकता था। उसका स्वभाव अपने भाई से अलग थोड़ी ही था। उसका मुझे देखने का अंदाज ठीक अपने भाई की तरह ही था, आंखों में वही वासना की भूख, शिकारी कुत्ते की तरह आंखों में चमक, मुह से लार टपकती। आनन फानन में वह भी मादरजात नंगा हो गया। ओह भगवान, बदन बिल्कुल अपने भाई की तरह गोल मटोल, रीछ की तरह बालों से भरा हुआ। लिंग का आकर प्रकार एक जैसा। ऋतेश के चक्कर में कहाँ फंस गई मैं। दो गोलमटोल बौने चुदक्कड़। मन ही मन भगवान से दुआ मांग रही थी कि मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं इन कामुक भेड़ियों को झेल सकूं। भगवान मेरी आर्त निवेदन क्यों सुनते भला, वे भी, लगता है, आज मेरी दुर्दशा अपनी आंखों से दीदार को ललायित थे। मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा था। इन दोनों की आंखों में मैं ने वहशीपन को स्पष्ट पढ़ लिया था। लेकिन अब तो मेरा सिर ओखल में जा चुका था और मूसल का प्रहार बाकी था।

ज्ञानचंद भी ठीक मेरे सामने आ खड़ा हुआ और अपने 6″ लंबे सोए हुए सांप की तरह झूलते काले लिंग को मेरे मुह के पास ला कर बोला, “चल री लौंडिया, चूस मेरा लौड़ा, खड़ा कर दे इसे भी मेरे भाई की तरह।” पता नहीं मुझे क्या हो गया था उस वक्त, शायद पुरुष संसर्ग की पुरजोर तलब का ही थी कि मैं ने आव देखा न ताव, हिम्मत बांधा और लपक कर ज्ञानचंद जी का भी लिंग अपने मुह में ले कर गपागप चूसने लग गई। मेरी बेताबी देख कर रूपचंद जी ठहाका मार कर हंसने लगे।

“साली कुतिया कुछ देर पहले कैसे कह रही थी मर जाऊंगी, अब देख कैसे गपागप ज्ञान का लंड चूस रही है। चल ऋतेश तू भी आ जा और जब तक यह लौंडिया ज्ञान का लौड़ा चूस कर खड़ा करती है तबतक तू भी मेरा लौड़ा चूसता रह, लेकिन पहले तू भी अपने कपड़े उतार ले गांडू।” रूपचंद जी बोले। आज्ञाकारी गुलाम की तरह ऋतेश आनन फानन में नंगा हो गया। गोरा चिट्टा, हृष्टपुष्ट शरीर वाला ऋतेश सचमुच में हिजड़ा ही था। सीना आम पुरुषों की तुलना में कुछ अधिक ही उभरा हुआ। ऐसा लग रहा था मानो किसी जवान होती लड़की की अर्द्धविकसित चूचियां हों। उसका लिंग था ही नहीं, सिर्फ एक छेद नजर आ रहा था जो मूत्र विसर्जन का मार्ग था। अंडकोश नदारद। लेकिन उसके नितंब! ओह बेहद खूबसूरत, गोल गोल और चिकने। पूरे शरीर में एक भी बाल नहीं था। सच ही कहा था रूपचंद जी ने, उसके शरीर को देख कर और खास कर उसके नितंबों की खूबसूरती देख कर लड़कियां भी शर्मा जाएं। वह भी किसी रोबोट की तरह रूपचंद जी का विशाल लिंग को हाथों में ले कर किसी लॉलीपॉप की तरह चाटने और चूसने लगा। अजीब समां था। इधर मैं ज्ञानचंद के लिंग को चूस चूस कर लिंग में तनाव लाने की पुरजोर कोशिश कर रही थी और उधर ऋतेश रूपचंद जी के लिंग को चाटने चूसने में लिप्त था। कुछ ही मिनटों में ज्ञानचंद का लिंग भी अपने भाई की तरह ही तनतना उठा। उफ्फ्फ, कितना भयानक था वह मंजर। अपने भाई के लिंग से थोड़ा छोटा, करीब करीब ग्यारह इंच का और वैसा ही मोटा। अब मैं सचमुच में दहशत में थी। ये जालिम तो आज मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ थी।

आगे की कहानी अगली कड़ी में।

तबतक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।

रजनी

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