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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 31)

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पिछली कड़ी में आपलोगों ने पढ़ा कि अपने ऑफिस में अपने कम के सिलसिले में मुझे कई ऐसे क्लाइंट्स से पाला पड़ता था जिन्हें मेरी खूबसूरती मोह लेती थी और वे मेरे साथ हमबिस्तर होने की ख्वहिश रखते थे। अपने पेशे में सफलतापूर्वक आगे बढ़ने के लिए मैंने कई ऐसे क्लाईंट्स की मनोकामना को पूर्ण भी किया। इसकी शुरुआत एक क्लाईंट मेहता जी से हुई। उनके प्रोजेक्ट पर विचार विमर्श के लिए उन्हीं के होटल में मैं अकेली गई और नतीजा यह हुआ कि अब मैं नग्न अवस्था में उनके बिस्तर पर थी। अब आगे:-

“वाह मेहता जी क्या माल है। तेरी पसंद की दाद देता हूँ। कसम से मजा आएगा आज।” कहते हुए राधेश्याम जी ने मेरी पैंटी भी खींच ली। उत्तेजना के मारे मेरा बुरा हाल था लेकिन मैं ने बनावटी लज्जा से अपनी जांघें सटा लीं। राधेश्याम जी ने जबर्दस्ती मेरी जांघों को अलग किया और मेरी चिकनी फकफकाती और पनिया उठी योनी को देख कर मुस्कुरा उठा। “अहा, मेहता जी, इसकी चूत तो चुदने के लिए पहले से पानी छोड़ने लगी है। साली रंडी, झूठ मूठ के नखरे कर रही थी मां की लौड़ी।” राधेश्याम जी लार टपकाती आवाज में बोले। मेरी हालत बहुत बुरी थी। अपनी उत्तेजना को छिपाने की सारी कोशिशें बेकार हो गयी थीं। मेरी गीली योनी मेरी दशा की चुगली कर रही थी। इधर मेरे उन्नत उरोजों को भी अब तक मेहता जी ब्रा के बंधन से मुक्त कर चुके थे। अब मैं पूर्णतया नग्न हो चुकी थी। इधर ये दोनों कामुक भेड़िये भी अपने वस्त्रों से मुक्त हो चुके थे। गजब का नजारा था। जहां ठिंगने कद के मोटे ताजे, गोरे चिट्टे मेहता जी की जुबान से लार टपक रही थी वहीं उनका छ: इंच लंबा किंतु तीन इंच मोटा लिंग फनफना कर मेरी योनी में तहलका मचाने को बेताब लार टपका रहा था। उधर राधेश्याम जी तो ऐसा लग रहा था जैसे कोई कई दिनों का भूखा काला भुजंग दानव अपने स्वादिष्ट भोजन को अपने सम्मुख पा कर नोच डालने को बेताब हो। उनका काला मोटा ताजा किसी सुमो पहलवान की तरह विशाल तोंद वाला भयावह शरीर और सामने झूलते अपने 10″ लंबे और चार इंच मोटे टनटन करते लिंग का दर्शन करके मेरी तो घिग्घी बंध गई थी। बहुत बुरी फंसी थी मैं। हालांकि मैं इससे पहले मैं कई अलग अलग लोगों के साथ अकेले या सामुहिक रुप से संभोग का लुत्फ ले चुकी थी लेकिन इस समय इस तरह की परिस्थिति में मैं खुद को पहली बार पा रही थी जब अपने व्यवसाय से सम्बंधित मुलाकात में क्लाईंट्स की कुत्सित इच्छा की पूर्ति के लिए मुझे मजबूर होकर यह करना पड़ रहा था। अब जब बात यहां तक बढ़ चुकी थी तो खैर उन्हें तो अपनी मनमानी करनी ही थी, मैं तनिक आतंकित होते हुए भी खुद को अंदर ही अंदर तैयार कर रही थी, अपने साथ होने वाले इस वासनात्मक खेल के लिए। सशंकित भी थी कि पता नहीं वे किस तरह से मेरे शरीर का उपभोग करेंगे।

मेरी नग्न देह की छटा को वे कुछ पलों के लिए अपलक देखते रह गए। “वाह क्या माल है मेहता जी, इसकी चूची तो देखिए, कितनी बड़ी बड़ी, चिकनी और सख्त” अपने विशाल पंजों से मेरे उरोजों को दबाते हुए राधेश्याम जी बोले। “ठीक कहा, राधे, इसकी गांड़ जरा देखिए, इसके शरीर के अनुपात में इतनी मस्त चिकनी, बड़ी बड़ी और गोल गोल गांड़, वाह, सच में आज तो हमारी किस्मत खुल गई है। मैं तो इसकी गांड़ मारूंगा।” मेरे नितंब पर चपत लगाते हुए मेहता जी बोले।

“हाय राम, आपलोग मुझे कहीं की नहीं छोड़िएगा। मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी। प्लीज मुझे खराब मत कीजिए।” यह प्रात्यक्षतः एक प्रकार से अंतिम आर्त निवेदन था। मैं भी कम ड्रामेबाज नहीं थी। मैं ने रोना शुरू कर दिया और मेरी आंखों से झर झर आंसुओं की धार बहने लगी। आंतरिक रूप से तो अब तक मैं चुदने के लिए पूर्ण तैयार हो चुकी थी।

“नखरे मत कर साली हरामजादी। देख तेरी चूत, इतनी बड़ी और फूली हुई। पता नहीं कितने लोगों से चुद चुकी है बुरचोदी। हम तुम्हें क्या खराब करेंगे। तेरी चूत तो चुदने के लिए पहले ही गीली हो चुकी है” राधेश्याम जी खौफनाक लहजे में बोल पड़े। इतना कह कर उन्होंने मेरे पैरों को फैला दिया और अपना लपलपाता लिंग मेरी योनी द्वार पर टिका दिया। अब विरोध का नाटक व्यर्थ था। मैं गनगना उठी। “ले मेरा लौड़ा अपनी चूत में, हुम्म्म।” कह कर एक करारा जल्लादी प्रहार कर दिया।

“हाय मर गई मां, उफ्फ्फ” मेरी हाय निकल गई। उनका पूरा लिंग एक ही धक्के में पूरा का पूरा मेरी योनी में ठुंक गया। मुझे उसी अवस्था में किसी खिलौने की तरह उठा कर खड़ा हो गया और तभी पीछे से मेहता जी मेरी गुदा पर हमला बोल बैठे। पहले उन्होंने मेरी गुदा का द्वार अपनी जीभ से जी भर कर चप चप चाटा।

“छि:, यह क्या कर रहे हैं मेहता जी” मैं राधेश्याम जी की बांहों में छटपटाती हुई बोली।

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अभी मैं ने इतना ही कहा था कि “अब ले मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में साली रंडी, हुम्म्म आह्ह्ह्ह्ह,” दन से मेहता जी ने अपना लिंग मेरी लसलसाई गुदा में उतार दिया।

“आह्ह्ह्ह्ह” मेरी आह निकल पड़ी। मेहता जी अपने पैरों के नीचे दो कुशन को रख कर खड़े थे। बस अब शुरू हो गया मेेेरे शरीर के साथ उनकी मनमानी। पीछे से मेहता जी मेरी गुदा के मैथुन में लीन हो गए और अपने हाथों से मेरी चूचियों को बुरी तरह नोच खसोट रहे थे, दबा रहे थे और मेरी गर्दन और कंधों को चूम रहे थे।

“उफ्फ्फ साली की गांड़ कितनी मस्त है राधे, ओह्ह्ह्ह बहुत मजा आ रहा है भाई” कहते हुए धकाधक चोदने लगे।

“अरे यार मेहता जी, इसकी इतनी बड़ी चूत भी सिर्फ देखने में बड़ी है, साली कुतिया की चूत है बड़ी टाईट। ओह्ह्ह्ह ऐसा लग रहा है जैसे इसकी चूत मेरा लौड़ा चूस रही है।” कहते हुए राधेश्याम जी भी अपनी पूरी शक्ति से जकड़े मुझे हवा में उठाए हुए ही फचाफच चोदने लगे। करीब पांच ही मिनट में मैं एक लंबी आह के साथ झड़ गई। मेरे ढीले पड़ते शरीर को अपनी पकड़ से ढीला नहीं होने दिया कमीनों ने। लगे रहे भूखे भेड़ियों की तरह नोचने खसोटने। करीब उसके दस मिनट बाद मैं फिर भयानक थरथराहट के साथ झड़ने लगी। मेरी स्थति से अनभिज्ञ नहीं थे वे माहिर चुदक्कड़। लगे रहे। करीब पच्चीस मिनट बाद जाकर पहले मेहता जी फचफचा कर अपना वीर्य मेरी गुदा में भरने लगे और खलास होते ही सोफे पर धम से गिर कर लंबी लंबी सांसे लेने लगे। मेहता जी के अलग होते ही राधेश्याम जी मुझे लिए दिए बिस्तर पर चले गए और पूरे जोश खरोश और पूरी निर्ममतापूर्वक मेरे नग्न देह का मर्दन करने लगे। मैं अपनी पूरी क्षमता से उनके मोटे कमर के ईर्दगिर्द अपने पैरों को लपेटे उनकी कामक्षुधा को शांत करने का भरपूर प्रयास करती रही।ठाप का जवाब ठाप से देने लगी। मस्ती में मैं भी सराबोर हो चुकी थी अब। पागलपन मुझपर भी सवार हो चुका था।

“हाय ओह्ह्ह्ह राजा, उफ्फ्फ मेरी मां, आह आह,” बरबस मेरे मुह से आनंदमयी सिसकारियां निकल रही थीं।

“हुम्म्म्म्मा्ह्ह्ह्ह आह, देखा साली रंडी, आ रहा है न मजा, बोल रही थी खराब मत कीजिए, बुरचोदी, अब बता, छोड़ दें तुझे अभी।” कमीना बोला।

तड़प कर मैं पूरी बेशर्मी के साथ बोली, “हाय नहीं, अभी नहीं मादरचोद, अभी नहीं, प्लीज चोदिए राजा ओह्ह्ह्ह मेरे चोदूजी, मेरे लंडराजा आह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह।”

चोद चोद कर निढाल थका मांदा मेहता भी हमारी बात सुनकर ठठाकर हंसने लगा। इसके कुछ ही पलों के बाद, यानी कुल मिला कर आधे घंटे तक धुआंधार चुदाई के पश्चात राधेश्याम जी ने मुझे कस कर अपने राक्षसी शरीर से चिपका लिया और फचफचा कर करीब डेढ़ मिनट तक स्खलित होते रहे। “आह्ह्ह्ह्ह मेरी रानी, ओह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह” उसी दौरान मैं भी तीसरी बार झड़ने लगी, “आह उऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ मा्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह” अद्भूत, अनिर्वचनीय।

जो भी हुआ, जैसा भी हुआ, उन्होंने मेरे तन से जी भर के आनंद उठाया और मुझे भी खूब आनंदित किया। दो घंटे में दो बार दोनों ने संभोग किया। वीर्य से लिथड़े लिंग को मेेेरे मुह से साफ करवाया। मैं ने भी बड़े प्यार से चाट चाट कर उनके लिंग को साफ किया। उसी नंग धडंग अवस्था में मुझे अपनी गोद में बिठाकर उन्होंने अनुबंध पर हस्ताक्षर किया। वे मेरी कमनीय काया का भोग लगा कर पूरी तरह संतुष्ट हुए और मेरा तो कहना ही क्या। उन्होंने मुझे अपनी कामपिपासा शांत करने का एक और रास्ता दिखा दिया। नौकरी का नौकरी और मजा का मजा। उस चुदाई क्रिया से निवृत्त हो कर हमने अपनी हुलिया दुरुस्त की, फिर मुझसे फिर मिलते रहने का वादा ले कर मुझे विदा किया। उस समय रात का नौ बज रहा था।

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