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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 39)

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पिछली कड़ी में आपलोगों ने पढ़ा कि श्यामलाल और बलराम के चक्कर में मैं किस तरह बलराम के ड्राइवरों के चंगुल में जा फंसी। उस रात पहले बलराम, फिर श्यामलाल की हमबिस्तर बनी और फिर नशे और थकान से बोझिल कदमों के साथ जब उनके यहाँ से लड़खड़ाती हुई निकली तो बौने ड्राईवर घसीराम की गोद में जा गिरी, जो मुझे घर पहुंचाने के बहाने अपने कमरे में लेकर आया और मेरी नशे और थकान से बेहाल जिस्म को भोगा। जबतक वह संभोग से निवृत होता, दूसरे ड्राईवर, सरदार तेजेन्द्र का आगमन हुआ और उसने भी मेरे चुद चुद कर बेहाल शरीर को जी भर के भंभोड़ा। अभी उसकी चुदाई से मुक्ति भी नहीं मिली थी कि तीसरा मुसलमान ड्राईवर आ धमका और फिर उन तीनों की तो निकल पड़ी। रात भर दारू पी पी कर और मुझे पिला पिला कर मनमाने ढंग से मेरे शरीर से खिलवाड़ करते रहे। सवेरे तक मेरी हालत खराब कर दी थी कमीनों नें। आश्चर्य तो मुझे खुद पर हो रहा था कि इतना कुछ हो जाने के बाद भी मुझे कोई मलाल नहीं था, उल्टे इनकी घृणित वासना के खेल में मैं भागीदार बन कर खूब लुत्फ उठाया और सवेरे पूर्ण संतुष्टि का अनुभव कर रही थी। तुर्रा यह कि उनसे फिर मिलने की तमन्ना भी जाहिर कर बैठी थी और उनकी औरतखोरी के लिए औरतों को मुहैया कराने का आश्वासन भी दे बैठी थी। मैंने सिर्फ आश्वासन ही नहीं दिया, अपने वादे के अनुसार कुछ अतृप्त सेक्स की मारी औरतों और कुछ स्वभाव से लंडखोर औरतों से उनका संपर्क भी करा दिया। इन लोगों से मेरा भी मेरा मिलना जुलना और वासना का नंगा खेल जो आज से दस साल पहले शुरू हुआ था, वह निर्बाध रूप से बदस्तूर चलता रहा। उम्र के इस पड़ाव में भी, जबकि मैं 51 साल की हो चुकी हूं और इनकी उम्र 65 – 70 की हो चुकी है, ये अब भी मेरे संपर्क में हैं और आज भी यदा कदा मेरी कामुक काया रुपी गंगा में डुबकी लगाने आ जाते हैं। मैं पहले ही बता चुकी हूँ कि जिन पर मेरा दिल एक बार आ जाता है, मैं उनकी अंकशायिनी बनने में कतई संकोच नहीं करती हूं। कई बार मैं अपनी पसंद से मर्दों का चुनाव कर उनकी हमबिस्तर हुई लेकिन कई बार कई अजनबियों से आकस्ममिक मुलाकात में इच्छा से या अनिच्छा से, चाहे वह व्यवसायिक कारणों से या किसी और मजबूरी से हुआ हो, अगर पसंद आ गये तो ऐसे मर्दों से भी मेेेरे अंतरंग ताल्लुकात अब भी वैसे ही हैं। वैसे मुझे इन संबंधों को जारी रखने के लिए मुझे अपनी ओर से किसी प्रकार के खास प्रयास करने की कभी आवश्यकता नहीं पड़ी। जिसने भी एक बार मेरी कमनीय कामुक देह का उपभोग कर लिया और मेरी अदम्य कामुकता का स्वाद चख लिया, वह बाद में भी मुझ से मिलने को ललायित रहता था, जिन्हें उपकृत करने में मैं ने कभी भी कोताही नहीं बरती।

मेरी कच्ची नादान उम्र में पुरुष संसर्ग के सुख से परिचित होने के बाद फिर मैंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। मेरे शरीर की भूख दिन ब दिन बढ़ती ही चली गई। उन पुरुषों के नामों की फेहरिस्त काफी लंबी है जिन लोगों के साथ मैंने अपनी रातें रंगीन की। मेरे इन संबंधों से मेरे तथाकथित पति, हरिया (वास्तविक पिता) और करीम चाचा अनभिज्ञ नहीं थे, किंतु मेरी चढ़ती जवानी की अदम्य कामुकता को बुझा पाना उनके जैसी ढलती उम्र वाले पुरुषों के वश की बात नहीं थी। पंडित जी भी उम्र जा रही थी। फलस्वरूप अपने तन की प्यास बुझाने के लिए मेरे आकर्षक शरीर पर लार टपकाते मर्दों की बांहों में समाने को वाध्य हो कर वासना के दलदल में आकंठ डूबती चली गई। आरंभ में हरिया ने जब कभी मुझे टोका, तो मैं ने उन्हें टका सा जवाब दे दिया। एक बार ऐसी ही देर रात होटल के कमरे में एक क्लाईंट से नुच चुद कर करीब ग्यारह बजे अस्त व्यस्त हालत में जब मैं घर पहुंची तो मेरी हालत देख कर सब कुछ भांपते हुए हरिया ने पूछ लिया, “इतनी रात को कहां से आ रही हो?”

“ऑफिस के काम में देर हो गई।” मैं ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।

“झूठ मत बोलो। तेरी हालत बता रही है कि तू क्या गुल खिला कर आ रही है।” हरिया बोला।

“जब पता ही है कि मैं क्या गुल खिला कर आ रही हूं तो पूछते क्यों हैं?” मैं झुंझला कर बोली।

“देखो बेटी यह सब ठीक नहीं है,” वह तनिक अधिकार से बोला।

“साले बुड्ढे,” मैं तैश में आ गई, “अब तू मुझे समझाएगा कि क्या ठीक है क्या गलत? बेटी बोलता है बेटीचोद। अपनी बेटी को बीवी बना कर चोदता रहा इतने साल, तब बेटी नजर नहीं आई। पांच पांडव बन कर रंडी की तरह चोदता रहा मादरचोद, तब बेटी नजर नहीं आई। अपनी आंखों के सामने पंडित जैसे जंगली जानवर से चुदते देखता रहा भड़वे, तब बेटी नजर नहीं आई। अब जब चोद चोद कर मुझे असमय जवान बना दिया और मेरे शरीर में चुदाई की आग धधक उठी तो बेटी नजर आ रही हूं साले मादरचोद। बड़ा बेटी का बाप बन रहा है मां के लौड़े। अपने काम से काम रख। आईंदा मेरी जीवनशैली पर सवाल मत करना।” मैं ऊंची आवाज में बोल उठी। मेरी बातें सुनकर करीम भी वहां आ चुका था। उन दोनों की बोलती बंद हो चुकी थी। चुपचाप सर झुकाए खिसक लिए दोनों। उस दिन के बाद इस संबंध में उन्होंने फिर कभी नहीं टोका, समझ गए कि चिड़िया हाथ से निकल चुकी है। निर्बाध, स्वछंद, अपने ढंग से जीने लगी मैं।

अपने ससुराल से तो मैं अलग थी लेकिन अपने पुत्र क्षितिज को मैंने एक अच्छे विद्यालय के हॉस्टेल में डाल दिया था ताकि मैं अपना कैरियर संवार सकूं। इधर मैं नौकरी ज्वॉईन करने के बाद तरक्की की सीढियां फलांगती हुई शाखा प्रबंधक के पद पर पहुंच गई और उधर क्षितिज, हॉस्टेल में रह कर प्लस टू तक की पढा़ई समाप्त कर एन आई टी दुर्गापुर में प्रवेश के लिए चुन लिया गया। अच्छी रैंकिंग की बदौलत उसे विषय मिला आई टी। मेरे और क्षितिज के बीच बहुत अच्छा संबंध था। मेरे संघर्ष से बखूबी परिचित था इसलिए मेरी बड़ी इज्जत करता था। वह मेरा बड़ा अच्छा दोस्त भी था। अपनी सारी बातें मुझसे साझा करता रहता और सलाह लेता रहता था। छुट्टियों में जब भी आता, अपने दादा दादी से जरूर मिलने जाता था किंतु अधिकतर समय मेरे पास ही बिताना पसंद करता था। मैं पूरी कोशिश करती थी कि मेरे ऑफिस के कार्यों के कारण उसकी छुट्टियों का बहुमूल्य समय बरबाद न होने दूं। इसके अलावा मेरे परपुरुषों से अंतरंग संबंधों की भनक तक मैं ने उसे लगने नहीं दी। वैसे तो 19 साल तक में ही वह पूर्ण रूप निखर चुका था, छ: फुटा, गोरा रंग, घुंघराले बाल और अच्छी खासी सेहत वाला युवक, लेकिन 21 साल की उम्र होते होते पूरा विकसित व्यक्ति में तब्दील हो चुका था। पता नहीं मेरे पांचों पांडवों और पंडित जी में से किसके वीर्य की उपज था वह, या फिर मेरी कोख में उन लोगों के मिश्रित वीर्य का फल था।

एक बार यूं ही पूजा की छुट्टियों में जब वह घर आया तो मैं उसकी खूबसूरती देख कर दंग रह गई। संध्या करीब साढ़े चार बजे उसके आने के पहले ही मैं उस दिन घर पहुंच गयी। उसे स्टेशन से लाने के लिए मैंने राजेश को नानाजी की कार से भेजा था। उसके कार से उतरते ही अपलक देखती रह गई थी मैं। लंबोतरा चेहरा, सुतवां नाक, गहरी भूरी आंखें और घनी भौंहें, अपने स्थान पर जड़ रह गई थी मैं, उसकी खूबसूरती देख कर। नीली टाईट जींस और काले टाईट टी शर्ट में उसकी खूबसूरती गजब ढा रही थी। टी शर्ट की बांहें उसके बाजूओं की मछलियों पर कसी हुई थीं। मेरे अंतरतम के कपाट पर कामुकता का शैतान दस्तक दे रहा था। छि:, यह कुत्सित सोच मेरे मन में आ कैसे रहा था। झटक कर दूर कर दिया इस शैतानी सोच को।

“हाय मॉम, कहाँ खो गयीं आप?” उसकी आवाज सुनकर चौंक उठी और जैसे गहरी नींद से जागी मैं।

“ओह माई लव, बहुत हैंडसम हो गए हो। कहीं मेरी नजर न लग जाए मेरे बेटे को।” ढेर सारा प्यार उमड़ पड़ा उस पर। उसने लपक कर मुझे अपनी मजबूत बांहों में भर लिया और बेसाख्ता मेरे गालों को चूम लिया।

“जिसकी मॉम इतनी खूबसूरत हो उसका बेटा हैंडसम नहीं होगा तो और क्या होगा।” मुझे गुड़िया की तरह उठा कर एक चक्कर घुमा दिया।

“ओह्ह्ह्ह, छोड़ो मुझे शैतान, मस्का मत मारो। बताओ, कितने दिनों की छुट्टी है?” मैं पुलकित होती हुई बोली।

“सिर्फ एक हफ्ते की छुट्टी है मॉम।” वह मुझे फर्श पर उतारते हुए बोला।

“चलो कोई बात नहीं, एक हफ्ता ही सही, कम से कम छ: महीने बाद अपने बेटे का दर्शन तो हुआ। एक हफ्ता बहुत है बेटा मुझ मां के लिए। तरस गई थी मैं तुझे देखने के लिए।” मैं बोली। करीम चाचा और हरिया भी अबतक आ चुके थे।

“अरे क्षितिज बेटा, कितना बड़ा हो गया है रे तू”, हरिया बोला।

क्षितिज आगे बढ़ कर हरिया और करीम चाचा के पैर छू कर बोला, “बड़ा तो होना ही था नाना जी (वह उन्हें नाना ही कहता था, उसे क्या पता था कि इन्हीं की करतूतों की उपज है वह), कब तक बच्चा रहता।”

“हां बेटा, खूब कहा तुमने, खुश रहो,” करीम चाचा बोले। राजेश क्षितिज का बैग लेकर उसके कमरे में रख आया। फिर क्षितिज वहीं ड्रॉइंग रूम के सोफे पर बैठ गया। हरिया तुरंत कोल्डड्रिंक का ग्लास ले आया।

“अरे नाना जी, आपने क्यों कष्ट किया। मैं खुद ही ले लेता।” क्षितिज उसके हाथ से ग्लास लेते हुए बोला। मैं वहीं क्षितिज के पास बैठ कर उससे बातें करने लगी। वैसे तो हम मां बेटे फोन पर हमेशा बातें करते रहते थे किंतु इस तरह एक दूसरे के सामने बैठ कर बातें करने का कुछ अलग ही महत्व होता है।

क्षितिज मुझे गौर से देखते हुए बोला, “मॉम, आप तो बड़ी खूबसूरत हो गई हो। क्या बात है? आप की नजर मुझे क्या लगेगी, कहीं मेरी नजर ही न लग जाए आपको।”

“चुप बदमाश।” उसके गाल पर प्यार से चपत लगाते हुए बोली। वैसे मैं अपनी प्रशंसा सुन कर तनिक लाल हो उठी थी।

“वाह मेरी मम्मी डीयर, आपका चेहरा तो लाल हो गया। कसम से आप इस तरह शरमाती हुई और खूबसूरत लग रही हो।” क्षितिज के मन मेंं क्या भाव था पता नहीं, किंतु मैं तो अंदर तक लरज उठी।

“अब तू बस कर। सताने के लिए मैं ही मिली हूं क्या? तू बहुत बोलना सीख गया है। जा कर अपनी गर्लफ्रैंड से ऐसी बात कर बदमाश।” मैं झिड़कते हुए बोली।

“छि:, कैसी बात करती हो मॉम? जिसके पास आप जैसी खूबसूरत गर्लफ्रैंड हो उसे और किसी गर्लफ्रैंड की जरुरत है क्या? कसम से, मेरी कोई गर्लफ्रैंड नहीं है, न ही मुझे कोई रुचि है गर्लफ्रैंड बनाने में।” मुझसे लिपटते हुए बोला। उसकी इन बातों और हरकतों में प्रत्यक्षतः मां के प्रति प्यार ही लग रहा था, अपनापन लग रहा था। वैसे भी मुझसे इस प्रकार का व्यवहार वह लाड़ जताने के लिए करता ही रहता था। हमारे बीच पहले से ही जो रिश्ता था वह दोस्तों की तरह ही था किंतु पता नहीं इस बार उसकी बातों में क्या था, मैं अंदर ही अंदर पिघलती जा रही थी, अच्छा भी लग रहा था और भय भी महसूस कर रही थी खुद अपने अंदर की शैतानी भूख से।

फिर भी बनावटी नाराजगी जाहिर करते हुए छिटक कर अलग हुई और बोली, “हट शैतान, इतना बड़ा हो गया लेकिन अभी भी मुझे सताने से बाज नहीं आ रहा है। चल पहले जा कर फ्रेश हो जा फिर इतमिनान से बातें करते हैं” कह कर अपनी भावनाओं को किसी प्रकार काबू में रख कर उठ खड़ी हुई। मैं सीधे अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर धम्म से बैठ गई। हे भगवान, यह मुझे क्या हो रहा है? मेरे अपने बेटे के लिए मेरे मन में यह क्या चलने लगा? उसकी बातों से मेरे अंदर की कामुकता का जहरीला सांप फन उठा रहा था। बड़ी मुश्किल से मैं अपनी भावनाओं को काबू में रखने में सक्षम हो पाई।

संध्या के समय जब हम चाय पीने के लिए ड्राईंग रूम में आए तबतक मैं अपनी भावनाओं पर काबू पा चुकी थी।

हरिया चाय किचन में चाय बना रहा था, तभी क्षितिज भी किचन के अंदर जा कर उससे बोला, “नानाजी, आज मैं चाय बनाऊंगा, आप चलिए ड्राइंगरूम में, मैं खुद चाय ले कर आता हूं।”

हरिया जानता था कि उसके सामने उसकी एक नहीं चलने वाली। वह चुपचाप ड्राइंग रूम में आ कर बैठ गया और बोला, “आज क्षितिज बाबा चाय बना रहा है।”

“क्या? अरे बाबा उसे चाय बनानी आती भी है?” मैं चौंक कर बोली और किचन में जा घुसी। देखा तो वह चाय बना चुका था और कपों में चाय डाल रहा था।

“हाय हैंडसम, यह क्या? आते आते किचन में? चाय बनानी आती भी है?” मैं बोली।

मुझे देखते ही बोला, “अरे मॉम, अपने बेटे पर इतना भी विश्वास नहीं है? देख लो, चाय बन चुकी है।” मैं अविश्वास से कभी चाय को और कभी क्षितिज को देख रही थी। वह नहा धो कर फ्रेश हो कर एक काले रंग के बरामूडा और सफेद ढीली टी शर्ट में बेहद आकर्षक दिख रहा था।

“लो मॉम, टेस्ट करके देखो कैसी बनी है चाय?” कहते कहते एक कप उठा कर वह मेरी ओर ज्यों ही मुखातिब हुआ, देखता ही रह गया वह। मैं भी ऑफिस से आकर फ्रेश नहीं हुई थी, सो चाय के समय से पहले नहा धोकर फ्रेश हो कर आसमानी रंग के गार्डन सिल्क वाली ढीली नाईटी पहन कर आई थी। गला काफी खुला हुआ था इस नाईटी का। ठगा सा मुझे सर से पांव तक अपनी गहरी आंखों से चमत्कृत देखता रह गया। उसकी नजरें मेरी आंखों के रास्ते मानो मेरे अंदर भेद रही थीं। “ओह्ह्ह्ह माई गॉड! यह हुस्न की परी कहाँ से टपक पड़ी। ओह मॉम, आप तो बिल्कुल कयामत हो कयामत।” उसके मुंंह से बोल फूटे।

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“चल हट शैतान, अपनी मां से कोई ऐसा बोलता है क्या?” मैं किसी प्रकार उसकी बातों के दुष्प्रभाव से बच कर बोली।

“कसम से मॉम, आप बड़ी हॉट हो।” कहते हुए उसने चाय का कप मेरे हाथ में थमाया, लेकिन उसकी बातों से मैं अंदर तक थरथरा उठी थी, मेरे कांपते हुए हाथ से चाय छलक कर मेरी नाईटी के सामने सीने के उभारों के बीचोंंबीच गिर कर भिगो दिया। मैं हड़बड़ा कर चाय का प्याला किचन के स्लैब पर रखने जा ही रही थी कि क्षितिज भी जल्दबाजी में मेरे हाथों से चाय का प्याला लेने आगे बढ़ा और उस चक्कर में हम एक दूसरे से टकरा गये, नतीजा यह हुआ कि रही सही चाय भी मेरी नाईटी के ऊपर गिर गई। गनीमत था कि चाय सिर्फ मेरे कपड़े पर गिरा, जिस कारण गरम चाय के सीधे संपर्क में न आ कर मेरा चमड़ा जलने से बच गया, फिर भी गरम चाय के ताप को महसूस कर मेरे मुंह से “आह” निकल पड़ी। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, क्षितिज ने आव देखा न ताव, आनन फानन मेरी नाईटी को उतार फेंका। मैं भक्क, हक्की बक्की रह गई। यह सब इतनी जल्दी हुआ कि मैं संभल भी नहीं पाई। अनजाने में उसने तो सिर्फ मेरी सुरक्षा के लिए शायद यह किया था। अंदर मैं सिर्फ पैंटी और ब्रा में थी।

“हाय यह क्या किया” मैं अपने जवान बेटे के सामने इस अवस्था में अपने आपको पा कर शर्म से पानी पानी हो उठी। बड़ी ही अजीबोगरीब स्थिति हो गई थी मेरी। इधर क्षितिज की आंखें बड़ी बड़ी हो गयीं यह दृश्य देख कर। मानो उसकी आंखों के सामने बिजली सी कौंध गई हों। मेरे जिस्म से उसकी नजरें मानो चिपक सी गयीं थीं। मुह खुला का खुला रह गया। क्षितिज के लिए किसी इतनी खूबसूरत दपदपाती काया की स्वामिनी के आकर्षक, उत्तेजक, अर्धनग्न जिस्म को इतने समीप से दर्शन का शायद यह पहला अवसर था। उसकी मांं थी तो क्या हुआ, आखिर थी तो एक मादा ही। उसकी आंखों में मैं वही मादा के प्रति वाली आदमजात, पुरुषजनित चमक स्पष्ट देख पा रही थी, जिसे मैं खूब पहचानती थी। उसके बरमूडा के सामने का हिस्सा हौले हौले उभर रहा था। कुछ पलों के लिए मैं सन्न रह गई, किंकर्तव्यविमूढ़।

“हाय, अब देख क्या रहे हो, मैं यहाँ से निकलूंगी कैसे, जल्दी से मेरी दूसरी नाईटी ले कर आ,” अपने आप को किसी प्रकार संभाल कर लरजती आवाज में बोली मैं। वह जैसे गहरी नींद से जागा और भाग कर मेरे कमरे से दूसरी नाईटी ले आया। मैं ने जल्दी से अपने ऊपर नाईटी डालकर अपनी अर्धनग्न देह को ढंक लिया और झट से अपनी चाय से भीगी नाईटी समेट कर किचन के बाहर निकल आई और सीधे अपने कमरे में चली गई। मेरी सांसे धौंकनी की तरह चल रही थीं। लज्जा के मारे मैं कामना कर रही थी कि काश धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊं।

“मॉम, चाय के लिए आ जाओ।” क्षितिज की आवाज किसी गहरे कुंए से आती हुई प्रतीत हुई। मैं अपने आप को किसी प्रकार संभालती हुई बैठक में आई। हरिया, करीम और क्षितिज मेरा इंतजार कर रहे थे। जहां क्षितिज की नजरें मेरे कपड़ों को भेदती हुई मुझ पर ही जमी हुई थीं वहीं मुझमें हिम्मत ही नहीं थी कि मैं उससे नजरें मिला पाऊं।

पिछले चार पांच मिनट में हमारी भाग दौड़ को देख कर सवालिया नजरों से देखते हुए हरिया नें पूछा, ” ऐसा क्या हुआ था कि तुम दोनों मां बेटे दौड़ भाग कर रहे थे?”

“कुछ नहीं नाना, मम्मी के कपड़े पर चाय गिर गया था।” क्षितिज बोला। मैं शरम के मारे क्षितिज से नजरें भी नहीं मिला पा रही थी। छि:, मेरे अधनंगे तन को देख कर क्या सोच रहा होगा इसका कोई अंदाजा नहीं था मुझे। उसके कहने का अंदाज बिल्कुल सामान्य था और चेहरे पर वही पूर्ववत मासूमियत विराज रही थी। मैं ही बिना वजह असहजता का अनुभव कर रही थी। मैं अपने मन की सारी आशंकाओं और ग्लानि को झटक कर सामान्य होने की कोशिश करने लगी। शनैः शनैः मैं सामान्य रुप से उनके वार्तालाप में शामिल हो गई। किचन वाली घटना अब भी मेरे मन को अशांत कर रही थी किंतु उस घटना से उपजे दुश्प्रभाव से मैं मुक्त हो गई थी। चाय पीते पीते और इधर उधर की बातें करते हुए कब सात बज गया मुझे पता ही नहीं चला। इसी बीच हरिया उठ कर किचन की ओर बढ़ा रात के खाने की व्यवस्था करने के लिए। करीम चाचा भी उठ कर वृद्धाश्रम का कुछ सामान लाने के लिए बाजार चले गये। बैठक में रह गये सिर्फ हम मां बेटे।

“और बताओ क्षितु, कैसी चल रही है तेरी पढा़ई?” मैं पूछी।

“मॉम, पढ़ाई लिखाई की बात मत पूछो। छुट्टी है, छुट्टी कैसे इंज्वॉय करूँ, उसकी बात करो।” क्षितिज बोला।

“ठीक है बाबा ठीक है। तू ही बता तू छुट्टियों में क्या करना चाहता है। शॉपिंग, मूवी, घूमना, तुम्हें क्या पसंद है? मैं उसी के हिसाब से ऑफिस से छुट्टी कर लूंगी।” मैं बोली।

“वह सब कुछ तो होगा ही लेकिन उन सबके अलावा आपके साथ अधिक से अधिक टाईम बिताना चाहता हूं मॉम।” वह मेरे करीब आ कर मेरे हाथों को अपने हाथों में ले कर बोला।

“मेरे साथ समय बिताने की जगह अपने दोस्तों के जा कर मस्ती क्यों नहीं करता? हां शॉपिंग और मूवी हम साथ जा सकते हैं। घूमने के लिए अपने दोस्तों के साथ चला जा।”

“आईडिया बुरा नहीं है लेकिन मेरी किसी से घनिष्ठता नहीं है। यहां के जो तीन चार दोस्त हैं, सारे बड़े कमीने हैं, इसलिए मैं उनसे ज्यादा मिलना जुलना पसंद नहीं करता हूँ।”

“क्या करते हैं? आखिर तुम्हारे बैचमेट ही तो हैं ना।”

“अरे कुछ पूछो मत ममा। छिछोरे हैं एक नंबर के। जहां लड़कियां देखी तो लाईन मारना शुरू।”

“अरे यह तो तुम्हारी उम्र में सभी करते हैं। इसमें क्या नयी बात है।” मैं मजाक में बोली।

“मजाक मत करो ममा। तुम नहीं जानती उनके बारे में। अजय और सुजीत तो बड़ी उम्र की औरतों से भी फ्लर्ट करते हैं। एक नंबर के कमीने हैं।”

“ओह, ऐसा?” मैं बोली। “ठीक है, फिर मैं तीन दिन की छुट्टी कर लेती हूं। मैं खुद भी चाहती हूं कि तुम्हारे साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिता सकूं, लेकिन मजबूरी है, तीन दिन से अधिक ऑफिस नहीं गई तो काफी काम पेंडिंग हो जाएगा। उसके बाद कोशिश करूंगी कि ऑफिस के काम की मॉनिटरिंग घर से ही कर सकूं।” मैं बोली।

“ओह्ह्ह्ह माई स्वीट मॉम। आई लव यू।” मुझे बांहों में भर कर चूम लिया। मैं भीतर तक गनगना उठी उसकी इस हरकत पर। आखिर अब वह बच्चा तो रहा नहीं। पूरा मर्द बन चुका था। मुझे उसकी बांहों में अपने बेटे के स्थान पर एक मर्द की बांहों का आहसास हुआ।

“चल हट। तू बच्चा का बच्चा ही रहेगा। अरे जवान हो गया है तू।” मैं छिटक कर अलग होती हुई बोली।

“ओह मॉम, जवान हो गया तभी तो अपनी खूबसूरत गर्लफ्रैंड के साथ मस्ती कर रहा हूँ।” वह दुबारा मुझे अपनी बांहों में जकड़ कर मेरे गाल पर एक भरपूर चुंबन दे बैठा। हे भगवान, इस नादान को कैसे समझाऊंं। मैं अंदर तक हिल गई।

“छि:, शैतान, अपनी मां के साथ ऐसी बात करते हुए शर्म नहीं आती?”

“शर्म कैसी? मैं अपनी गर्लफ्रैंड से ही तो ऐसी बात कर रहा हूँ। ओ माई स्वीटी, मैं कैसे बताऊँ कि आपको कितना प्यार करता हूँ।” उसकी आंखों में मैं अपने लिए बेइंतहां प्यार का सैलाब उमड़ता देख रही थी। मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा। यह उसके बचपने वाला प्यार नहीं था। एक स्त्री के लिए एक मर्द की चाहत वाला प्यार था। यह उसकी नादानी भरी चाहत थी जिसे मुझे बड़ी होशियारी से संभालना था। मुझे अपनी जहरीली कामुकता को नियंत्रण में भी रखना था और बड़ी बुद्धिमानी से उसे समझाना भी था कि मां बेटे के बीच का प्यार और स्त्री पुरूष के जोड़े के बीच के प्यार में फर्क क्या है, लेकिन मेरी खुद की पुरुष संसर्ग की भूख रुपी सांप का फन कब उठ जाए, उसी भय से परेशान हो रही थी। अबतक तो मैं खुद को किसी प्रकार नियंत्रित रख पाने में कामयाब थी।

“देख क्षितु, मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, लेकिन एक मां की तरह। तू मुझसे गर्लफ्रैंड की तरह व्यवहार करता है और अपने विचार खुल कर मुझसे बांटा करता है यह अच्छी बात है, लेकिन यह कभी न भूलना कि तू मेरा बेटा है और मैं तेरी मां हूं।” मैं तनिक गंभीरता पूर्वक बोली। यह सुनकर उसके चेहरे पर मायूसी सी छा गई। उसकी मायूसी मुझसे देखी नहीं गई, मैं उसे गले लगा कर बोली, “छि: पगले, उदास हो गया। अच्छा बाबा अच्छा, मैं तेरी गर्लफ्रैंड और तू मेरा ब्वॉय फ्रेंड, अब खुश?”

किसी बच्चे की तरह खुश हो गया वह, जैसे किसी बच्चे को उसका मनपसंद खिलौना मिल गया हो और मुझे अपनी मजबूत बांहों में भींच कर हवा में उठा लिया, “ओह मॉम, यू आर ग्रेट।”

“अरे अब छोड़ मुझे बदमाश, तेरे नाना देखेंगे तो क्या सोचेंगे।” मैं उसकी बांहों में मचल उठी, लेकिन मैं अब अपना नियंत्रण खोने लगी थी।

“ओके माई डार्लिंग, लो छोड़ दिया।” कहकर मुझे फर्श पर उतार दिया। किसी प्रकार मैं अपनी सांसों पर काबू पा सकी।

“अच्छा अब ये सब छोड़ो, जरा देखती हूँ हरिया डिनर के लिए क्या बना रहा है,” इतना कहकर मैं वहां से खिसक ली। अगर वहां कुछ पल भी और रहती तो मेरे संयम का बांध टूटने का खतरा था। अपनी सांसे दुरुस्त करती हुई किचन में जा घुसी। रात करीब नौ बजे हम सब खाने की मेज पर इकट्ठे हुए। उस वक्त तक मैं काफी हद तक संभल चुकी थी। खाना खाने के बाद हम कुछ देर इधर उधर की बातें करते रहे। करीब साढ़े दस बजे हरिया और करीम सोने चले गए।

“क्षितिज तू भी सोने चल।” मैं बोली।

“थोड़ी देर और बैठिए न मॉम” क्षितिज बोला।

“नहीं मुझे नींद आ रही है, मैं जा रही हूं सोने,” कह कर मैं उठ गयी। मेरे उठते ही क्षितिज भी उठ खड़ा हुआ और मेरे पीछे पीछे चल पड़ा। यह देखकर मैं बोली, “मेरे पीछे कहाँ आ रहा है, जा तू अपने कमरे में।”

“ओ मॉम, आप बड़ी निर्दयी हो। एक तरफ तो बोलती हो अधिक से अधिक समय मेरे साथ स्पेंड करूंगी और इतनी जल्दी सोने चली।” मायूसी से बोला वह।

“तू मुझे बड़ा इमोशनल ब्लैकमेल करता है। मुझे सच में बड़ी नींद आ रही है लेकिन तेरी खातिर रुक रही हूँ। चल बैठक रूम में।” कहकर मैं ड्राइंग रूम में आ गई। हम दोनों सोफे पर बैठकर बातें करने लगे। मैं अपने ऑफिस, घर और वृद्धाश्रम की बातें बताती रहीऔर वह अपने कॉलेज के बारे में बताता रहा। करीब एक घंटे तक हम बातें करते रहे, फिर मुझे जम्हाई आने लगी, नींद के मारे मेरी आंखें बोझिल होने लगीं।

मेरी हालत देख कर क्षितिज बोला, “चलिए मॉम, आपको सच में नींद आ रही है। चलते हैं सोने। बाकी बातें कल करेंगे।” मैं उठ कर अपने कमरे के दरवाजे के पास पहुंची, तभी क्षितिज ने मुझे पीछे से पकड़ कर अपनी ओर घुमा लिया और मेरे गाल पर एक चुंबन जड़ते हुए बोला, “गुड नाईट स्वीटहार्ट, स्वीट ड्रीम्स”। मैं हक्की बक्की रह गई। यह क्या था? एक बेटे का स्नेह भरा चुंबन या, एक प्रेमी का प्रेम प्रदर्शन?

अनिश्चय की अवस्था में मेरे मुंह से भी निकला, “गुड नाईट बेटा”

“ओह बेटा मत बोलिए मॉम, अपने ब्वॉयफ्रेंड को कोई बेटा बोलता है क्या?” वह तनिक मायूसी से बोला। उसके चेहरे पर मायूसी देखकर मुझे दुख हुआ।

“ओके माई डार्लिंग, गुड नाईट” मैं उसके मायूस चेहरे को हथेलियों में भर कर बोली।

“ये हुई न बात गर्लफ्रैंड वाली।” खुश हो गया वह और खूब सख्ती से मुझे अपनी बांहों में जकड़ कर एक भरपूर चुंबन दे कर अपने कमरे की ओर बढ़ गया। ओह मां, थरथरा उठी मैं और लड़खड़ाते कदमों से अपने कमरे में दाखिल हुई। यह मैं क्या कर रही थी मैं। सख्ती से उसे मना क्यों नहीं कर पा रही थी मैं, यह जानते हुए भी कि यह अनैतिक है। क्या मेरी इच्छा शक्ति कमजोर हो रही थी? शायद हां। मेरे अंदर का वही पूर्वपरिचित शैतानी सर्प अपना फन उठा रहा था और धीरे धीरे मुझे अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा था, मुझे बेबस करता जा रहा था।

मैं सीधे अपने बिस्तर पर धम्म से गिर पड़ी। मेरे सारे शरीर पर मानो चींटियां चल रही हों। जब उसने मुझे कस लिया था अपनी बांहों में और चुंबन अंकित कर रहा था तो वह क्या था? मैं उसकी बांहों में जकड़ी पिघलती क्यों जा रही थी? उसके सीने से दबे हुए मेरे उरोज मचल क्यों रहे थे? ठीक मेरी योनी के ऊपर किसी कठोर वस्तु का आभास क्यों हो रहा था? यह सिर्फ मेरा वहम था या वास्तविकता? अगर यह वास्तविक था तो क्या, तो क्या…. पारिवारिक, सामाजिक रिश्ते नातों से इतर पुरुष प्रकृति के अनुसार उसकी नर प्रवृत्ति थी? नारी शरीर के लिए उसके शरीर का स्वत: जागृत पौरुष था? मादा के प्रति नर का प्राकृतिक आकर्षण था? हाय, अब मेरे नादान बेटे को कैसे नियंत्रित करुं, जबकि मैं अपने अंदर जागती जा रही कामुकता के वशीभूत, खुद अपनी मां रुपी बेड़ी को टूटती महसूस कर रही थी। मेरे जैसी वासना की पुतली, इतने करीब से आती पुरुष गंध के आकर्षण से कब तक अपने को बचा कर रख सकती थी यह तो भविष्य के गर्त्त में था। मैं अपनी ओर से भरसक प्रयास कर रही थी कि मैं चाहे जैसी भी हूँ, मेरा नादान पुत्र रिश्ते की मर्यादा को न लांघे। अब आगे भगवान की क्या मर्जी है यह तो भगवान ही जाने। देर रात तक मैं इसी उधेड़बुन में पड़ी रही।

रात के वक्त अचानक ऐसा लगा कि कोई दानवाकार व्यक्ति मेरे कमरे में है। ठीक मेरे बिस्तर के करीब। नाईट बल्ब ठीक उसके पीछे था, अत: वह एक काले साये की तरह दिख रहा था। मेरी आंखें खुल गयीं थीं और आंखें फाड़े नाईट बल्ब की मद्धिम रोशनी में उसका चेहरा पहचानने की कोशिश कर रही थी किंंतु साफ साफ देख पाने में असमर्थ थी। वह आहिस्ते आहिस्ते मेरे करीब आया और मेरी नाईटी को धीरे धीरे ऊपर उठाने लगा। मैं विरोध करना चाह रही थी किंतु हिलने डुलने में असमर्थ थी। ऐसा लग रहा था मानो मुझे लकवा मार गया हो। पूरा शरीर मानो निश्प्राण हो गया हो। मेरी जुबान तालू से चिपक गई थी। धीरे धीरे मेरी नाईटी मेरे शरीर से अलग हो गयी। अब मैं सिर्फ पैंटी और ब्रा में थी। कुछ पलों तक वह व्यक्ति मेरे अर्धनग्न शरीर को घूरता रहा फिर वह मेरी ब्रा को खोलने लगा। मैं नि:शक्त, बेबसी के साथ अपने ऊपर होने वाले इस कृत्य को सिर्फ देखती रही। मेरी ब्रा को खोलने के बाद वह बुत बना कुछ पलों तक मेरे उन्नत उरोजों की खूबसूरती निहारता रहा। मेरी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसने अपने विशाल खुरदुरे पंजों से पहले मेरे उरोजों का स्पर्श किया, फिर हौले से दबाया। उफ्फ्फ, भयमिश्रित उत्तेजना का वह आहसास अवर्णनीय था। उसका हाथ मेरे उरोजों से होते हुए मेरे पेट, फिर नाभि और, और…ओह्ह्ह्ह मेरी योनि की तरफ जाने लगा। हाय राम, यह मेरे साथ क्या हो रहा था। मैं इतनी बेबस क्यों हो गई थी। चाह कर भी विरोध क्यों नहीं कर पा रही थी। अब तक मेरे अंदर भी धीरे धीरे वासना का कीड़ा कुलबुलाने लगा था। वह व्यक्ति पहले मेरी पैंटी के ऊपर से ही मेरी योनि को सहलाने लगा। मैं थरथरा उठी। मेरा जिस्म वासना की अग्नि में झुलसने लगा। मेरी योनि पानी छोड़ने लगी थी। मेरी हालत उस व्यक्ति से छुपी हुई नहीं थी। वह मेरे बिस्तर पर आ कर ठीक मेरे बगल में लेट गया, पैंटी को उतारने के लिए जब वह पैंटी नीचे खींचने लगा और इस क्रम में उसका चेहरा ठीक नाईट बल्ब की ओर हुआ, तभी मैं इतने करीब से उस व्यक्ति की सूरत देख पाई, ओह्ह्ह्ह भगवान, इतना वीभत्स चेेेहरा! कोयले की तरह काला रंग, भिंची भिंची सुर्ख आंखें, बिखरे बेतरतीब खिचड़ी बाल, किसी जंगली भेड़िये की तरह शक्ल, बड़े बड़े कान बाल से भरे हुए, बेहद पतले होंठ, जबड़े बाहर की ओर उभरे हुए, नाक के स्थान पर सिर्फ दो नसिका छिद्र दिखलाई पड़ रहे थे। सुर्ख आंखों में भूखे भेड़िए सी चमक थी। मैं घबरा कर चीख पड़ी, “नहींईंईंईंईंईंईं” और तभी मेरी आंखें खुल गयीं। हे भगवान, तो यह एक दु:स्वप्न था। मैं पसीने से नहा गयी थी। मैं कांपते हुए बिस्तर से किसी प्रकार उठी और अपने सूखे हलक को तर करने पानी पीने के लिए लड़खड़ाते कदमों से ज्यों ही दरवाजा खोली, सामने क्षितिज खड़ा था, जो मेरी चीख सुनकर बदहवास दौड़ा चला आया था। वह एक टी शर्ट और बरमूड़ा पहने हुए था।

उफ्फ्फ भगवान, वह भयावह वीभत्स चेहरा अब भी मेरे जेहन में समाया हुआ था। भयाक्रांत, पसीने से लतपत, थरथर कांपती, बेख्याली में मैं सामने खड़े क्षितिज से लिपट गई। क्षितिज मुझे अपनी बांहों में समेट कर बोला, “ओह माई डार्लिंग, क्या हुआ? इतनी डरी हुई क्यों हो?”

अचानक जैसे मुझे होश आया, “कककुच्छ नननहींईंईंई” हकलाते हुए मैं बोली और उसकी बांहों से निकलने की कोशिश करने लगी, लेकिन उसने मुझे और सख्ती से जकड़ लिया, “छोड़ो मुझे, मुझे कुछ नहीं हुआ, मैं सिर्फ एक बुरा सपना देख कर डर गई थी” मैं हकबका कर खुद को बमुश्किल संभालते हुए बोली।

“देखिए मॉम, तुम अब भी डरी हुई हो। मैं तुम्हें ऐसी हालत में अकेला नहीं छोड़ सकता, जबतक तुम नॉर्मल नहीं हो जाती।” कहते हुए मुझे बांहों का सहारा दिए हुए मेरे साथ मेरे कमरे में दाखिल हुआ। “चलिए आप आराम से लेट जाईए, मैं आपके लिए पानी ले कर आता हूं” कहता हुआ मुझे बिस्तर पर लिटा दिया और पानी लाने चला गया। उसकी बांहों में मैं राहत और सुरक्षा अवश्य महसूस कर रही थी किंतु मेरे अंदर का बांध भी दरकने लगा था। मैं उसके नर गंध से अवश होती जा रही थी। वह ग्लास में पानी लाकर अपनी बांहों का सहारा देकर मुझे बिठा दिया और मुझे पानी पिलाने का उपक्रम करने लगा।

इसके आगे अगली कड़ी में।

तबतक के लिए अपनी कामुक लेखिका को आज्ञा दीजिए।

आपकी रजनी

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