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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 48)

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प्रिय पाठकों, पिछली कुछ कड़ियों में आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह मैं अपने बेटे क्षितिज की हमबिस्तर बनी। यह सिर्फ संयोग नहीं था। हम मां बेटे का प्रगाढ़ रिश्ता, बेटे का मुझ से अत्यधिक लगाव, परिस्थिति और मेरी कामुकता, इन सबका मिला जुला परिणाम था हम मां बेटे के बीच पनपा शारीरिक संबंध। मेरी खूबसूरती से आकर्षित तो पहले से ही था, मेरी नग्न देह का दर्शन और इसके आकर्षण ने तो मानो उसे पागल ही कर दिया था। मैं चाह कर भी न तो उसे और न ही खुद को रोक पाई। नतीजा मेरे बिस्तर पर हम मां बेटे के बीच वासना का नंगा नाच। हमारे बीच अब कोई शर्म लिहाज नहीं बचा था। खुल कर एक दूसरे के शरीर से खेल रहे थे हम। सारी वर्जनाओं को तोड़ कर गंदगी की सारी हदों को लांघते हुए हम अपनी वासना की भूख मिटाने में लिप्त आनंद के अथाह समुद्र में डूब गये। मेरे प्रति उसकी आसक्ति पागलपन की हद तक बढ़ गई थी। इस बात से मैं चिंतित हो उठी। मैं ठहरी पूरी मर्दखोर औरत। मुझ पर किसी का एकाधिकार मुझे गंवारा नहीं था। अपने बेटे की भावनाओं को बिना ठेस पहुंचाए मैं उसका ध्यान मेरे अलावे अन्य स्त्रियों की ओर आकर्षित करना चाहती थी और उसमें मैं सफलता प्राप्त करने के नजदीक पहुंच गई। पहले तो उसे राजी किया कि अन्य स्त्रियों से भी संपर्क करके उनसे भी शारीरिक सुख प्राप्त करने का प्रयास करे, जिसमें मेरा पूरा मार्गदर्शन और सहयोग उसे मिलेगा। किसी अन्य स्त्री से शारीरिक संबंध बनाने के बारे में उसने कभी शायद सोचा ही नहीं था। मेरे कहने पर राजी तो हो गया था किंतु प्रथम बार किसी अन्य स्त्री को उसके बिस्तर तक लाने का जिम्मा उसने मेरे ही कंधे पर डाल दिया था। अब मैं किसी ऐसी व्यस्क स्त्री के बारे मे सोच रही थी, जो या तो रजामंदी से क्षितिज की हमबिस्तर बने या जिसे फंसा कर क्षितिज के बिस्तर की शोभा बना सकूं। इसके लिए मुझे अधिक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।
हमारे मोहल्ले के पूर्वी छोर पर एक महिला, श्रीमती रेखा सिन्हा को मैं जानती थी, जो करीब मेरी ही उम्र की, एक प्राईवेट फर्म में ऑफिस असिस्टेंट के पद पर कार्यरत थी। देखने में अच्छे भले घर की शरीफ औरत लगती थी, किंतु मैं जानती थी कि वह किस तरह की औरत है। काले रंग लेकिन तीखे नाक नक्श के कारण काफी आकर्षक थी। कद यही कोई पांच फुट चार इंच के करीब होगा। भरे बदन की होने के बावजूद पेट तनिक भी नहीं निकला था। उसके ब्लाऊज से छलक पड़ते अनुपात से काफी भरे भरे वक्ष लोगों का ध्यान बरबस अपनी ओर आकर्षित करते थे। मर्दों के दिलों पर तो मानो छुरियां चलती थीं। उसकी मदमाती चाल पर भारी, बड़े बड़े नितंबों की थिरकन का तो कहना ही क्या था। अपने काले रंग के बावजूद अपने शारीरिक गठन और खूबसूरत नयन नक्श से आकर्षक व्यक्तित्व की मालकिन होने के बावजूद अपने पति की बेरुखी झेल रही थी। उसका पति, 50 वर्षीय अलोक सिन्हा आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक था। काफी दिलफेंक किस्म का बंदा था वह। अपनी पत्नी को छोड़ पराई औरतों पर लार टपकाने वाला। कद करीब साढ़े पांच फुट, गोरा रंग, सर के आधे बाल गायब हो चुके थे लेकिन फिर भी लंबोतरे चेहरे पर हल्की मूंछें आकर्षक ढंग से तराशी हुईंं उनके चेहरे पर खिलती थीं। अच्छा स्वास्थ्य, पेट तनिक निकला हुआ था। उनके रंगीन मिजाज को मुझसे ज्यादा भला कौन जान सकता था। उन लोगों से मेरा परिचय कैसे हुआ, पहले मैं उसे बता दूं।
यह एक साल पहले की बात है। सिन्हा जी की गिद्द दृष्टि मुझ पर न जाने कब से थी। एक दिन दुर्गा पूजा की छुट्टियों में रेखा मायके गयी हुई थी। पूजा के अवसर पर भी मैं ऑफिस के कार्य में काफी व्यस्त थी। पूजा के भीड़भाड़ वाले माहौल में मैं कार लेकर नहीं जाती थी। देर शाम के झुटपुटे में करीब साढ़े छ: बजे घर लौटते वक्त ऑटो देख रही थी तभी अपनी कार में न जाने कहाँ से मेरे पास आ टपके,
“अरे कामिनी जी?”
“ओह सिन्हा जी, आप?”
“हां मार्केटिंग के लिए आया था, लौट रहा हूं। आप ऑटो देख रही हैं क्या?” लार टपकाती नजरें मुझ पर गड़ी हुई थीं।
“जी हां, लेकिन लगता है पूजा के चक्कर में ऑटो वाले पूजा घूमने वालों को ही घुमाने में व्यस्त हैं।”
“अरे तो आईए ना, मैं छोड़ देता हूं। घर ही तो लौट रहा हूं।” उसकी भूखी नजरें मेरे वक्षस्थल पर गड़ी हुई थीं।
“ओके” बोलते हुए जैसे ही पिछले दरवाजे की ओर बढ़ी, तपाक से सामने के दरवाजे को खोलते हुए बोले, “अरे सामने की सीट पर बैठिए ना, आईए।” मैं सामने की सीट पर ही बैठ गयी। अपने ऑफिस के कार्य की थकान के बावजूद मेरे शरीर के अंदर वासना का कीड़ा कुलबुला रहा था।
जैसे ही भीड़ भाड़ से बाहर निकले, गियर चेंज करते करते उन्होंने मेरी बांयी जांघ को सहला दिया। गनगना उठी अंदर तक मैं। मैंने सप्रयास अपने चेहरे को निर्विकार रखा। रियर व्यू मिरर इस तरह से सेट था कि वह मेरे चेहरे को बखूबी देख सकता था। कोई प्रतिक्रिया न देख मन बढ़ गया उनका। दुबारा उन्होंने वही हरकत की। मैं पशोपेश में पड़ गई कि अपनी प्रतिक्रिया कैसे व्यक्त करूँ। कामुकता का कीड़ा अंदर छटपटा रहा था, मनोवांछित मर्द भी उपलब्ध था किंतु शराफत का ढोंग करना भी आवश्यक था, खुद को इतनी सस्ती भी नहीं दिखाना चाहती कि किसी भी मर्द के आगे बिछ जाऊं। तीसरी बार उन्होंने यही क्रम दुहराया, इस बार कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गये वे। उनका हाथ तनिक और ऊपर तक आ गया था।
“यह क्या कर रहे हैं आप।” तनिक रोष में बोली। चेहरा इस वक्त भी निर्विकार था। उन्होंने झट से हाथ हटा लिया।
“सॉरी, गियर चेंज कर रहा था।” धूर्तता पूर्वक मुस्कुरा रहा था वह।
“अपना हाथ संभालिए। गियर लीवर उधर है।” मन तो पुलकित हो रहा था मेरा। करता रहे ऐसा, करता रहे, ऐसी इच्छा हो रही थी लेकिन उन्होंने फिर वैसी हरकत नहीं की। थोड़ा बुरा लगा, हां, यह भाव मेरे चेहरे पर आ गया। अब वह असमंजस में था, हाथ लगाने से मुझे बुरा लगा कि हाथ हटाने से। मैं उसकी मनोदशा समझ रही थी। सहसा एक सन्नाटा सा छा गया कार के अंदर। हम दोनों अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में हिचकिचा रहे थे। तभी कार रुकी। मैंने देखा यह तो सिन्हा जी का घर था।
“आपने कार यहां क्यों रोक दी?” चौंक पड़ी मैं।
“अरे कामिनी जी आईए न, चाय पी कर चली जाइएगा।”
“सिन्हा जी देर हो रही है, अभी नहीं।”
“प्लीज, एक कप चाय तो पी कर ही जाईए।” उनके पुरजोर आग्रह को टाल नहीं पाई मैं। शायद टालना चाहती भी नहीं थी।
“ठीक है लेकिन मैं जल्दी निकलूंगी, मौसम भी ठीक नहीं है। यह बेमौसम का बादल कहां से चला आया। शायद बारिश होने वाली है।” कहते हुए मैं कार से उतरी और उनके घर में दाखिल हुई। घर की आंतरिक सज्जा काफी आकर्षक थी। बड़ा सा ड्राईंगरूम था।
“आईए बैठिए” बड़े से गद्देदार सोफे की ओर इंगित करते हुए बोला। “मैं दो मिनट में चाय बना कर लाया।”
“अरे आप क्यों? घर में और कोई नहीं है क्या?”
“मैं अकेला हूं। रेखा पूजा मनाने मायके गयी हुई है। आप टेंशन मत लीजिए, मैं चाय अच्छी बना लेता हूं।” कहते हुए सीधे किचन में घुस गया। मैं धड़कते दिल से सोफे पर बैठ गई। मन में कई तरह के विचार आ रहे थे। मैं जान रही थी कि उनके मन में क्या चल रहा है। स्पष्ट बोलने की हिम्मत नहीं थी उनमे, शायद मेरी प्रतिक्रिया का असर था। मेरे मन में क्या चल रहा है यह तो मुझे भलिभांति पता था। एक अदृश्य दीवार सी थी, जिसके गिरने की भर देर थी, फिर तो सबकुछ अपनेआप होता चला जाता। कैसे होगा, कब होगा, या होगा भी कि नहीं।
“लीजिए, चाय आ गयी।” एक ट्रे में चाय और कुछ बिस्किट लिए हाजिर हो गये वे। उन्होंने चाय की ट्रे सेंटर टेबल पर रख दिया और सामने के सोफे पर बैठ गये। “लीजिए चाय लीजिए” मैंने चाय का कप उठाया तो वे बोल बैठे, “अरे बिस्किट भी लीजिए ना।” मैं ने उनका मन रखने के लिए बिस्किट भी उठा लिया। मन तो कुछ और चाह रहा था किंतु पहल कैसे करती। मन मसोस कर चाय खत्म कर उठने लगी।
“अच्छा तो मैं चलती हूं, चाय के लिए धन्यवाद।”
“ओके” मायूसी छाई हुई थी उनके चेहरे पर, जिसे वे चाह कर भी छिपा नहीं पा रहे थे। मैं उनकी मन:स्थिति से पूरी तरह अवगत थी, लेकिन मैं अपनी मनोदशा को कैसे व्यक्त कर सकती थी। उठ कर वे भी मेरे पीछे दरवाजे तक आए, मैं उनकी ओर मुड़ी और बाय कहने ही वाली थी तभी बड़े जोर की कौंध के साथ कानफाड़ू आवाज में बिजली कड़की। घबराहट और भयमिश्रित चीख के साथ मैं सामने खड़े सिन्हा जी से जा चिपकी। प्रत्यक्षत: यह स्वभाविक प्रतिक्रिया थी। मैं सिन्हा जी से चिपकी थरथर कांप रही थी। शायद इसी पल का इंतजार था, सिन्हा जी को। कस के अपनी बांहों में जकड़ लिया मुझे। उनके हिसाब से भगवान ने सुन ली उन के दिल की पुकार। उनके झिझक की दीवार ढह गई। मेरी बदहवासी के आलम में ही मुझे बांहों में जकड़े कमरे के अंदर खींच लिया और दरवाजा बंद कर दिया अंदर से। मैं जबतक अपने होशोहवास में आती, तबतक वे मुझे उस कमरे के बड़े वाले सोफे पर मेरे साथ लेट चुके थे। मैं नीचे थी और वे मेरे ऊपर। मुझ पर चुंबनों की बरसात करने लग गये थे। मेरी साड़ी का पल्लू एक तरफ हो गया था और मेरे उन्नत उरोज मेरे लो कट ब्लाऊज के ऊपर से आधा झांक रहे थे, फुदक कर बाहर आने को बेताब।
“यह क्या कर रहे हैं आप?” पूर्ण होशोहवास में आ कर मैं चौंक कर बोली।
“नया कुछ नहीं, कुछ भी नया नहीं। वही कर रहा हूं जो काफी देर से सोच रहा था, और देखिए भगवान ने खुद आपको मेरी झोली में डाल दिया।” उसकी आंखों में वासना की खुमारी अंगड़ाई ले रही थी।
“छोड़िए मुझे, प्लीज, मत कीजिए ऐसा मेरे साथ। जाने दीजिए मुझे।” उनके चंगुल से छूटने की असफल कोशिश करती हुई गिड़गिड़ाने लगी। सब नाटक। झूठमूठ के विरोध का दिखावा। चाहती तो मैं भी यही थी कब से। मन में तो लड्डू फूट रहे थे, अंततोगत्वा उनके झिझक का बांध तो टूटा।
“ऐसे कैसे छोड़ दूं कामिनी जी। इतने दिनों बाद तो आज मौका मिला है। अब आप मना मत कीजिए प्लीज, वरना मुझे जबर्दस्ती करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जो कि मैं नहीं चाहता हूं।” वह बेकरार हो रहा था। उनके पतलून के सामने के उभार का दबाव मेरी योनि के आसपास मैं महसूस कर पुलकित हो रही थी।
“नहीं, प्लीज, मैं वैसी औरत नहीं हूं जैसी आप मुझे समझ रहे हैं।”
“अब आप कुछ भी कहिए, मैं ऐसे तो आपको अभी जाने दे नहीं सकता।” मुझे बेहताशा चूमने चाटने लगा वह। उसने मुझे दबोचे हुए एक हाथ से मेरे उरोजों को मसलना शुरू कर दिया। “आह, आपकी चूचियों का जवाब नहीं। इतनी बड़ी बड़ी और टाईट? उफ मेरी जान, इतनी मस्त और खूबसूरत औरत को बिना चोदे कैसे छोड़ सकता हूँ भला।” अपने असली रंग में आ चुके थे वे। उनके हाथ का दबाव मेरी चूचियों पर बढ़ता ही जा रहा था। ब्लाऊज के ऊपर से ही बड़ी बेरहमी से मसलने लगे। उनकी आंखों में वहशीपन स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था।
“उफ्फ्फ, आह्ह्, छोड़िए, हाय हाय, ओह मां, बरबाद मत कीजिए मुझे उफ्फ्फ प्लीज।” छटपटाती हुई बोली मैं।
“छोड़ दूंगा जानेमन, छोड़ दूंगा। पहले चोद तो लूं। मेरे भूखे लंड की भूख मिटा तो लूं। आपको देख देख कर न जाने कितनी बार मूठ मार चुका हूं। आज जब मौका खुद भगवान ने दिया है तो भगवान की मर्जी का निरादर कैसे कर दूं।” जबर्दस्ती मेरे ब्लाऊज को खोल दिया उसने। मैं असहाय छटपटाती रही, मेरी ब्रा को भी नोच फेंका कमीने ने। उफ भगवान, मेरा ऊपरी भाग नग्न हो चुका था। “वाह, इतनी मस्त चूचियां, उफ्फ्फ मेरी रानी, मजा आ गया, जिंदगी में पहली बार ऐसी चूचियां देख रहा हूं। इतनी बड़ी बड़ी, सख्त और चिकनी, अब आप ही बताईये, कैसे छोड़ दूं इनका मजा लिए बिना?” मेरी चिरौरी विनती का तनिक भी प्रभाव उस पर नहीं पड़ रहा था, उसके विपरीत वह और अधिक उत्तेजित होता जा रहा था। वहशी जानवर बन चुका था अब तक। टूट पड़ा मेरे स्तन पर और मुह लगा कर चूसना आरंभ कर दिया।
“आह्ह् मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, ओह्ह्ह्ह्ह्ह भगवान, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” मैं बेबस छटपटाने का ढोंग करती रही। उत्तेजना के मारे मैं भी पागल हुए जा रही थी। मेरी योनि पानी पानी हो रही थी। उधर सिन्हा जी बेसब्री में मेरी साड़ी के अंदर हाथ डाल चुके थे। उनका हाथ सीधे मेरी पैंटी के ऊपर से ही फकफकाती योनि पर रेंगने लगा। चींटियां सी रेंगने लगीं मेरे पूरे बदन पर। योनि रस से भीगी पैंटी का आभास उन्हें हो गया था। अपनी सफलता पर खुश होते हुए वे कुछ अधिक ही उत्साहित हो उठे। मेरी चूचियों के निप्पल्स को चुभलाते हुए दांत गड़ा बैठे। “उई्ई्ई्ई्ई मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” चिहुँक उठी मैं। अभी भी मैं छटपटा रही थी। मगर उनके शक्तिशाली बांहों में बंधी बेबस पंछी की तरह फड़फड़ा कर रह गई।

उत्तेजना के आवेग में सिन्हा जी ने इतनी जोर से मेरे चुचुक में दांत गड़ा दिया था कि दांत का लाल निशान उभर आया था। मेरी आंखों में आंसू आ गए थे। पीड़ा से चीख उठी मैं। मगर इतना सब कुछ होते हुए भी मैं बेहद आनंदित हो रही थी। उत्तेजना के मारे मैं थरथराने लगी थी। मेरी पनियायी योनि के ऊपर, भीगी पैंटी के ऊपर से ही उनका हाथ थिरक रहा था, मेरे अंतरतम को तरंगित कर रहा था। “नहीं, ननननननह्ह्ह्हहींईंईंईंई, उफ्फ्फ ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, बस कीजिए ना्न्न्न्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह।” निर्बल आवाज में बुदबुदाई मैं। जांघों को आपस में चिपका योनि रस को बाहर निकलने से रोकने की असफल कोशिश करने लगी लेकिन नाकाम रही। इधर इतने पर ही कहां रुकने वाले थे वे। देखते ही देखते मेरी साड़ी, पेटीकोट को ऐसे निकाल फेंका जैसे सूखे पत्ते हों। अब मैं सिर्फ पैंटी में थी। अभी भी मेरा नाटक बदस्तूर जारी था, दिखावे की बेबसी का, दिखावे के विरोध का, दिखावे की शराफत का। कब तक। आखिर कब तक। तिनके की तरह नोच फेंका मेरी पैंटी को भी उस वहशी दरिंदे ने। नंगी हो गई मैं, मादरजात नंगी। उफ्फ्फ मेरे भगवान। मेरी फकफकाती फूली हुई पनियायी चमकती चूत का दीदार करके पागल ही तो हो गये वे। भूखे भेड़िये सी चमक उनकी आंखों में आ गई।।

“उफ्फ्फ इतनी मस्त चूत!!!!! इतनी बड़ी्ईईईईई!!!! पावरोटी की तरह फूली हुईईईईईई!!!!! साली ऐसी चूत कहां से पाई हो? शराफत का ढोंग कर रही थी चूत की लौड़ी, साली एक नंबर की लंडखोर। अब ज्यादा ड्रामा मत कर बुर चोदी। समझ गया, तुझे। चुदक्कड़ कहीं की।” समझ गया वह कमीना। मेरी चूत देख कर सब कुछ समझ गया कि मैं कितनी बड़ी चुदक्कड़ हूं।

“उफ्फ्फ, नहीं, ओह्ह्ह्ह्ह्ह भगवान जैसा आप समझ रहे हैं ऐसा कुछ नहीं है। हाय ओह” मैं कम कमीनी थोड़ी न हूं। ढीठ एक नंबर की, इतनी आसानी से शराफत का चोला कैसे फेंक देती।

“चुप साली कुतिया।” मुझे पुर्णतय: नग्न करने के पश्चात कुछ पल मेरी तराशी हुई काया के सौंदर्य में खो गये। उनकी आंखों में किसी भूखे भेड़िए सी चमक आ गयी थी। अपने कपड़े उतार कर खुद भी मादरजात नंगे हो गये। ओह भगवान, अच्छे खासे मर्द थे वे। सीने, कंधों, हाथ और पैरों पर बाल ही बाल। तोंद थोड़ा निकला हुआ। मजबूत शरीर और उफ भगवान, उनके तनतनाए हुए लिंग का तो कहना ही क्या। ज्यादा लंबा तो नहीं था, करीब साढ़े छ: इंच का था लेकिन मोटा गजब का। कम से कम तीन इंच मोटा तो जरूर था। लिंग के चारों ओर काले घने बाल, उनका अंडकोश भी बाल से भरा हुआ। जब तक वे अपने कपड़े उतारते मैं नग्नावस्था में ही सोफे से उठ खड़ी हो गयी।

“नहीं प्लीज, सिन्हा जी, नहीं।”

“चुप बुरचोदी, अब ना नुकुर करने से कोई फायदा नहीं। देख तेरे नंगे जिस्म की खूबसूरती देखकर मेरा लौड़ा कैसे फड़फड़ा रहा है। तेरी चूत में घुसे बिना यह मानेगा थोड़ी ना। फूल कर तो आलूचॉप हो गयी है तेरी चूत, बेकार ड्रामा करके अपनी चूत को और क्यों रुला रही हो हरामजादी।” अब तू तड़ाक पर उतर आये थे वे। झपट कर मुझे पुनः अपनी बांहों में दबोच कर लिए दिए उसी सोफे पर आ गये। हाय राम, मेरे नंगे जिस्म का उनके नंगे जिस्म से चिपकना बेहद आनंददायक था उस वक्त मेरे लिए। यही तो कब से चाह रही थी मैं। उन्होंने मुझे सोफे पर पटक कर दाहिने हाथ की एक उंगली भच्च से मेरी लसीली चूत में भोंक दी।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह्,” सिसक उठी मैं। अब भी छटपटा रही थी, उनकी बांहों में कसमसा रही थी। उंगली मेरी चूत से निकाल कर मुझे दिखाते हुए चाटने लगे।

“वाह स्वादिष्ट है। मजेदार है।” कहते हुए फिर मेरी चूत में उंगली डाल कर तीन चार बार अंदर बाहर करके चूत रस से भीगी उंगली चाटने लगा। “वाह वाह यम्मी, तू खुद चाट कर देख,” मेरे मुह में भी डाल दिया, नमकीन स्वाद, वाकई स्वादिष्ट था। “कैसा लगा? अच्छा है ना?” मेरे उत्तर की प्रतीक्षा करने के बजाय खुद मेरी चूत चाटने के लिए मेरी चूत में मुह लगा दिया और कुत्ते की तरह चपाचप चाटने लगा।

“ओह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ” दीर्घ निश्वास मेरे मुह से निकला। उफ्फ्फ, झनझना उठी मैं। उसने मुझे इस तरह दबा कर रखा था, मेरी दोनों जांघों के बीच सिर घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह, मेरे नितंबों के नीचे हाथ डाल कर चिपका दिया था अपना मुह। चूत के अंदर भी जीभ घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह कर चाट रहा था कमीना, मेरे भगनासा को भी छेड़ता जा रहा था हरामी। उफ्फ्फ, बता नहीं सकती हूं कितना आनंदित हो रही थी मैं उस वक्त। 69 के पोजीशन में थे हम दोनों। उनका गधे जैसा मोटा लंड ठीक मेरे मुह के ऊपर डिंग डोंग कर रहा था। अपनी दोनों जांघों के बीच मेरे सर को दबोचे हुए था और अपनी कमर को भी हल्के हल्के जुंबिश देते हुए मेरे होंठों से स्पर्श करा रहे थे वे अपने लंड को। वे माहिर चुदक्कड़ थे। समझ गयी मैं। कैसे किसी औरत को गरम करके शिकार करना है, उन्हें बखूबी आता था।

“मुह खोल मां की लौड़ी लंडखोर कुतिया।” उनकी गुर्राहट भरी आवाज आई। आवेश भरा आदेश था। सर हिलाने में असमर्थ, मुह खोलने को विवश हो गई। उन्होंने पहले अपने लौड़े को थोड़ा नीचे किया तो उन्हें पता चल गया कि उनके आदेश का पालन हो चुका है। एक ही धक्के में सड़ाक से अपना गधे जैसा लंड मेरे हलक में उतार दिया। उफ्फ्फ भगवान, ऐसा लगा मानो मेरी सांसें रुक गयी हों। छटपटा उठी मैं। मगर वह भी कम बड़ा चुदक्कड़ नहीं था। हल्के से लंड बाहर निकाला, मैं किसी तरह खुद को संभाल कर उसी स्थिति में स्थिर थी। धीरे धीरे मेरी सांसें सामान्य हो पाई, तभी फिर भच्च से अंदर कर दिया अपना लंड। इसी तरह तीन चार बार करने के बाद जब उन्हें आहसास हो गया कि मैं अब आराम से उनका लंड मुह में ले पा रही हूं तो फिर शुरू हो गयी मेरे मुह की चुदाई। गचागच, फचाफच। मेरी चूत में जो आग लगी थी, उस उत्तेजना का परिणाम यह हुआ कि मैं भी पागलों की तरह गपागप उनका उतना मोटा डरावना लंड लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी। तभी मैं उत्तेजना के चर्मोत्कर्ष में पहुंच गई, थरथराने लगी और मेरा स्खलन शुरू हो गया। मेरे मुह से गों गों की आवाज निकलने लगी और कुछ ही पलों में मैं झड़ कर निढाल हो गयी। उन्हें सब पता था, होता भी क्यों नहीं, औरतखोर नंबर वन जो ठहरा मादरचोद कहीं का। चपाचप मेरी चूतरस को चाट कर साफ कर दिया और फिर मुझे उत्तेजित करने के लिए पोजीशन बदल कर मेरी चूचियों पर टूट पड़ा।

“हाय, उफ्फ्फ, इस्स्स्स्स, हो गया सिन्हा जी आह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह” मैं बोली।

“बंद कर बकवास कुतिया, फिर से तैयार हो जा मेरा लौड़ा खाने के लिए अपनी बुर में।” उसके लिए तो अभी तक कुछ नहीं हुआ था। लंड जस का तस मेरी थूक, लार से लसलसाया, मेरी चूत का भुर्ता बनाने को बेताब था। मिनट दो मिनट में ही मैं पुनः गरमा गयी। मेरी सांसे तेजी से चलने लगीं। शरीर अकड़ने लगा। समझ गया वह कि मैं तैयार हो गयी हूं चुदने के लिए। मेरे दोनों पेरों को उठा कर अपने कंधों पर रख लिया।

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“नहीं नहीं प्लीज नहीं, ऐसा मत कीजिए मेरे साथ, मर जाऊंगी मैं ओह राम, बहुत मोटा है आपका।”

“क्या, क्या बहुत मोटा है।”

“लिंग आपका”

अबतक अपने लिंग का सुपाड़ा मेरी योनि द्वार पर टिका चुके थे वे, “लिंग नहीं हरामजादी, लंड बोल लंड, लौड़ा बोल लौड़ा, साली रंडी्ई्ई्ई्ई्ई।” भच्च, ठोंक दिया लंड उसने एक करारे झटके से मेरी योनि में। ककड़ी की तरह चीरता हुआ घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह, उफ्फ्फ।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह् ननननननह्ह्ह्हहींईंईंईंई, म्म्म््मर्र्र्र्र्र् गय्य्य्य्ई्ई्ई्ई मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” चीख उठी मैं।

“चीख मत बुरचोदी, ले और थोड़ा ले, हुम्म्म्म्म्म्म, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मस्त, आह्ह्ह् कितनी टाईट है साली कुतिया तेरी चूत, उफ्फ्फ, कितनी गर्म, भट्ठी है भट्ठी तेरी चूत उफ्फ्फ, देखने में भोंसड़ा मगर चोदने में सोलह साल की लौंडिया की चूत, उफ्फ्फ मजा आ गया रानी, अब आयेगा मजा चोदने का।”

“आह्ह्ह्, नन्न्न्न्ह्ह्ह्ही्हीं्ही्हींईंईंईं, आह्ह्ह् फट्ट्ट्ट्ट गई मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ मेरी।” नाटक करना तो कोई मुझ से सीखे। मेरी चीख से उत्साहित हो उठे वे।

“क्या, क्या फट गई तेरी?”

“योनि”

“योनि नहीं साली बुरचोदी कुतिया, बुर बोल बुर, चूत बोल चूत, भोंसड़ा बोल भोंसड़ा हरामजादी” मुझे सिखा रहा था मादरचोद। मन ही मन हंस पड़ी मैं। मन ही मन बोल रही थी, साले मां के लौड़े तेरे जैसे न जाने कितनों का लंड खा चुकी हूं, तू किस खेत की मूली है।

“आह, दर्द हो रहा है सिन्हा जी, निकालिए ओह्ह्ह्ह्ह्ह, बहुत मोटा है आपका लंड। आपने बरबाद कर दिया मुझे, हाय।”

“बरबाद नहीं रे पगली, आबाद बोल, आबाद। थोड़ा सबर कर, दरद खतम हो जायेगा फिर देख कितना मजा आयेगा।” पहले धीरे धीरे, फिर थोड़ा तेज और फिर और थोड़ा तेज, धक्के पर धक्का, ठाप पर ठाप दनादन देने लगे वे। अब मैं भी पूरी मस्ती में आ गयी। अब और नाटक करना व्यर्थ था। मजा लेना चाहती थी। शराफत का चोला भी पहने रहना चाहती थी। सब कुछ सही हुआ। मेरी चूत का रंग ढंग देख कर उन्होंने जो भी सोचा, परवाह नहीं। मैंने अपना रोल बखूबी निभाया। अब समय आ गया था पूरे रंग में आने का।

“कर ली अपनी मनमानी आखिर आपने। कर ही दिया मुझे बरबाद ना। हाय, जब हो ही गयी बरबाद तो अब और क्या बचा मां के लौड़े।” मैं भी अब आप ऊप के आदरसूचक संबोधन को अपनी चूत में डाल कर रंडीपन पर उतर आई। अपनी कमर उछालने लगी मैं। “साले मादरचोद, चल अब खुल के चोद मुझे साले कुत्ते, आह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह हरामी चोद मेरी चूत, बना डाल भोंसड़ा कमीने।” भौंचक्का रह गया वह मेरे इस रूप को देख कर। “अब मुह फाड़े देख क्या रहा है बुरचोद, फाड़ डाल मेरी चूत, लंड के लोढ़े, मेरी बुर का भुर्ता बना लौड़े के लोटे।” मैं बेहद उत्तेजित थी और आप लोगों को पता ही है कि उत्तेजना के चरम पर जब मैं होती हूं तो रंडी भी मेरे रंडीपन के आगे पानी भरने लगती है।

“वाह रे मेरी रानी, ये तो गजब हो गया। क्या यह मेरे लंड का कमाल है? पहले तो बड़ी शरीफजादी बन रही थी? अब तो बिल्कुल रंडी हो गयी।”

“तूने मुझे बरबाद किया, जबरदस्ती किया। मेरे मना करने के बावजूद मुझे चुदने के लिए मजबूर किया और अब जब मेरी चूत में आग लगी है तो लगे भाषण झाड़ने बहनचोद। अब रगड़ मुझे, रौंद मुझे, पीस डाल अपनी बांहों में साले चुदक्कड़ कुत्ते।” उसपर मुझे रंडी बनाने की तोहमत लगाते हुए मजा लेने लगी। खैर अब उसे इन बातों से क्या लेना देना था। चोदना था, चोद रहा था। मेरे खुलेपन से और उत्साहित हो कर सचमुच में जंगली जानवर बन गया। नोचने लगा, खसोटने लगा, पूरी शक्ति से भंभोड़ने लगा वह। मैं कहां पीछे रहने वाली थी। पूरी शक्ति से उनके शरीर से चिपकी गचागच लंड खाने में मशगूल हो गयी। “ओह्ह्ह्ह्ह्ह राजा, आह हरामी, हाय मेरे कुत्ते कमीने चुदक्कड़ स्वामी, आह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह, हाय्य्य्य्य मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ” सिसकारियां निकालने लगी।

“ओह मेरी कुतिया, चूतमरानी, बुरचोदी, उफ्फ्फ ओह्ह्ह्ह्ह्ह मजा आ््आआ््आआ रहा्आ्आ्आ्आ है ओह साली रंडी्ई्ई्ई्ई्ई अब तक क्यों नहीं चोदा रे तुम्हें।” इसी तरह हम दोनों एक दूसरे में समा जाने की जद्दोजहद करते रहे, धकमपेल करते रहे, मस्ती के सागर में डुबकी लगाते रहे और अंततः आधे घंटे के इस घमासान चुदाई के पश्चात हम दोनों एक दूसरे के तन में आत्मसात होने की पुरजोर कोशिश करते हुए आनंद के सागर में सराबोर अंतहीन स्खलन में लीन हो गये। जब हांफते कांपते निढाल हुए तो पूर्णतया तृप्ति की मुस्कान थी हम दोनों के होठों पर।

“कमाल हो तुम कामिनी। तेरे जैसी इतनी मस्त और खूबसूरत औरत मैंने आज तक नहीं चोदा। जैसी तेरी सूरत, वैसा तेरा बदन। इस उमर में इतनी बड़ी बड़ी मस्त चिकनी चूचियां भी इतनी टाईट, कमाल है। बदन का कसाव गजब है। तेरी गांड़ इतनी मस्त है कि लंड अपने आप खड़ा हो जाता है। चूत का तो कहना ही क्या। देखने में भोंसड़ा, लेकिन चोदने में साली सोलह साल के लौंडिया की चूत जैसी टाईट, वाह, मजा आ गया चोदकर। इतने दिन से खाली देख देख कर मूठ मारता रहा, मैं कितना बड़ा गांडू था।”

“साले चोदू कहीं के, मुझे बरबाद करके मजा आ रहा है मादरचोद। चलो कोई बात नहीं, बरबाद किया तो किया, जबरदस्ती चोदा तो चोदा मगर मजा बड़ा दिया रे प्यारे चुदक्कड़ जी। क्या लंड पाया है सिन्हाजी। मस्त। दिल खुश कर दिया चोदकर।” मैं उसके नंगे बदन से चिपकते हुए बोली।

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