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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 24)

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पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह मेरे पापा समलैंगिक बने। उस दिन के बाद उस होटल के मालिक द्वारा रोज मेरे साथ यही क्रम दुहराया जाने लगा, नतीजा यह हुआ कि धीरे धीरे गुदा मैथुन मेरी आदत बन गई। करीब दस दिनों बाद एक दिन मेरे मामा ने मुझे वहां देख लिया और अपने साथ ले जाने लगे। होटल के मालिक ने जबरन रोकने की कोशिश की तो मेरे मामा ने पुलिस की सहायता ली और मुझे अपने साथ घर ले आए। हावड़ा में दस दिन की अवधि में मैं गुदामैथुन का अभ्यस्त हो गया और आज तक जारी है। मैं शादी करने का भी इच्छुक नहीं था, किंतु घर वालों की इच्छा को टालना मेरे वश में नहीं था, मजबूरी में मुझे शादी करनी पड़ी। मुझे इस बात का दुख है कि मैं लक्ष्मी को पूरी तरह पत्नी सुख नहीं दे सकता हूं। पर-पुरुषों से उसके अंतरंग संबंधों के बारे में भी मुझे पता है लेकिन अपनी कमजोरी के कारण मैं चुप रहता हूं। वह अब भी सोचती है कि मुझे उसकी इन कारगुज़ारियों की जानकारी नहीं है। अपनी वासना की भूख शांत करने के लिए उसने कई पुरुषों से अंतरंग सम्बन्ध कायम कर लिया है, इससे वह खुश है और हमारे परिवार में भी बिखराव का कोई खतरा नहीं है, इसलिए मैंने अपना मुंह बंद रखना ही बेहतर समझा।” इतना कह कर वह चुप हो गया।

यही है अशोक की कहानी।” बड़े दादाजी इतना कहकर चुप हो गये। सभी लोग खामोशी के साथ पूरी कहानी सुनते रहे। सभी के चेहरों पर अलग-अलग भाव थे। दादाजी के चेहरे पर ग्लानी स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी, क्योंकि उनकी कठोरता के कारण मेरे पापा को इस हादसे का शिकार होना पड़ा और मेरे पापा इस रास्ते पर बढ़ते चले गए। मेरी मां के भीतर क्या चल रहा था अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था। जहां मेरे पापा के वर्तमान स्थति के लिए सहानुभूति थी वहीं इस बात की ग्लानि भी थी कि पर-पुरुषों से गुप्त अंतरंग संबंध स्थापित करके अपनी वासना पूर्ति के बारे में, जैसा कि वह सोच रही थी कि मेरे पापा अनभिज्ञ हैं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं था, बल्कि मेरे पापा को मेरी मां के बारे में सबकुछ पता था। मैं अपने बारे में क्या कहूं। मेरे परिवार के हर एक सदस्य के बारे में एक एक करके जो रहस्योद्घाटन हो रहा था, अब मुझे कुछ भी आश्चर्य नहीं हो रहा था। मैं ने भी मन में ठान लिया कि जैसे सभी अपने अपने ढंग से जी रहे हैं और जीने का लुत्फ उठा रहे हैं, मैं भी अपने ढंग से जिऊंगी और जीवन का भरपूर आनंद उठाऊंगी। अपने पांचों बुजुर्ग पतियों के संग खुल कर रंगरेलियां मनाते हुए अपनी ही शैली में जीवन का भरपूर आनंद लूंगी।

मेरी मां के मुख से मेरे पापा की नामर्दी और बड़े दादाजी के मुख से पापा की समलैंगिकता के बारे में सुनते सुनते काफी समय हो चुका था। मैं उठकर शाम की चाय बनाने के लिए किचन की ओर बढ़ी और हरिया भी मेरे पीछे पीछे उठ कर चला आया। जैसे ही मैं किचन में घुसी, हरिया ने मुझे पीछे से पकड़ लिया और मेरी चूचियों को दबाने लगा। “ओह रानी, तेरी मक्खन जैसी मस्त चूचियां।”

“अरे क्या करते हो राजा?” मैं आहिस्ते से बोली।

“कुछ नहीं रानी, तू चाय बना, मैं अपना काम करता हूं,” कहते हुए उसने मेरा लहंगा कमर तक उठा दिया और झट से मेरी पैंटी को नीचे खिसका दिया। पता नहीं उसने कब अपने पैजामे को नीचे गिरा दिया था। अपना तना हुआ लिंग सीधे मेरी पनियाई हुई योनि में पीछे से एक ही झटके में घुसेड़ दिया।

“हाय दैया, कितने बेशरम हो जी। इतनी भी क्या बेसब्री?” मैं हकबका उठी।

“तू है ही इतनी मस्त कि बर्दाश्त ही नहीं होता है। तुझे तो पता ही नहीं कि कहानी सुनते सुनते मेरा लौड़ा कैसा अंगड़ाई ले रहा था। चल तू अपना काम कर, मेरे लंड की प्यास भी बुझ जाएगी और तुझे चाय बनाने में मज़ा भी आएगा।” हरिया बड़ी बेशर्मी से बोला और मेरी चूचियों को मसलते हुए चोदने लगा।

“ओह राजा, ठीक है तू मुझे चोदता रह, मैं चाय बनाती हूं” मैं भी मस्ती में भर कर बोल उठी। जब तक चाय तैयार हुआ, हरिया ने चुदाई का एक दौर पूरा कर लिया और मैं भी उसके साथ ही झड़ गई, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह राजा साले चोदू मादरचोद, झड़ गई आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओह रे मैं।”

“आह रानी ओह ओ्ओ्ओ्ओह मजा आ गया, मैं भी गया ओह मेरी चूतमरानी, जितना भी तुझे चोदूं मन ही नहीं भरता, इतनी मस्त है तू, क्या किस्मत पाया है हम लोगों ने, उफ़ क्या लौंडिया है तू मेरी जान” हरिया बोला।

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“अब ज्यादा प्रशंसा मत कीजिए मेरे स्वामी, चलिए चाय लेकर बैठक में।” मैं बोली और फटाफट हम अपना अपना हुलिया दुरुस्त कर के चाय लेकर बैठक में आ गए, मगर मेरे चेहरे की रंगत ने किचन के अंदर की लीला का पर्दाफाश कर दिया। “साले मादरचोद, अकेले अकेले चोद लिया ना।” दादाजी मुस्कुरा कर बोले। मैं शर्म से लाल हो उठी। बैठक में उपस्थित सारे लोग हंसने लगे।

“बहुत बेशरम हो गई है कमीनी,” मेरी मां बड़बड़ाई।

“आखिर बेटी किसकी हूं” मैं ने भी पलटवार किया।

सभी खिलखिला कर हंसने लगे।

“अरे भाई हम सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। कोई किसी से कुछ कम बेशरम थोड़ी है।” नानाजी बोले।

“हां भई हां। चलो मान लिया, एक सुखी परिवार बेशरमों का। आज का क्या प्रोग्राम है?” बड़े दादाजी बोले।

“आज का प्रोग्राम मेरे अनुसार होगा।” मैं बोली।

“कैसा प्रोग्राम?” सभी प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखने लगे।

“वो आपलोग आठ बजे रात को देख लीजिएगा” मैं ने रहस्यात्मक अंदाज में उत्तर दिया।

इसकेे बाद की कहानी मैं अगली कड़ी में ले कर आऊंगी।

आप लोगों की कामुक लेखिका

रजनी।

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